तमिलनाडु में ‘अन्नामलाई’ के नए राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक की पूरी कहानी
खाकी से राजनीति तक: क्या ‘सिंघम’ अन्नामलाई का BJP से इस्तीफा किसी बड़े ‘साइलेंट मास्टरस्ट्रोक’ का हिस्सा है?
चेन्नई/दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
दक्षिण भारत की राजनीति, विशेषकर तमिलनाडु में के. अन्नामलाई का भारतीय जनता पार्टी (BJP) की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देना और उनका इस्तीफा तत्काल स्वीकार कर लिया जाना, इस वक्त देश के सियासी गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा का विषय बना हुआ है।
‘The Politics Again’ की राजनीतिक विश्लेषक टीम के अनुसार, यह घटना जितनी सरल दिख रही है, इसके पीछे की रणनीतिक पटकथा उतनी ही गहरी और दूरगामी हो सकती है।
वह शख्स जिसने आज तक अपने जीवन में कोई भी चुनाव नहीं जीता—न कभी विधायक बन पाए और न ही सांसद—उसका सियासी कद इतना बड़ा कैसे हो गया कि बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टी भी उन्हें अपने पाले से दूर नहीं करना चाहती थी?
आखिर अन्नामलाई में ऐसा क्या है जो उन्हें तमिलनाडु की राजनीति का सबसे जरूरी और फायरब्रांड चेहरा बनाता है?
किसान के घर से ‘सुपर कॉप’ और ‘सिंघम’ बनने का सफर
कुपुस्वामी अन्नामलाई की जड़ों को देखे बिना उनकी आक्रामक राजनीति को समझना नामुमकिन है:
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जन्म और पृष्ठभूमि: तमिलनाडु के करूर जिले के एक प्रभावशाली ‘गोंडर’ समुदाय में 4 जून 1984 को एक आम किसान कुप्पू स्वामी के घर अन्नामलाई का जन्म हुआ।
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उच्च शिक्षा: उन्होंने 2007 में कोयंबटूर के पीएचडी इंजीनियरिंग कॉलेज से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री ली और इसके बाद साल 2010 में देश के प्रतिष्ठित संस्थान IIM लखनऊ से MBA की पढ़ाई पूरी की।
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खाकी का सफर: सिविल सर्विसेज के प्रति झुकाव के कारण उन्होंने 2011 में यूपीएससी (UPSC) पास की और कर्नाटक कैडर के आईपीएस (IPS) अधिकारी बने।
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उडुपी और चिकमंगलूर में एसपी तथा बेंगलुरु साउथ में डीसीपी के पद पर रहते हुए उनकी छवि एक बेहद ईमानदार और निडर ‘सुपर कॉप’ की बनी।
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जनता के बीच उनकी लोकप्रियता ऐसी थी कि जब उनका उडुपी से तबादला हुआ, तो जनता सड़कों पर उतर आई। इसी फियरलेस पुलिसिंग के कारण उन्हें ‘सिंघम’ का नाम मिला।
जब अचानक खाकी को अलविदा कह दिया
मई 2019 में, मात्र 8 साल के अपने शानदार आईपीएस करियर को अन्नामलाई ने अचानक अलविदा कह दिया। उन्होंने अपने फेयरवेल लेटर में इसके दो मुख्य कारण बताए थे:
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कैलाश मानसरोवर यात्रा: इस यात्रा ने उन्हें उनके जीवन की असली प्राथमिकताओं और आध्यात्मिक चेतना को समझने में मदद की।
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मधुकर शेट्टी सर की मौत: दिसंबर 2018 में उनके सीनियर आईपीएस अधिकारी मधुकर शेट्टी की स्वाइन फ्लू से अचानक मौत हो गई थी, जिसने अन्नामलाई को जीवन का पुनर्मूल्यांकन करने पर मजबूर किया।
इस्तीफे के बाद उन्होंने ‘वी द लीडर फाउंडेशन’ के जरिए सोशल वर्क और खेती-किसानी शुरू की। इसी दौरान उन्होंने अपनी चर्चित किताब ‘स्टेपिंग बियॉंड खाकी: रेवोलशन्स ऑफ अ रियल लाइफ सिंघम’ भी लिखी।
राजनीति में एंट्री और द्रविड़ राजनीति में ‘अंडरकरंट’
मई 2020 में फेसबुक लाइव के जरिए अन्नामलाई ने राजनीति में आने का ऐलान किया। शुरुआत में वे सुपरस्टार रजनीकांत की राजनीतिक पार्टी का इंतजार कर रहे थे,
लेकिन वहां से कोई पक्का कमिटमेंट न मिलने के कारण 3 महीने बाद उन्होंने राष्ट्रवाद की विचारधारा से प्रभावित होकर बीजेपी का दामन थाम लिया।
बीजेपी ने उन्हें जल्द ही तमिलनाडु का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। पिछले वर्ष जब गृह मंत्री अमित शाह ने रामेश्वरम में अन्नामलाई की पदयात्रा ‘एन मन एन मक्कल’ (मेरी माटी, मेरा लोग) को हरी झंडी दिखाई, तो दिल्ली के विश्लेषकों को अंदाजा नहीं था कि यह पिछले सात दशकों से हावी द्रविड़ राजनीति की जड़ों को हिला देगी।
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वोट शेयर में ऐतिहासिक उछाल: तमिलनाडु में जहां बीजेपी हमेशा 2 से 3 प्रतिशत वोट शेयर पर सिमट जाती थी, वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में अन्नामलाई के आक्रामक नेतृत्व के कारण बीजेपी का वोट शेयर सीधे 11.2 प्रतिशत पहुंच गया।
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बदलता इकोसिस्टम: तमिलनाडु में आज तक किसी हिंदुत्ववादी नेता को इतनी लोकप्रियता नहीं मिली थी। बीजेपी केवल सोशल मीडिया पार्टी से निकलकर ग्राउंड की मजबूत पार्टी बनती दिख रही थी।
ऐन वक्त पर बदला गेम: विजय की एंट्री और बीजेपी का यू-टर्न
तमिलनाडु की राजनीति में पिछले 60 सालों से केवल दो ही पार्टियों (DMK और AIADMK) का दबदबा रहा है।
लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले साउथ के सुपरस्टार थलापति विजय ने अपनी नई पार्टी बनाकर इस परंपरा को चुनौती दी।
इसी मोड़ पर बीजेपी ने गठबंधन धर्म और अपनी रणनीति के तहत एक बड़ा फैसला लेते हुए अन्नामलाई को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया और उन्हें उम्मीदवार भी नहीं बनाया।
नतीजा यह हुआ कि बीजेपी का पूरा नैरेटिव बिखर गया और वह वापस अपने पुराने 2% वोट शेयर के करीब सिमट गई।
अन्नामलाई ने डीएमके (DMK) के खिलाफ जो मजबूत बैटलफील्ड और माहौल तैयार किया था, उसका सीधा चुनावी फायदा थलापति विजय उठा ले गए।
अमित शाह से मुलाकात और इस्तीफे की इनसाइड स्टोरी
बीजेपी के राष्ट्रीय महामंत्री बी.एल. संतोष के बेहद करीबी माने जाने वाले अन्नामलाई जब दिल्ली पहुंचे, तो सियासी पारा चढ़ गया।
नितिन नवीन और बी.एल. संतोष के साथ लंबी बैठकों के बाद उनकी मुलाकात केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से हुई।
इस मुलाकात की सामने आई तस्वीरों में अमित शाह मुस्कुराते हुए एक किताब हाथ में लिए नजर आए। बैठक बेहद सौहार्दपूर्ण माहौल में करीब सवा घंटे चली, जहां अन्नामलाई ने पॉइंट-बाय-पॉइंट तमिलनाडु के राजनीतिक हालात का फीडबैक दिया।
संघ (RSS) और बीजेपी आलाकमान भी चाहता था कि अन्नामलाई पार्टी में रहें, लेकिन इस बैठक के बाद उन्होंने अपना इस्तीफा सौंप दिया और उसे स्वीकार कर लिया गया।
असली खेल: बीजेपी और अन्नामलाई के बीच क्या ‘खिचड़ी’ पकी है?
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि अन्नामलाई का इस्तीफा बीजेपी से कोई कड़वाहट नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के लिए एक बेहद गहरी और रणनीतिक ‘खिचड़ी’ का हिस्सा है।
दरअसल, तमिलनाडु की राजनीतिक जमीन बहुत गर्म है और वहां सीधे तौर पर ‘नॉर्थ इंडियन हिंदुत्व’ या विशुद्ध बीजेपी ब्रांड को स्थापित करना बेहद मुश्किल है। इसके लिए एक मध्यमार्ग (वैकल्पिक स्पेस) की जरूरत थी।
अब अन्नामलाई एक नई पार्टी बनाने जा रहे हैं, जिसकी रूपरेखा कुछ इस प्रकार समझी जा सकती है:
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राजनीतिक दल |
विचारधारा और टारगेट वोट बैंक |
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थलापति विजय की पार्टी |
द्रविड़ियन विचारधारा, लेकिन DMK से थोड़ी कम कट्टर। क्रिश्चियन टच के साथ सेकुलर वोटर्स को साधना। |
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अन्नामलाई की नई पार्टी |
तमिल संस्कृति और हेरिटेज (द्रविड़ियन कल्चर) में रची-बसी, लेकिन राष्ट्रवादी और सॉफ्ट-हिंदूवादी। |
क्या है यह नया ‘पॉलिटिकल मॉडल’?
अन्नामलाई उस बड़े वोट बैंक को टारगेट कर रहे हैं जो परंपरागत रूप से DMK या कांग्रेस का है, लेकिन वह डीएमके के मुकाबले थोड़ा सॉफ्ट है, और वह वोटर जो बीजेपी की तरफ जाना चाहता है लेकिन उसकी शुद्ध उत्तर-भारतीय छवि के कारण हिचकता है।
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बंगाल और बिहार मॉडल से तुलना: पश्चिम बंगाल में वामपंथ (कम्युनिस्ट शासन) को सीधे उखाड़कर बीजेपी का आना असंभव था; इसके लिए पहले ममता बनर्जी की टीएमसी (TMC) जैसी पार्टी आई जो सेकुलर थी पर कम्युनिस्टों जितनी कट्टर नहीं थी, जिसने जमीन तैयार की।
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बिहार में भी लालू प्रसाद यादव के जंगलराज के बाद सीधे बीजेपी नहीं आ सकी; बीच में नीतीश कुमार के रूप में एक ‘मध्यम मार्ग’ की जरूरत पड़ी।
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भविष्य की बिसात: जयललिता के बाद एआईएडीएमके (AIADMK) कमजोर हो चुकी है और एम.के. स्टालिन के बाद उदयनिधि स्टालिन डीएमके को कितना संभाल पाएंगे, यह अनिश्चित है।
ऐसे में अन्नामलाई की यह नई पार्टी तमिलनाडु की जमीन को राष्ट्रवाद के अनुकूल बनाने, दो अतिवादी विचारधाराओं को साइडलाइन करने और भविष्य में एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन की नींव रखने का सबसे बड़ा ‘साइलेंट प्रयोग’ माना जा रहा है।











