इतिहास के पन्नों से निकली ‘संजीवनी’: आयुर्वेद की 5 दुर्लभ पांडुलिपियों का रहस्य सुलझा; ताड़ के पत्तों पर लिखी ‘धन्वंतरि चिंतामणि’ अब दुनिया के लिए उपलब्ध
“भारत की प्राचीन चिकित्सा विरासत को सहेजने की दिशा में मोदी सरकार के आयुष मंत्रालय ने एक ऐतिहासिक सफलता हासिल की है”
नई दिल्ली/त्रिशूर: “THE POLITICS AGAIN” संतोष सेठ की रिपोर्ट
केरल के त्रिशूर में केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS) और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (CSU) द्वारा आयोजित 15 दिवसीय विशेष कार्यशाला में आयुर्वेद की 5 अत्यंत दुर्लभ और अब तक अप्रकाशित पांडुलिपियों (Manuscripts) का सफल लिप्यंतरण (Transcription) कर लिया गया है। ये पांडुलिपियां सदियों से ताड़ के पत्तों पर कैद थीं।
क्या मिला है खजाने में?
12 से 25 जनवरी, 2026 तक चली इस कार्यशाला का सबसे बड़ा परिणाम यह है कि अब शोधकर्ताओं के पास 5 नए प्राचीन ग्रंथ उपलब्ध हैं:
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धन्वंतरि (वैद्य) चिंतामणि: 146 ताड़ के पत्तों पर लिखी इस ग्रंथा लिपि की पांडुलिपि का संस्कृत में अनुवाद हुआ है।
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द्रव्यशुद्धि: 110 पृष्ठों की यह पांडुलिपि दवाओं की शुद्धता पर आधारित है।
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विविधारोगंगल: 78 ताड़ के पत्तों पर ‘वट्टेझुथु लिपि’ में लिखी इस पांडुलिपि में कई रोगों का इलाज छिपा है। इसके अलावा ‘वैद्यम’ और ‘रोग निर्णय’ जैसी मध्यकालीन मलयालम पांडुलिपियों को भी डिकोड किया गया है।
33 विद्वानों का महामंथन
इस मिशन को पूरा करने लिए आयुर्वेद के 18 और संस्कृत के 15 विद्वान (Scholars) एक साथ आए। इन्हें ग्रंथा, मध्यकालीन मलयालम और वट्टेझुथु जैसी कठिन प्राचीन लिपियों का विशेष प्रशिक्षण दिया गया, ताकि वे मूल ताड़ के पत्तों को पढ़कर उन्हें आधुनिक फॉर्मेट में बदल सकें।
यह दूसरी बड़ी सफलता
CCRAS के महानिदेशक प्रोफेसर वैद्य रबीनारायण आचार्य ने बताया कि यह ओड़िशा के बाद दूसरा बड़ा प्रयास था। ओड़िशा में पहले 14 पांडुलिपियों का काम पूरा किया गया था।
अब केरल की इन पांडुलिपियों के आने से ‘साक्ष्य-आधारित आयुर्वेद’ (Evidence-based Ayurveda) को नई मजबूती मिलेगी।
यह पहल सिर्फ अनुवाद नहीं है, बल्कि भारत के लुप्त होते ज्ञान को डिजिटल युग में वापस लाने की कोशिश है। आने वाले समय में इन ग्रंथों में छिपे फार्मूले कई असाध्य रोगों के इलाज में नई रोशनी दिखा सकते हैं।











