रायपुर की जल क्रांति: 32 हजार रिचार्ज स्ट्रक्चर से बना ‘स्पंज सिटी’
रायपुर की ‘वर्षा जल क्रांति’: 32 हजार रिचार्ज स्ट्रक्चर और जनभागीदारी से कैसे ‘स्पंज सिटी’ बन रहा है शहर?
रायपुर: द पॉलिटिक्स अगेन : कृष्णा सोनी की रिपोर्ट
जलवायु परिवर्तन, गिरते भूजल स्तर और मानसून में जलभराव—ये समस्याएं आज देश के लगभग हर बड़े शहर की कहानी हैं।
लेकिन छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर ने इन चुनौतियों को अवसर में बदलकर पूरे देश के सामने सतत शहरी जल प्रबंधन (Sustainable Urban Water Management) का एक अनुकरणीय मॉडल पेश किया है।
देशव्यापी ‘जल संचय जन भागीदारी’ (JSJB) पहल के तहत, रायपुर में सरकार, तकनीकी विशेषज्ञों, बिल्डरों और आम नागरिकों ने मिलकर एक ऐसी ‘जल क्रांति’ ला दी है, जो शहरी भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) की दिशा में गेम-चेंजर साबित हो रही है।
क्या थी चुनौती और कैसे निकला समाधान ?
रायपुर में औसतन 1200 से 1400 मिमी वार्षिक वर्षा होती है। इसके बावजूद कंक्रीटीकरण और बेतरतीब शहरीकरण के कारण बारिश का अधिकांश पानी नालियों में बहकर बर्बाद हो जाता था, जिससे जलस्तर लगातार गिर रहा था।
इस चुनौती से निपटने के लिए रायपुर नगर निगम ने एक व्यापक वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) अभियान शुरू किया, जिसमें आम जनता और संस्थागत सहयोग को सबसे बड़ा हथियार बनाया गया।
आंकड़ों में सफलता : सिर्फ 2025 में बने 32,000 स्ट्रक्चर
इस पहल के परिणाम बेहद चौंकाने वाले और सकारात्मक रहे हैं। केवल वर्ष 2025 के दौरान ही पूरे शहर में लगभग 32,000 वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण संरचनाएं तैयार की गई हैं।
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प्रमुख संरचनाएं: इनमें रिचार्ज कुएं, परकोलेशन पिट, इंजेक्शन वेल, रूफटॉप हार्वेस्टिंग सिस्टम और स्टॉर्मवॉटर रिचार्ज संरचनाएं शामिल हैं।
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पुनर्भरण क्षमता (Recharge Capacity): एक सामान्य रिचार्ज कुआं प्रतिवर्ष लगभग 3 लाख लीटर तक जल जमीन में वापस भेज रहा है।
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वहीं, गंभीर जल संकट वाले क्षेत्रों में लगाए गए ‘इंजेक्शन वेल’ हर साल 15 लाख लीटर तक भूजल पुनर्भरण करने में सक्षम हैं।
तकनीक और नवाचार (Innovation) का अनूठा संगम
रायपुर की सफलता केवल गड्ढे खोदने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आधुनिक तकनीक का भरपूर इस्तेमाल हुआ है:
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इको-ब्लॉक्स (Eco-Blocks): सड़कों, फुटपाथों और पार्किंग क्षेत्रों में पारगम्य (Permeable) इको-ब्लॉक्स लगाए जा रहे हैं, जो पानी को सोखकर सीधे जमीन के अंदर पहुंचा देते हैं।
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ऑगर ड्रिलिंग तकनीक: ट्रैक्टर-माउंटेड ऑगर ड्रिलिंग मशीन को मल्टी-लेवल फिल्ट्रेशन सिस्टम के साथ जोड़कर बहुत कम लागत और तेजी से रिचार्ज संरचनाएं तैयार की जा रही हैं।
नीतिगत सुधार और ‘स्पंज सिटी’ (Sponge City) की ओर कदम
रायपुर प्रशासन ने इस जल क्रांति को दीर्घकालिक बनाने के लिए कई कड़े नीतिगत फैसले भी लिए हैं:
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बिल्डरों (CREDAI) का सहयोग: टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के तहत कॉलोनियों और कमर्शियल परिसरों में कुल नियोजित क्षेत्र का कम से कम 1% हिस्सा जल संचयन और हरित क्षेत्रों के लिए अनिवार्य रूप से सुरक्षित किया जा रहा है।
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खारुन नदी प्रोजेक्ट: आपदा प्रबंधन के तहत 30 करोड़ रुपये की लागत से खारुन नदी पर ‘एकीकृत इको ब्लॉक परियोजना’ लागू की जा रही है।
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इसका मुख्य उद्देश्य बड़े पैमाने पर पानी को सहेजना और रायपुर को एक “स्पंज सिटी” के रूप में विकसित करना है।
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झीलों का नेटवर्क और वेस्टवाटर का उपयोग: शहर के तालाबों और झीलों को आपस में जोड़ा जा रहा है, और उद्योगों के लिए ‘ट्रीटेड वेस्टवॉटर’ (उपचारित जल) के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है।
रायपुर का यह ‘सर्कुलर वाटर मैनेजमेंट’ मॉडल यह साबित करता है कि जब सरकार की नीतियां, तकनीकी नवाचार और समुदाय की भागीदारी (Jan Bhagidari) एक साथ मिलते हैं, तो बारिश के बर्बाद होते पानी को ‘शहरी जल सुरक्षा’ के सबसे बड़े हथियार में बदला जा सकता है।
बढ़ते भूजल संकट से जूझ रहे भारत के अन्य शहरों के लिए रायपुर अब एक जीवंत केस स्टडी बन चुका है।










