ग्रेट निकोबार : हिंद महासागर में नेवी का बेस, चीन की उड़ी नींद
ग्रेट निकोबार में मोदी सरकार का ‘मास्टरस्ट्रोक’: हिंद महासागर में बनेगा नेवी का अभेद्य किला, चीन की बढ़ी टेंशन”
नई दिल्ली/पोर्ट ब्लेयर: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
हिंद महासागर में चीन की बढ़ती रणनीतिक घुसपैठ के बीच मोदी सरकार ने एक ऐसा बड़ा दांव चला है, जिसने बीजिंग की सबसे बड़ी रणनीतिक चिंता बढ़ा दी है।
‘The Politics Again’ की डिफेंस और जियो-पॉलिटिक्स डेस्क के अनुसार, भारत ‘ग्रेट निकोबार’ (Great Nicobar) द्वीप पर एक ऐसा महाविशाल सैन्य और आर्थिक हब बनाने जा रहा है, जो समुद्री दुश्मनों के लिए एक खुली चेतावनी है।
जिस समुद्री रास्ते से दुनिया का सबसे बड़ा तेल और व्यापार गुजरता है, वहां अब भारत अपनी ताकत का स्थायी पहरा बैठाने जा रहा है।
⚓ ग्रेट निकोबार परियोजना के 4 प्रमुख स्तंभ
यह पूरी मेगा-परियोजना मुख्य रूप से चार बड़े स्तंभों पर टिकी है, जिन पर तेजी से काम चल रहा है:
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परियोजना का हिस्सा |
वर्तमान स्थिति / मुख्य बिंदु |
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नौसैनिक हवाई अड्डा (Greenfield Airport) |
अगले 5 वर्षों में तैयार होने की उम्मीद। यह पूरी तरह से भारतीय नौसेना के संचालन नियंत्रण में रहेगा। |
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कंटेनर ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह |
सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मूल्यांकन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। |
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द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) ऊर्जा संयंत्र |
विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) पूरी तरह से तैयार कर ली गई है। |
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आधुनिक नगर (Township) |
नगर परियोजना पर व्यय वित्त समिति (EFC) की अहम बैठक हो चुकी है। |
🎯 सामरिक अहमियत: चीन पर नकेल और नौसेना की ताकत
रक्षा सूत्रों और सामरिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह परियोजना भारत को दक्षिण-पूर्वी हिंद महासागर में एक निर्णायक बढ़त देगी:
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सिक्स डिग्री चैनल पर कब्जा: ग्रेट निकोबार ‘सिक्स डिग्री चैनल’ से केवल 40 किलोमीटर दूर है। यह अदन की खाड़ी से मलक्का जलडमरूमध्य तक फैले समुद्री व्यापार मार्ग का सबसे संवेदनशील हिस्सा है, जहां से दुनिया का दो-तिहाई तेल और आधा कंटेनर यातायात गुजरता है।
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नेवी का नया अग्रिम मोर्चा: नया एयरपोर्ट सिर्फ नागरिक उड़ानों के लिए नहीं होगा, बल्कि यह नौसेना का नया ‘फॉरवर्ड बेस’ बनेगा।
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इससे भारत की समुद्री निगरानी क्षमता, सैन्य पहुंच और त्वरित कार्रवाई (Rapid Response) की ताकत कई गुना बढ़ जाएगी।
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हाइड्रोकार्बन और ऊर्जा सुरक्षा: विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में विशाल हाइड्रोकार्बन भंडार छिपे हो सकते हैं। यह भारत की आर्थिक और ऊर्जा आत्मनिर्भरता के लिए गेम-चेंजर साबित होगा।
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पिछली सरकारों की सुस्ती: रक्षा सूत्रों का कहना है कि जो काम 30 साल पहले हो जाना चाहिए था, वह अब मोदी सरकार की दूरदृष्टि से जमीन पर उतर रहा है। इसे केवल “कारोबारी परियोजना” कहना भौगोलिक अज्ञानता है।
🌿 पर्यावरण और संरक्षण: उठ रहे सवालों का तथ्यात्मक जवाब
इस परियोजना को लेकर पर्यावरण के मुद्दे पर भ्रम फैलाने वालों को भी सरकार ने आंकड़ों के साथ कड़ा जवाब दिया है:
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सीमित विकास क्षेत्र: पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) के अनुसार, पूरे द्वीप के केवल 166.1 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ही विकास के लिए चिन्हित किया गया है।
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81.74% क्षेत्र पूर्णतः सुरक्षित: द्वीप का 81.74 प्रतिशत हिस्सा राष्ट्रीय उद्यान, जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र, वन और जनजातीय संरक्षण क्षेत्रों के रूप में अछूता रहेगा।
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विशाल संरक्षण फंड: वन्यजीवों (लेदरबैक कछुए, निकोबार मेगापोड, मगरमच्छ), प्रवाल भित्तियों (Corals) और मैंग्रोव के संरक्षण के लिए अगले 30 वर्षों में 2,220 करोड़ रुपये से अधिक का विशेष फंड तैयार किया गया है।
निष्कर्ष: ग्रेट निकोबार परियोजना केवल एक विकास अभियान नहीं है, बल्कि यह भारत की समुद्री शक्ति का नया शंखनाद है। भारत अब अपने समुद्री हितों की रक्षा केवल तटों से नहीं, बल्कि समंदर के बीचों-बीच बैठकर करेगा।











