तिब्बत की आज़ादी से देश की सीमाओ की सुरक्षा के साथ ही कैलाश मानसरोवर का मार्ग सुगम होगा – पंकज गोयल
“चीन के जमींन हड़पने की नीति को रोकने के साथ ही कैलाश मानसरोवर की निर्बाध यात्रा के लिए तिब्बत की स्वतंत्रता वर्तमान समय की मांग है, उक्त बाते भारत तिब्बत सहयोग मंच के राष्ट्रीय महामंत्री श्री पंकज गोयल जी ने शाहदरा स्थित आयुष्यम भवन में भारत तिब्बत सहयोग मंच शाहदरा द्वारा आयोजित एक दिवसीय गोष्ठी के आयोजन के दौरान कही गई “
शाहदरा 21 / 04 / 2025 संतोष सेठ की रिपोर्ट
भारत तिब्बत सहयोग मंच के तत्वाधान में एक दिवसीय विचार गोष्ठी एवं पदाधिकारियों का चयन कार्यक्रम शनिवार 19 अप्रैल को आयुष्यम भवन में सम्पन्न हुआ, कार्यक्रम की अध्यक्षता श्रीमान भूषण कुमार जैन ( अध्यक्ष भारत तिब्बत सहयोग मंच दिल्ली ) मुख्य अतिथि श्रीमान पंकज गोयल ( राष्ट्रीय महामंत्री तिब्बत भारत सहयोग मंच ) विशिष्ठ अतिथि श्रीमान नरेश अग्रवाल, श्रीमान दयानन्द जी ( कार्यकारिणी सदस्य राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ दिल्ली ) एवं मुख्य अतिथि आचार्य याशी फुंचोक ( पूर्व डिप्टी स्पीकर निर्वासित तिब्बत सरकार ) रहे।
कार्यक्रम में सर्वप्रथम मुख्य अतिथि एवं मंचासीन पदाधियारियो ने भारत माता के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन किया। तत्पश्चात उपस्थित सभी कार्यकर्ताओ और पदाधिकारियों द्वारा वन्दे मातरम का गीत गाया गया और भारत माता की जय के नारो का उद्घोष किया गया।

उपस्थित कार्यकर्ताओ और पदाधिकारियों को सम्बोधित करते हुए राष्ट्रीय महामंत्री पंकज गोयल ने कहा कि सदियों से कैलाश मानसरोवर हमारे आस्था का केंद्र रहा है, और श्रद्धालु कैलास मानसरोवर की यात्रा निर्बाध रूप से करते आ रहे है। ये यात्राये सदियों से भारत की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक शक्ति का परिचायक बन सम्पूर्ण विश्व को भारत वर्ष की आत्मिक शक्तियों का बोध करने के साथ ही भगवान् शिव के निवास के रूप में कैलाश पर्वत में अपनी गहरी आस्था रखता है।
तिब्बत पर पडोसी देश चीन की बुरी नज़र सदियों से पड़ती रही है। आध्यात्मिक एवं सामरिक रूप से महत्वपूर्ण तिब्बत में शांति बहाली के नाम पर चीन द्वारा लाखो को निर्वासन पर मजबूर किया गया। लाखो तिब्बतियों ने पलायन करके अपनी सांस्कृतिक और भगौलिक जुड़ाव को भारत से सहज रूप से जोड़ा और परम पूज्य दलाई लामा ने भी तिब्बत के हितो को भारत के रखने में अपना विश्वास जाहिर किया।
आज भारत को अपने आराध्य प्रभु श्री शिव के दर्शन पूजन के लिए चीन पर आश्रित होना पड़ता है। मानसरोवर यात्रा के लिए चीन को एक मोटी रकम देना पड़ता है, तब कही जाकर भारत के श्रद्धालु कैलाश मानसरोवर के दर्शन कर पाते है।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि तिब्बत एक स्वतंत्र देश था, सन् 1821 के चीन -तिब्बत युद्ध में तिब्बत की जीत हुई थी। तिब्बत-चीन का मुख्य शासक भी रहा है। भारत में अंग्रेजी राज के समय तिब्बत में भारतीय मुद्रा चलन में थी। वर्ष 1949 में चीन को आजादी मिली और माओ ज़ेडोंग के नेतृत्व में चीनी कम्युनिस्ट सरकार सत्ता में आ गयी थी।
माओ को लगा कि तिब्बत पर कब्ज़ा किये बिना चीन की आजादी अधूरी है तो चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने 7 अक्टूबर 1950 को तिब्बत पर हमला कर दिया और 19 अक्टूबर तक तिब्बत के 5000 सैनिकों ने चीनी सेना के सामने समर्पण कर दिया था और चीन-तिब्बत के बीच 17 सूत्रीय समझौता हुआ। इसमें धार्मिक, सांस्कृतिक, बोलने की अभिव्यक्ति जैसे मामले भी शामिल थे।

चीन का लक्ष्य तिब्बत को अपना उपनिवेश बनाकर वहां पर कम्युनिस्ट शासन स्थापित करना था। इसी हमले के बाद दलाई लामा ने अपनी जान की रक्षा करने के लिए 30 मार्च 1959 को असम में तेजपुर पहुंचे थे। इस बीच उनके 80 हजार अनुयायी भी भारत में शरण लेने पहुँच गए थे। कुछ समय बाद उन्होंने भारत के धर्मशाला (जिसे “लिटिल ल्हासा” भी कहा जाता है) में निर्वासित तिब्बत सरकार की स्थापना की थी।
दलाई लामा और उनके 80 हजार अनुयायियों को शरण देने के कारण चीन, भारत से नाराज हो गया। बस यहीं से शुरुआत होती है भारत और चीन के बीच कड़वे रिश्तों की। चीन को लगा कि भारत उसके आंतरिक मामलों में दखल दे रहा है इसलिए इसे सबक सिखाना जरूरी है।
इसके बाद ही चीन ने भारत के खिलाफ 1965 में एकतरफ़ा युद्ध छेड़ दिया था। चूंकि यह युद्ध अचानक शुरू हुआ था इसलिए भारत की सेना लड़ाई के लिए तैयार नहीं थी और परिणामतः चीन ने भारत के कुछ हिस्सों पर कब्ज़ा करने के बाद एकतरफा युद्ध बंद भी कर दिया था।
इसके बाद में राजनीतिक घटना क्रम में चीन की सरकार ने भारत से दलाई लामा को उसे सौंपने को कहा लेकिन भारत ने मना कर दिया और बाद में दोनों देश इस बात पर राजी हुए कि भारत दलाई लामा को अपनी जमीन से चीन के विरुद्ध गतिविधियाँ चलाने की अनुमति नहीं देगा।
वर्तमान में भी दलाई लामा और भारत चाहते हैं कि चीन, तिब्बत को उसके अंतर्गत एक स्वायत्त क्षेत्र के रूप में मान्यता दे और उसको धर्म और स्थानीय शासन के मामलों पर पूर्ण स्वतंत्रता दे। लेकिन चीन ने इस प्रस्ताव को मानने से इंकार कर रहा है।
चीन के कब्जे से पहले तिब्बत में 6000 से ज्यादा बौद्धमठ थे, अब 100 भी नहीं बचे है। जो व्यक्ति पवित्र दलाई लामा के चित्र घरों में लगाते हैं उन तिब्बतियों को चीनी सैनिक, देशद्रोही करार देते हैं और उन पर अत्याचार किया जाता है। पिछले पांच दशकों में ल्हासा में लाखों मुसलमानों को छोटे- छोटे कस्बों में बसाया जा रहा है और तिब्बत के हान प्रान्त में लोगों को बसाना शुरू कर दिया ताकि वहां की जनसंख्या के आंकड़ों को बदलकर दलाई लामा के प्रभाव को कम किया जा सके।

प्रधानमंत्री बनने से पहले अटल बिहारी वाजपेयी तिब्बत को स्वतंत्र देश के रूप में रेखांकित करते थे और पूरा भारत यह मानता था कि चीन ने तिब्बत पर अवैध कब्ज़ा कर रखा है और भारत को यह स्वीकार नहीं है. लेकिन पहली बार 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने तिब्बत को चीन का हिस्सा माना और बदले में चीन ने सिक्किम को भारत का हिस्सा मान लिया है।
यह बात सच है कि भारत तिब्बत के लोगों के लिए बहुत खर्च कर रहा है, उनकी शिक्षा, स्वास्थय पर लाखों रुपए प्रतिवर्ष खर्च किया जा रहा है, हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में तिब्बती लोगों की कई कालोनियां बसी हुई हैं, यहाँ तक कि कुछ लोगों को वोट डालने का अधिकार भी दिया गया है।
लेकिन फिर भी भारत खुलकर तिब्बत की आजादी का समर्थन नहीं कर रहा है इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि वर्ष 2017 में भारत और चीन के बीच 85 अरब डॉलर से अधिक का व्यापार है। आंकड़ों के मुताबिक, चीन में भारत का निर्यात सालाना आधार पर 39.11 प्रतिशत बढ़कर 16.34 अरब डॉलर हो गया है वहीँ चीन से भारत का आयात 14.59 प्रतिशत बढ़कर 68.10 अरब डॉलर हो गया।
ऐसे में अगर भारत चीन से साथ तिब्बत के मामले को लेकर रिश्ते ख़राब करता है तो भारत के बाजार को धक्का लगेगा और चीन से भारत को मिलने वाले सस्ते मैन्युफैक्चरिंग उत्पाद बंद हो जायेंगे जिससे भारत में मुद्रा स्फीति बढ़ जाएगी जो कि सरकार के लिए नुकसानदेह होगी।
लेकिन दोनों देशों के बीच व्यापार की चिंता केवल भारत को करने के जरुरत नहीं हैं. जिस प्रकार चीन, भारत के खिलाफ CPEC, दक्षिण चीन समुद्री विवाद, अरुणाचल प्रदेश सीमा विवाद, NSG और संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी सदस्यता का विरोध इत्यादि कर रहा है तो फिर भारत को भी समय की जरुरत को ध्यान में रखते हुए तिब्बत की आजादी का समर्थन करना चाहिए इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के प्रभुत्व में वृद्धि होगी।

चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा
राष्ट्रीय महामंत्री पंकज गोयल ने आगे कहा कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) पाकिस्तान के ग्वादर से लेकर चीन के शिनजियांग प्रांत के काशगर तक लगभग 2442 किलोमीटर लम्बी एक वाणिज्यिक परियोजना शुरू की है l इस परियोजना की लागत 46 अरब डॉलर आंकी जा रही है l इस परियोजना का प्रमुख उद्येश्य रेलवे और हाइवे के माध्यम से तेल और गैस का कम समय में वितरण करना है।
चीन इस परियोजना के लिए पाकिस्तान में इतनी बड़ी मात्रा में पैसा निवेश कर रहा है कि वो साल 2008 से पाकिस्तान में होने वाले सभी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के दोगुने से भी ज़्यादा हैl चीन का यह निवेश साल 2002 से अब तक पाकिस्तान को अमरीका से मिली कुल आर्थिक सहायता से भी ज़्यादा हैl
विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पाकिस्तान में रोज़गार के अवसरों में वृद्धि होगी और पिछले तीन दशकों से ख़राब हालत में चल रही पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को संजीवनी देने का काम करेगा l इस महत्वाकांक्षी परियोजना को चीन द्वारा “वन बेल्ट एंड वन रोड” या नई सिल्क रोड परियोजना भी कहा जाता है l नवम्बर 2016 में शुरू हुई इस परियोजना के तहत चार लेन के वाहन मार्ग की आधारशिला रखी गई है।
भारत द्वारा इसका विरोध इस कारण किया जा रहा है क्योंकि यह गलियारा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) के गिलगित-बाल्टिस्तान और पाकिस्तान के विवादित क्षेत्र बलूचिस्तान से होते हुए जायेगा। यातायात और ऊर्जा का मिला-जुला यह प्रोजेक्ट समंदर में बंदरगाह को विकसित करेगा जो भारतीय हिंद महासागर तक चीन की पहुंच का रास्ता खोल देगाl

चीन को इस परियोजना से क्या फायदा होगा?
1. चीनियों के लिए यह रिश्ता रणनीतिक महत्व का हैl यह गलियारा चीन को मध्यपूर्व और अफ़्रीका तक पहुंचने का सबसे छोटा रास्ता मुहैया कराएगा, जहां हज़ारों चीनी कंपनियां कारोबार कर रही हैंlइस परियोजना से शिनजिंयाग को भी कनेक्टिविटी मिलेगी और सरकारी एवं निजी कंपनियों को रास्ते में आने वाले पिछड़े इलाकों में अपनी आर्थिक गतिविधियां चलाने का मौका मिलेगा, जिससे रोज़गार के अवसर पैदा होंगेl
2. अमेरिका द्वारा पाकिस्तान पर शिकंजा कसते हुए उसकी आर्थिक सहायता में कमी कर दी गयी है l दूसरी ओर भारत की अमेरिका से बढती नजदीकी के बीच चीन पाकिस्तान के साथ अपने रिश्ते और भी मीठे करने में लगा है l चीन, पाकिस्तान के विकास को बढ़ावा देकर भारत पर दबाव बढ़ाना चाहता है l
3. वर्तमान में मध्यपूर्व, अफ़्रीका और यूरोप तक पहुंचने के लिए चीन के पास एकमात्र व्यावसायिक रास्ता मलक्का जलडमरू है; यह लंबा होने के आलावा युद्ध के समय बंद भी हो सकता हैl
4. चीन एक पूर्वी गलियारे के बारे में भी कोशिश कर रहा है जो म्यांमार, बांग्लादेश और संभवतः भारत से होते हुए बंगाल की खाड़ी तक जाएगाl
पाकिस्तान को क्या फायदा होगा
1. रोजगार के अवसर बढ़ेंगे
2. आधारभूत संरचना का विकास बढेगा
3. अमेरिका द्वारा दी जाने वाली आर्थिक सहायता पर निर्भरता कम होगी
4. पाकिस्तान के चीन के मधुर रिश्ते होने के कारण भारत पर दबाव बनाने का प्रयास किया जायेगा
5. अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा चीन और पाकिस्तान के बीच आर्थिक संबंधों की दिशा में एक नया अध्याय है और यह बढती प्रगाढ़ता भारत के लिए चिंता का विषय बन सकती है क्योंकि इस गलियारे के माध्यम से चीन की पहुँच हिन्द महासागर तक हो जायेगी जो कि भारत के लिए कभी भी शुभ खबर नही कही जा सकती है l
उन्होंने आगे बताया कि जब भारत ने सिन्धु जल समझौते को तोड़ने की बात कही तो चीन ने भी कह दिया कि वह ब्रह्मपुत्र नदी की एक सहायक नदी को बंद कर देगा। चीन के इस कदम से भारत के असम, सिक्कम और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में पानी की आपूर्ति में कमी आ सकती है जिससे इन राज्यों में पानी की कमी होने से आम जन-जीवन, कृषि और उद्योग बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं।

तिब्बत की आज़ादी वर्तमान भारत के किये बेहद आवश्यक
भारत-तिब्बत-सहयोग मंच प्रत्येक वर्ष भारत के लोगों को त्वांग यात्रा द्वारा जागृत करता है कि ‘तिब्बत की आजादी ही भारत की सुरक्षा है’। यह भी भारत के लोग याद रखें कि भारत की 4000 वर्ग किलोमीटर सीमा आज चीन से लग रही है। 1950 से पहले भारत की यह सीमा सिर्फ तिब्बत-एक स्वतंत्र देश से लगती थी। चीन ने तिब्बत को हड़प लिया।
तिब्बत को अपने नक्शे में शामिल कर लिया, तिब्बत का अस्तित्व मिटा दिया। भारत हमेशा-हमेशा के लिए चीन की विस्तारवादी नीति से डरने लगा। चीन की कुदृष्टि अरुणाचल, सिक्किम और भूटान पर है। अत: पिछले कई सालों से भारत-तिब्बत-सहयोग मंच भारत की जनता को जागृत करने और चीन को चेतावनी देने हेतु 18 नवम्बर से 24 नवम्बर के बीच त्वांग यात्रा का आयोजन करता आ रहा है। देश भर से हजारों नौजवान इस यात्रा में भाग लेते हैं।
चीन ने तिब्बत की सभ्यता और संस्कृति को कम्युनिज्म में तबदील कर दिया है। चीन की रिपब्लिक-आर्मी वहां के नौजवानों को वामपंथी रंग में रंग कर तिब्बत की मौलिकता, वहां की वनस्पति को नष्ट कर रही है। तिब्बती जनसंख्या में असंतुलन पैदा कर दिया है। हजारों तिब्बती नौजवानों को यातना शिविरों में यातनाएं दी जा रही हैं।
ऐसी बर्बरता मानवता पर कलंक है और भारत तिब्बत सहयोग मंच की त्वांग यात्रा चीन की इन्हीं ज्यादतियों को उजागर करने का एक प्रयास है। जहां कांग्रेस के नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में ‘भारत जोड़ो’ यात्रा कर रहे हैं वहीं भारत-तिब्बत-सहयोग मंच ‘त्वांग यात्रा’ द्वारा एक अद्भुत संदेश देश की जनता को और एक अनोखी चेतावनी चीन को देता है।
हमें इस मंच से यह भी प्रचार करना है कि भारत के लोग चीनी वस्तुओं का अधिक से अधिक बहिष्कार करें। यह तो है कि चीन आए दिन हमारी सीमाओं पर छेडख़ानी कर रहा है। चीन का कहना है कि जहां भी हम जाएं, जहां भी उसकी सेनाएं जाएं, वही उसकी सीमा रेखा है। 1914 में चीन ने जिस ‘मैक मोहन लाइन’ को शिमला-समझौते में मान्यता दी थी उसी मैक मोहन लाइन को वह नहीं मान रहा। विस्तारवाद उसकी नस-नस में भरा है।
अत: भारत-तिब्बत-सहयोग मंच ‘यह भी मांग करता है कि तिब्बत के निर्वाचित धर्मगुरु परम-पावन दलाई लामा को बातचीत के लिए आमंत्रित करे। तिब्बत-समस्या का कोई सम्मानजनक हल निकले। लोग यह भी याद रखें कि त्वांग छठे दलाईलामा की जन्मस्थली भी है अत: उस मिट्टी का स्पर्श करना ही पुण्य का भागी बनना है।
तिब्बत आजाद हुआ तो भारत अपने आप चीन से सुरक्षित हो जाएगा। समय बड़ा बलवान है। भारत-तिब्बत-सहयोग मंच ने एक मंत्र फूंक दिया कि तिब्बत आजाद हो, भारत अखंड हो तो एक न एक दिन अवश्य होगा। परम पावन दलाई लामा अपने देश लौटेंगे, भिन्न-भिन्न देशों में शरण लिए तिब्बत के लोग एक दिन अवश्य अपनी आजादी का आनंद लेंगे। कौन तूफानों को रोक पाया?
कार्यक्रम में प्रमुख रूप से जिलाध्यक्ष प्रदीप जैन जी, लवली धमीजा, संदीप जी, जयति गुप्ता, रश्मि चौधरी, इत्यादि सैकड़ो कार्यकर्ता एवं पदाधिकारी उपस्थित रहे।










