वीर बाल दिवस: साहिबजादों के बलिदान को याद कर भावुक हुए पीएम मोदी

“दिसंबर की यह ठिठुरती ठंड भारत के इतिहास में केवल ठिठुरन की नहीं, बल्कि उस ‘तपिश’ की याद दिलाती है जिसने मुगलिया सल्तनत की जड़ें हिला दी थीं”

नई दिल्ली 27 / 12 / 2025 संतोष सेठ की रिपोर्ट 

नई दिल्ली के भारत मंडपम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘वीर बाल दिवस’ पर संबोधन केवल एक सरकारी कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था, बल्कि यह भारत की नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने और दशकों पुरानी ‘मानसिक गुलामी’ की बेड़ियों को तोड़ने का एक खुला आह्वान था।

शौर्य की पराकाष्ठा: उम्र छोटी, संकल्प हिमालय सा

प्रधानमंत्री ने साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह के बलिदान को याद करते हुए उस मूलभूत अंतर को रेखांकित किया, जो सत्य और असत्य के बीच था। एक तरफ औरंगजेब की सत्ता का अहंकार था और दूसरी तरफ गुरु गोविंद सिंह जी के साहिबजादों की नैतिकता।

यह महज एक युद्ध नहीं था; यह धार्मिक कट्टरता के खिलाफ मानवीय मूल्यों की जीत थी। आज जब देश वीर बाल दिवस मना रहा है, तो यह संदेश स्पष्ट है कि महानता उम्र की मोहताज नहीं होती, बल्कि कर्मों से परिभाषित होती है।

प्रधानमंत्री ने साहिबजादा अजीत सिंह जी, जुझार सिंह जी, जोरावर सिंह जी और फतेह सिंह जी को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि साहिबजादों ने छोटी उम्र में मुगल साम्राज्य की धार्मिक कट्टरता और आतंक के विरुद्ध चट्टान की तरह खड़े होकर मानवता और सत्य की रक्षा की।

  • ऐतिहासिक संदर्भ: यह दिन विशेष रूप से बाबा जोरावर सिंह जी और बाबा फतेह सिंह जी की शहादत को याद करने के लिए मनाया जाता है, जिन्हें दीवार में जिंदा चुनवा दिया गया था लेकिन उन्होंने अपना धर्म और आदर्श नहीं छोड़ा।

  • परंपरा की शुरुआत: पीएम मोदी ने 9 जनवरी 2022 को इस दिवस की घोषणा की थी। उन्होंने संतोष व्यक्त किया कि पिछले 4 वर्षों में यह परंपरा युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है।

प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार (PMRBP) 2025

इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने देश भर के 20 प्रतिभावान बच्चों को ‘प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार’ से सम्मानित किया। ये पुरस्कार निम्नलिखित श्रेणियों में दिए गए:

  • असाधारण वीरता: कठिन परिस्थितियों में साहस दिखाने के लिए।

  • नवाचार (Innovation): विज्ञान और प्रौद्योगिकी में नए प्रयोग।

  • समाज सेवा और पर्यावरण: सामुदायिक सुधार और प्रकृति संरक्षण के लिए।

  • कला, संस्कृति और खेल: राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्धियां।

गुलामी की मानसिकता से मुक्ति का संकल्प

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में मैकाले की शिक्षा नीति (1835) का उल्लेख करते हुए कहा कि अंग्रेजों ने भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को दबाने का प्रयास किया था।

  • 2035 का लक्ष्य: पीएम ने कहा कि 2035 में मैकाले की साजिश के 200 साल पूरे होंगे, और अगले 10 वर्षों में भारत पूरी तरह ‘गुलामी की मानसिकता’ से मुक्त हो जाएगा।

  • भाषाई शक्ति: हाल ही में संसद के शीतकालीन सत्र में 160 भाषणों का क्षेत्रीय भाषाओं (तमिल, मराठी, बांग्ला आदि) में दिया जाना इस बदलाव का प्रतीक है।

नई शिक्षा नीति और युवा भारत (MyBharat)

पीएम मोदी ने बताया कि कैसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) रटने के बजाय सोचने और प्रश्न पूछने की क्षमता विकसित कर रही है।

  • अटल टिंकरिंग लैब्स: स्कूली स्तर पर रोबोटिक्स, AI और डिजाइन थिंकिंग को बढ़ावा।

  • मातृभाषा में शिक्षा: विषयों को बेहतर समझने के लिए अपनी भाषा में पढ़ने का विकल्प।

  • प्लेटफॉर्म्स: युवाओं के लिए ‘मेरा युवा भारत’ (MyBharat), ‘स्टार्टअप इंडिया’ और ‘खेलो इंडिया’ जैसे मंच उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

मैकाले की साजिश और 2035 का लक्ष्य

प्रधानमंत्री का लॉर्ड मैकाले का उल्लेख करना बेहद महत्वपूर्ण है। 1835 में जिस शिक्षा पद्धति की नींव भारतीय मानस को ‘बौद्धिक दास’ बनाने के लिए रखी गई थी, उसका प्रभाव आजादी के बाद भी बना रहा।

पीएम मोदी ने अगले 10 वर्षों (2035 तक) में भारत को इस मानसिकता से पूर्णतः मुक्त करने का जो लक्ष्य रखा है, वह ‘विकसित भारत’ की अनिवार्य शर्त है। संसद में क्षेत्रीय भाषाओं की गूंज इस बात का प्रमाण है कि भारत अब अपनी भाषाई विविधता को कमजोरी नहीं, बल्कि शक्ति मान रहा है।

जेनरेशन जेड (Gen Z) और आत्मनिर्भर भारत

पीएम ने ‘जेनरेशन जेड’ और ‘जेनरेशन अल्फा’ को विकसित भारत का ध्वजवाहक बताया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के माध्यम से रटने की पद्धति को छोड़कर ‘क्रिटिकल थिंकिंग’ और ‘नवाचार’ (AI, रोबोटिक्स) पर जोर देना यह दर्शाता है कि भारत अब केवल पिछलग्गू नहीं, बल्कि विश्व का नेतृत्व करने वाला ‘क्रिएटर’ बनना चाहता है।

‘वीर बाल दिवस’ केवल अतीत को याद करने का दिन नहीं है, बल्कि यह भविष्य के निर्माण का ब्लूप्रिंट है। साहिबजादों का बलिदान हमें सिखाता है कि कठिन रास्ते पर भी अडिग कैसे रहा जाता है।

प्रधानमंत्री का यह संबोधन भारत की युवा शक्ति को यह विश्वास दिलाने का प्रयास है कि उनके पास न केवल गौरवशाली अतीत है, बल्कि एक उज्ज्वल और आत्मनिर्भर भविष्य की चाबी भी है।

अब समय आ गया है कि भारत के नायक हाशिए पर न रहें, बल्कि वे हर भारतीय के गौरव का हिस्सा बनें।

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