सपा में टूट की अटकलें : जानें राजभर और मौर्य के दावों की सच्चाई
यूपी की सियासत में ‘टूट’ का शोर: ओम प्रकाश राजभर और मौर्य के दावों के बीच जानें क्यों असंभव है सपा में बगावत?
लखनऊ: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों दल-बदल और समाजवादी पार्टी (SP) में बड़ी टूट की चर्चाएं जोरों पर हैं।
प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के लगातार आ रहे बयानों ने सियासी हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है।
महाराष्ट्र में शिवसेना (UBT) और पश्चिम बंगाल में टीएमसी (TMC) के भीतर मचे घमासान के बीच सपा को लेकर भी ऐसे ही दावे किए जा रहे हैं।
लेकिन, मौजूदा राजनीतिक हालात और संसदीय गणित को करीब से देखा जाए, तो समाजवादी पार्टी में बड़ी टूट की संभावना फिलहाल बेहद कम या यूं कहें कि लगभग नामुमकिन नजर आती है।
क्या हैं राजभर और मौर्य के दावे?
सत्ताधारी खेमे के इन दो बड़े नेताओं ने हाल ही में सपा नेतृत्व पर जोरदार हमला बोला था:
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ओम प्रकाश राजभर का दावा: राजभर ने दावा किया कि सपा महासचिव रामगोपाल यादव ने गृह मंत्री अमित शाह को उन सांसदों के नाम भेजे हैं, जो बीजेपी में आना चाहते हैं।
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उन्होंने यह भी कहा कि सपा में होने वाले विद्रोह का नेतृत्व ‘बागी बलिया का लाल’ करेगा (इशारा सपा सांसद सनातन पांडेय की ओर)।
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केशव प्रसाद मौर्य का दावा: मौर्य ने दावा किया है कि सपा के 25 से 26 सांसद अलग होने के लिए तैयार बैठे हैं और 2027 के विधानसभा चुनाव के बाद वे अपने आप अलग हो जाएंगे।
हालांकि, अखिलेश यादव और खुद सांसद सनातन पांडेय ने इन दावों को पूरी तरह से भ्रामक और बीजेपी की ‘ध्यान भटकाने वाली रणनीति’ करार दिया है।
सपा में बड़ी टूट आखिर क्यों है नामुमकिन?
1. दलबदल कानून की बड़ी बाधा
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भारत के ‘दलबदल विरोधी कानून’ के तहत किसी भी संसदीय दल में वैध टूट के लिए कम से कम दो-तिहाई (2/3) सांसदों का समर्थन अनिवार्य होता है।
2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने 37 सीटें जीती हैं। ऐसे में बगावत को वैध बनाने के लिए एक साथ कम से कम 25 सांसदों को पार्टी छोड़नी होगी, जो कि एक बेहद कठिन काम है।
2. अखिलेश यादव का मजबूत नेतृत्व और परिवार
सपा के 37 सांसदों में से 5 तो सीधे अखिलेश यादव के परिवार से ही हैं (अखिलेश यादव, डिंपल यादव, धर्मेंद्र यादव, आदित्य यादव और अक्षय यादव)।
इसके अलावा पार्टी के 4 मुस्लिम और कई दलित व ओबीसी सांसद हैं, जिनकी राजनीतिक पहचान और सफलता सीधे तौर पर अखिलेश यादव और ‘साइकिल’ चुनाव चिह्न से जुड़ी है।
3. टीएमसी और शिवसेना से अलग हैं हालात
टीएमसी और शिवसेना (UBT) की परिस्थितियां सपा से बिल्कुल अलग हैं। शिवसेना में एकनाथ शिंदे पहले से ही एक बहुत बड़ा और मजबूत शक्ति केंद्र थे।
वहीं, समाजवादी पार्टी में वर्तमान में अखिलेश यादव के कद का कोई दूसरा समानांतर नेता मौजूद नहीं है, जो 25 सांसदों को अपने साथ गोलबंद कर सके।
जानकारों का मानना है कि इक्का-दुक्का नेताओं का पाला बदलना आम बात है, लेकिन बड़ी संख्या में टूट फिलहाल संभव नहीं है।
एनडीए (NDA) के इन बयानों को 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की सियासी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।











