12 साल में तीसरी बड़ी 'बैकफुट' घटना

NEET विवाद: 12 साल में तीसरी बार जनआंदोलन के आगे झुकी मोदी सरकार

NEET विवाद: छात्र शक्ति के आगे झुकी मोदी सरकार, प्रधान का इस्तीफा 12 साल में तीसरी बड़ी ‘बैकफुट’ घटना; समझें पूरी इनसाइड स्टोरी”

नई दिल्ली: केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सिर्फ एक मंत्री का पद छोड़ना नहीं है, बल्कि यह उस प्रचंड राजनीतिक और सामाजिक दबाव का प्रतीक बन गया है, जिसने केंद्र की शक्तिशाली मोदी सरकार को पिछले 12 वर्षों में तीसरी बार एक बड़े जनआंदोलन के सामने पीछे हटने पर मजबूर कर दिया है।

 

नीट-यूजी (NEET-UG) 2026 प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ देश भर में भड़के छात्र आंदोलन ने यह साबित कर दिया है कि व्यापक, लगातार और संगठित जनदबाव आज भी लोकतांत्रिक राजनीति की दिशा बदलने की क्षमता रखता है।

राजनीतिक विश्लेषक इसे मोदी सरकार के कार्यकाल की तीसरी सबसे बड़ी घटना मान रहे हैं जब सरकार को सीधे तौर पर ‘बैकफुट’ पर आना पड़ा है।

मोदी सरकार के पीछे हटने की ‘हैट्रिक’

पिछले 12 सालों के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें, तो ऐसे तीन बड़े मौके आए हैं जब सरकार को जनता के गुस्से के आगे झुकना पड़ा:

  • CAA-NRC का देशव्यापी विरोध: सबसे पहला बड़ा उदाहरण नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) को लेकर था।
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  • जब पूरे देश में इसका व्यापक विरोध हुआ, तो खुद प्रधानमंत्री को कहना पड़ा कि NRC लागू करने का कोई निर्णय नहीं लिया गया है।
  • भले ही अधिसूचना वापस नहीं हुई, लेकिन राजनीतिक रूप से यह सरकार के कदम पीछे खींचने का स्पष्ट संकेत था।
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  • ऐतिहासिक किसान आंदोलन: सरकार को दूसरी बार किसानों के ऐतिहासिक आंदोलन के सामने झुकना पड़ा।
  • करीब एक साल तक चले इस आंदोलन को शुरुआत में सीमित और कमजोर आंका गया, लेकिन अंततः प्रधानमंत्री ने खुद तीनों कृषि कानून वापस लिए और क्षमा भी मांगी।
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  • NEET प्रश्नपत्र लीक (छात्र आंदोलन): अब शिक्षा मंत्रालय और प्रश्नपत्र लीक के मुद्दे पर युवाओं का यह आंदोलन इस क्रम की तीसरी बड़ी घटना बनकर उभरा है, जिसने अंततः शिक्षा मंत्री की कुर्सी छीन ली।
  • (नोट: नीतिगत मामलों से अलग बात करें तो, यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद जनदबाव में विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर का इस्तीफा भी इसी क्रम का हिस्सा था।)

क्या है सरकार का ‘पॉलिटिकल पैटर्न’?

इन सभी घटनाओं में सरकार की एक समान राजनीतिक कार्यशैली (पैटर्न) दिखाई देती है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मोदी सरकार शुरुआती दौर में विरोध को कमतर आंकती है और आंदोलन की नैतिक शक्ति को स्वीकार करने से बचती है।

वह तब तक अपने सख्त रुख पर कायम रहती है, जब तक ‘विरोध की राजनीतिक कीमत, पीछे हटने की कीमत से अधिक नहीं हो जाती।’

क्यों अलग और अजेय रहा यह छात्र आंदोलन?

कृषि या CAA आंदोलन के विपरीत, इस छात्र आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत इसका ‘चेहराविहीन’ (Faceless) होना था।

  • कोई नेता नहीं: यह स्वतःस्फूर्त और युवाओं द्वारा संचालित आंदोलन था। किसी एक संगठन या नेता का इस पर नियंत्रण नहीं था, इसलिए सरकार पारंपरिक ‘टेबल-टॉक’ या समझौता नहीं कर सकी।

  • सोशल मीडिया बना हथियार: युवाओं ने व्यंग्य, मीम्स और छोटे वीडियो के जरिए आंदोलन को नई सांस्कृतिक पहचान दी, जो सरकारी प्रचार से कहीं अधिक प्रभावी साबित हुआ।

  • पुलिस की सख्ती पड़ी उल्टी: 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई ने आंदोलन को कुचलने के बजाय आग में घी का काम किया।

  • जब सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने अपना रुख नरम किया, तब भी छात्र डटे रहे, जो बताता है कि यह आंदोलन किसी एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं था।

बीजेपी के भीतर असहजता की असली वजह

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के पीछे एक बड़ी वजह भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर पनप रही असहजता भी थी।

इस आंदोलन में सड़कों पर उतरने वाले ज्यादातर युवा मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग के थे—जो भाजपा का सबसे मजबूत ‘कोर वोटर बेस’ माना जाता है।

सरकार वैचारिक विरोधियों को तो नजरअंदाज कर सकती है, लेकिन जब अपने ही समर्थक वर्ग में असंतोष उबलने लगे, तो खतरे की घंटी बज जाती है।

हालांकि, सरकार से जुड़े सूत्रों का दावा है कि यह इस्तीफा एक व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है ताकि युवाओं की नाराजगी को कम किया जा सके।

कारण जो भी हो, लेकिन जंतर-मंतर से उठी छात्रों की इस आंधी ने भारतीय राजनीति के समीकरणों को एक बार फिर से बदल कर रख दिया है।

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