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कोलकाता: अवैध निर्माण और ‘रेगुलराइजेशन’ पर बवाल, नगर निगम में घमासान

कोलकाता: अवैध निर्माण पर बुलडोजर एक्शन से नगर निगम में घमासान, ‘रेगुलराइजेशन’ नियमों में स्पष्टता की उठी मांग”

कोलकाता: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

पश्चिम बंगाल में बदलते राजनीतिक समीकरणों का सीधा असर अब कोलकाता नगर निगम (KMC) के भीतर भी देखने को मिल रहा है।

शहर में अवैध निर्माण के खिलाफ चल रही ताबड़तोड़ ‘बुलडोजर कार्रवाई’ के बीच अब ‘रेगुलराइजेशन’ (जुर्माना लेकर अवैध निर्माण को वैध करने) के नियमों को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है।

हालात यह हैं कि निगम के भीतर ही सत्ता के दो केंद्र नजर आ रहे हैं। आरोप लग रहे हैं कि मेयर फिरहाद हाकिम को दरकिनार कर कई इलाकों में अवैध निर्माण तोड़े जा रहे हैं।

हाल ही में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ नेता अभिषेक बनर्जी के पारिवारिक पते पर भी नोटिस जारी होने के बाद यह मामला और ज्यादा राजनीतिक रूप ले चुका है।

कानून में अस्पष्टता बनी भ्रष्टाचार का हथियार

इस पूरे विवाद की जड़ कोलकाता नगर निगम के 2015 में लागू किए गए ‘रेगुलराइजेशन ऑफ बिल्डिंग’ (Regularisation of Building) नियम हैं।

इन नियमों में ‘माइनर डिविएशन’ (छोटे नियम उल्लंघन) को जुर्माने के साथ वैध करने का प्रावधान किया गया था।

लेकिन, सबसे बड़ी समस्या यह है कि कानून में कहीं भी यह स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया कि ‘छोटा उल्लंघन’ आखिर कितना होता है।

निगम के ही कई अधिकारियों का अब दबी जुबान में कहना है कि इसी कानूनी अस्पष्टता का फायदा उठाकर शहर में कई बड़े अवैध निर्माणों को भी वैध कर दिया गया।

आरोप यह भी है कि कुछ मामलों में राजनीतिक रसूख और भारी आर्थिक लेन-देन के जरिए नियमों को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया।

अधिकारियों की मांग: नियमों में हो स्पष्ट संशोधन

बदलते माहौल के बीच अब निगम के भीतर से ही यह मांग उठने लगी है कि कानून में स्पष्ट संशोधन किया जाए। अधिकारियों का मानना है कि यह तय होना चाहिए कि कितना अतिरिक्त निर्माण ‘माइनर’ या छोटा माना जाएगा।

इसके अलावा ऊंचाई (Height) या साइड स्पेस (Side Space) में कितनी छूट मिलेगी और इनका माप कैसे तय किया जाएगा, यह पूरी तरह से स्पष्ट होना चाहिए।

अधिकारियों का तर्क है कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और नियमों के मनमाने दुरुपयोग पर लगाम लगेगी।

सुप्रीम कोर्ट भी जता चुका है सख्त ऐतराज

अवैध निर्माण को वैध करने की इस प्रवृत्ति पर देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) भी कई बार सख्त टिप्पणी कर चुकी है।

सुप्रीम कोर्ट साफ कर चुका है कि अवैध निर्माण को वैध करना नियम नहीं, बल्कि एक अपवाद होना चाहिए।

लगातार रेगुलराइजेशन से लोगों में कानून तोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ती है, जिससे पूरे शहर की अर्बन प्लानिंग (शहरी योजना) बुरी तरह प्रभावित होती है।

अन्य राज्यों का मॉडल और आगे की राह

भारत के कई अन्य राज्यों जैसे महाराष्ट्र, दिल्ली, कर्नाटक, तेलंगाना और गुजरात में भी अवैध निर्माण को वैध करने की व्यवस्था है, लेकिन वहां शर्तें और सीमाएं स्पष्ट हैं। ज्यादातर मामलों में केवल सीमित और स्पष्ट उल्लंघन को ही मंजूरी दी जाती है।

अब कोलकाता में जारी इस सियासी और प्रशासनिक घमासान के बीच सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या नगर निगम अपने नियमों में बदलाव कर कोई सख्त और स्पष्ट नीति लेकर आता है, या फिर राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई में ‘रेगुलराइजेशन’ का यह विवाद यूं ही जारी रहेगा।

Santosh SETH

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