Advanced Sewage Treatment Plant (STP) processing used wastewater to produce clean recycled water for agriculture and industrial use in India

वेस्टवॉटर से आगे : इस्तेमाल किए गए पानी को संसाधन में बदलना

अब बेकार नहीं जाएगा गंदा पानी: शहरों में ‘यूज़्ड वॉटर मैनेजमेंट’ से बदल रही तस्वीर, जानिए कैसे वेस्टवॉटर बन रहा है कीमती संसाधन”

नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बीच पानी का संकट एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। लेकिन क्या घरों, कारखानों और नालियों से निकलने वाला गंदा पानी सच में ‘बेकार’ है?

‘स्वच्छ भारत मिशन-अर्बन 2.0’ (SBM-U) के तहत अब इस सोच को पूरी तरह से बदला जा रहा है। ‘यूज़्ड वॉटर मैनेजमेंट’ (UWM) के जरिए अब इस्तेमाल किए जा चुके पानी का उपचार (Treatment) और पुनर्चक्रण (Recycling) कर इसे खेती, उद्योगों और बागवानी के लिए एक कीमती संसाधन में बदला जा रहा है।

यह पहल न केवल पर्यावरण को बचा रही है, बल्कि ‘सर्कुलर इकॉनमी’ (चक्रीय अर्थव्यवस्था) की मजबूत नींव भी रख रही है।

4,900 MLD ट्रीटमेंट क्षमता बढ़ाने के लिए ₹11,785 करोड़ मंजूर

गंदे पानी को सीधे नदियों और झीलों में जाने से रोकने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) अहम भूमिका निभा रहे हैं।

‘स्वच्छ भारत मिशन 2.0’ के तहत, छोटे शहरों में एसटीपी लगाने के लिए केंद्र सरकार ने ₹11,785 करोड़ की लागत वाली परियोजनाओं को मंजूरी दी है।

इससे प्रतिदिन 4,900 मिलियन लीटर (MLD) पानी के उपचार की क्षमता बढ़ेगी। इसके साथ ही, शहरों को ‘वॉटर प्लस’ और ओडीएफ++ (ODF++) सर्टिफिकेशन हासिल करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, जो यह सुनिश्चित करता है कि बिना उपचार के कोई भी गंदा पानी प्राकृतिक स्रोतों में न बहे।

देश के इन शहरों ने पेश की वेस्टवॉटर मैनेजमेंट की शानदार मिसाल:

1. जयपुर (देहालावास STP):

राजस्थान की राजधानी जयपुर में 215 एमएलडी की क्षमता वाला देहालावास सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) काम कर रहा है।

पूरी तरह से स्वचालित इस प्लांट में गंदे पानी को साफ कर दोबारा इस्तेमाल लायक बनाया जाता है। उपचारित पानी का इस्तेमाल औद्योगिक प्रक्रियाओं और पास की कॉलोनियों में बागवानी के लिए हो रहा है, जबकि बाकी साफ पानी द्रव्यवती नदी में छोड़ा जा रहा है।

2. इंदौर: भारत का पहला ‘वॉटर+’ शहर:

स्वच्छता में हमेशा नंबर वन रहने वाले इंदौर ने वेस्टवॉटर मैनेजमेंट में भी बाजी मारी है। शहर में 200 किलोमीटर से अधिक का पाइप नेटवर्क बिछाकर अनुपचारित पानी का पर्यावरण में जाना पूरी तरह बंद कर दिया गया है।

यहां उपचारित पानी का उपयोग बगीचों, सड़कों की धुलाई और सीवर मशीनों की सफाई के लिए किया जा रहा है।

3. सूरत: गंदे पानी से हो रही आर्थिक कमाई:

सूरत ने गंदे पानी को आर्थिक मूल्य (Economic Value) के रूप में देखा है। 116 एमएलडी क्षमता वाले चार टर्शियरी ट्रीटमेंट प्लांट लगाकर सूरत उद्योगों को सीधे पाइपलाइन के जरिए यह साफ पानी बेच रहा है, जिससे ताजे पानी पर उद्योगों की निर्भरता घटी है।

4. तिरुपति: आत्मनिर्भर एसटीपी मॉडल:

आंध्र प्रदेश के तिरुपति में ₹19 करोड़ की लागत से बना 50 एमएलडी का एसटीपी एक आत्मनिर्भर (Self-sustaining) मॉडल पर काम कर रहा है।

यह प्लांट 5 एमएलडी उपचारित पानी एक निजी कंपनी (श्रीकालाहस्ती पाइप्स) को बेचता है, जिससे हर महीने 6 लाख रुपये की कमाई होती है। इसके अलावा 18 एमएलडी पानी किसानों को सिंचाई के लिए मुफ्त दिया जा रहा है।

5. नवी मुंबई: 100% मशीनीकृत सफाई और पुन: उपयोग:

महाराष्ट्र के नवी मुंबई ने सीवर लाइनों और सेप्टिक टैंकों की 100% मशीनीकृत सफाई हासिल कर ली है।

यहां उत्पन्न उपचारित पानी का 30% से अधिक हिस्सा शहर के 30 बगीचों, परिवहन बसों की धुलाई और सड़क के डिवाइडरों की सफाई में इस्तेमाल हो रहा है।

निष्कर्ष: शहरी जल प्रबंधन की कहानी अब केवल प्रदूषण रोकने तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘वेस्ट’ (कचरे) को ‘वेल्थ’ (संपत्ति) में बदलने की है।

यह बदलाव एक स्वच्छ और जल-सुरक्षित भारत की दिशा में एक बड़ा कदम है।