Women working at the Pink MRF facility in Patna and transgender individuals operating a septage treatment plant in Odisha

महिला और ट्रांसजेंडर समुदाय ने ‘स्वच्छता’ को बनाया सम्मान का जरिया

कूड़े के ढेर से उभरती सफलता की कहानियां: महिला और ट्रांसजेंडर समुदाय ने ‘स्वच्छता ही सेवा’ को बनाया रोजगार और सम्मान का जरिया”

नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

जब हम ‘स्वच्छता’ शब्द सुनते हैं, तो अक्सर हमारे दिमाग में साफ सड़कें, खाली कूड़ेदान और बहती हुई नालियों की तस्वीर उभरती है।

लेकिन इस स्वच्छता के पीछे की वो कहानियां अक्सर छिपी रह जाती हैं, जो असल में समाज की तस्वीर बदल रही हैं। ‘

स्वच्छता ही सेवा 2026′ अभियान (17 सितंबर से शुरू) के तहत, देशभर से ऐसी प्रेरणादायक कहानियां सामने आ रही हैं जहां कूड़ा (Waste) अब सिर्फ गंदगी नहीं,

बल्कि महिलाओं और ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए रोजगार, उद्यम और सम्मान का बड़ा जरिया बन गया है।

इस साल की थीम “स्वच्छता में सहभाग; स्वच्छ भारत, विकसित भारत” को जमीन पर उतारने वाली कुछ अनूठी और बेमिसाल कहानियां यहां प्रस्तुत हैं:

1. लोनी (यूपी): गाय के गोबर से अगरबत्ती, धूप और रोजगार

  • उत्तर प्रदेश के लोनी की कृष्णा विहार कॉलोनी की महिलाओं ने कचरा प्रबंधन की एक बड़ी चुनौती— गाय के गोबर— को एक अवसर में बदल दिया।
  • इन महिलाओं ने गोबर से अगरबत्ती और लोबान कप बनाना शुरू किया। जो पहल सिर्फ 8-10 महिलाओं से शुरू हुई थी, वह आज गर्मियों के मौसम में 40-50 महिलाओं को रोजगार दे रही है।
  • नगर पालिका परिषद ने इन महिलाओं को गौशालाओं से जोड़ा और अब इन उत्पादों की सप्लाई दिल्ली, पंजाब, गुजरात से लेकर दक्षिण अफ्रीका और मॉरिशस तक हो रही है।
  • लकड़ी के बुरादे की जगह गोबर का 30-35% इस्तेमाल पर्यावरण के लिए भी एक टिकाऊ समाधान बन गया है।
  • अब ये महिलाएं गोबर से श्मशान घाटों के लिए लकड़ी और इको-फ्रेंडली गमले बनाने की तैयारी कर रही हैं।

2. पटना (बिहार): ‘पिंक एमआरएफ’ और मोबाइल पिंक टॉयलेट बिहार की राजधानी पटना में

  • महिलाओं ने पुरानी परंपराओं को तोड़ते हुए ‘पिंक मटीरियल रिकवरी फैसिलिटी’ (MRF) की कमान संभाली है।
  • यह पूरी तरह महिलाओं द्वारा संचालित फैसिलिटी है जो हर दिन 2 टन सूखा और 1.5 टन गीला कचरा प्रोसेस करती है।
  • यहां ‘कैश फॉर वेस्ट’ पहल के जरिए नागरिकों को सूखा कचरा लाने पर भुगतान किया जाता है।
  • इसके अलावा, पटना नगर निगम ने पुरानी और बेकार गाड़ियों को कबाड़ से ‘मोबाइल पिंक टॉयलेट’ में बदलकर 3R (Reduce, Reuse, Recycle) की बेहतरीन मिसाल पेश की है।

3. भोपाल से उत्तराखंड तक: समुदायों को दिशा दिखाती ‘बहनों की सेना’

  • भोपाल (एमपी): 250 महिला ब्रांड एंबेसडर ने सिंगल-यूज़ प्लास्टिक को खत्म करने के लिए 25 वार्डों में ‘बर्तन बैंक’ शुरू किए हैं।

  • वहीं, 60 महिलाओं के ‘स्वच्छता किटी ग्रुप’ ने एक अनोखा मॉडल तैयार किया है, जहां हर महिला महीने में 100 रुपये देकर सामुदायिक सफाई के लिए एक साझा फंड बनाती है।

  • उत्तराखंड: यहां 570 महिलाओं की ‘बैनी सेना’ (बहनों की सेना) अपने-अपने वार्डों में सफाई गतिविधियों पर नजर रखती है और प्रशासन व सफाई कर्मचारियों के बीच सेतु का काम करती है।

  • शिलांग (मेघालय): ‘इन्नेहस्खेम सेल्फ-हेल्प ग्रुप’ की महिलाएं (जिन्हें ‘मेरी मेडन्स ऑफ मार्टन’ कहा जाता है) गीले कचरे को खाद में बदलकर सम्मानजनक आजीविका कमा रही हैं।

4. ओडिशा: ट्रांसजेंडर समुदाय को मिली तकनीकी कमान और पहचान

स्वच्छता अभियान ने सबसे हाशिए पर रहने वाले ट्रांसजेंडर समुदाय को भी मुख्यधारा से जोड़ा है। ओडिशा के कटक और भुवनेश्वर में म्युनिसिपल कॉर्पोरेशनों ने ट्रांसजेंडर सेल्फ-हेल्प ग्रुप्स (जैसे ‘स्वीकृति’) को सेप्टेज ट्रीटमेंट प्लांट (FSTP) के संचालन और सेसपूल वाहनों के रखरखाव की तकनीकी जिम्मेदारी सौंपी है।

‘स्वीकृति’ की अध्यक्ष मेघना साहू के अनुसार, इस पहल ने उन्हें एक पेशेवर (Professional) पहचान, आत्मविश्वास और समाज में गर्व के साथ जीने का अवसर दिया है।

निष्कर्ष:

स्वच्छता अब केवल एक सरकारी जिम्मेदारी या कचरा हटाने की प्रक्रिया नहीं है। यह हाशिए पर धकेल दिए गए लोगों के लिए सामाजिक न्याय, आर्थिक अवसर और सम्मान की एक शक्तिशाली सामूहिक कोशिश बन गई है।