US China Relations Trump Visit Quad

विचार प्रवाह : ट्रंप की चीन यात्रा, क्वाड का भविष्य और भारत

संपादकीय: ट्रंप का ‘चाइना टूर’ और बदलता वैश्विक शक्ति संतुलन… क्या ‘क्वाड’ का वजूद खतरे में है? भारत के लिए क्या हैं मायने?

नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया चीन यात्रा केवल एक कूटनीतिक दौरा नहीं, बल्कि 21वीं सदी की बदलती विश्व व्यवस्था (New World Order) का एक ऐसा स्पष्ट संकेत है, जिसने वैश्विक राजनीति की दिशा पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

बीजिंग में राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ ट्रंप की लंबी बैठकें, व्यापारिक और तकनीकी समझौतों पर चर्चा और अमेरिकी उद्योगपतियों की भारी मौजूदगी यह साबित करती है कि तमाम भू-राजनीतिक टकरावों के बावजूद, दुनिया की ये दो महाशक्तियां एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं हो सकतीं।

कूटनीति का ‘दोहरा मापदंड’ और यथार्थवाद

कूटनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, केवल स्थायी हित होते हैं। इस यात्रा ने इस कहावत को फिर से चरितार्थ कर दिया है।

याद कीजिए, पिछले वर्ष जब शंघाई सहयोग संगठन (SCO) सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की थी, तो ट्रंप ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि “अमेरिका भारत को चीन और रूस के हाथों खो रहा है।”

वाशिंगटन ने इसे एक रणनीतिक असहजता के रूप में देखा था। लेकिन आज, वही डोनाल्ड ट्रंप खुद बीजिंग में शी जिनपिंग के साथ बैठकों में व्यस्त दिखे।

उनके साथ एलन मस्क और जेन्सन हुआंग जैसे अमेरिका के सबसे बड़े ‘टेक-दिग्गज’ भी मौजूद थे। यह साफ दर्शाता है कि जब बात अमेरिका के अपने आर्थिक और व्यापारिक हितों की आती है, तो वह किसी भी ‘सिद्धांत’ को दरकिनार कर यथार्थवाद (Realism) का रास्ता अपना लेता है।

चीन का ‘टेक्नो-पॉवर’ शो और ताइवान की चेतावनी

बीजिंग ने ट्रंप की इस यात्रा को केवल कूटनीतिक संवाद तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे अपनी तकनीकी और आर्थिक ताकत के प्रदर्शन के रूप में इस्तेमाल किया।

सड़कों पर चालक रहित (Driverless) वाहन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित प्रणालियां और मानवरूपी रोबोट यह संदेश दे रहे थे कि चीन अब दुनिया की ‘सस्ती फैक्ट्री’ नहीं रहा, बल्कि भविष्य की तकनीकों का नेतृत्व करने वाली महाशक्ति बन चुका है।

वहीं, शी जिनपिंग ने ताइवान के मुद्दे पर जो स्पष्ट चेतावनी दी, वह दर्शाती है कि चीन अब अमेरिका से बचाव की नहीं, बल्कि ‘बराबरी’ की भाषा में बात कर रहा है।

क्या क्वाड (Quad) का भविष्य खतरे में है?

ट्रंप की इस यात्रा से जो सबसे बड़ा और गंभीर सवाल पैदा हुआ है, वह ‘क्वाड’ (Quad) के भविष्य को लेकर है।

भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के इस समूह को लंबे समय से हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने वाले एक ‘सुरक्षा कवच’ के रूप में देखा जाता रहा है।

लेकिन, यदि क्वाड का अगुआ यानी अमेरिका खुद चीन के साथ संबंधों को स्थिर करने, व्यापार बढ़ाने और तकनीकी सहयोग तलाशने बीजिंग पहुंच रहा है, तो फिर इस समूह की वास्तविक प्रासंगिकता क्या रह जाएगी?

क्या अमेरिका ने क्वाड को सिर्फ अपने सामरिक हितों के लिए एक ‘दबाव समूह’ (Pressure Group) के रूप में इस्तेमाल किया है?

भारत के लिए कूटनीतिक सबक

भारत के लिए यह पूरी घटना एक बड़ा कूटनीतिक सबक है। नई दिल्ली ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी हिंद-प्रशांत रणनीति का बड़ा हिस्सा क्वाड पर केंद्रित किया है।

लेकिन अमेरिका का यह ‘यू-टर्न’ भारत को यह स्पष्ट संदेश देता है कि वैश्विक राजनीति में किसी एक धुरी (Axis) पर पूरी तरह निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। भारत को अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) को और धार देनी होगी।

एक तरफ अमेरिका के साथ सामरिक साझेदारी मजबूत करनी होगी, तो दूसरी तरफ रूस से अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करनी होंगी और साथ ही चीन के साथ सीमा पर शक्ति संतुलन बनाए रखते हुए संवाद भी जारी रखना होगा।

निष्कर्ष यही है कि अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, यह वैश्विक प्रभाव की एक व्यापक लड़ाई है जिसमें प्रतिद्वंद्विता और सहयोग (Co-opetition) दोनों साथ-साथ चलेंगे।

इस जटिल विश्व व्यवस्था में भारत को किसी के ‘इशारे’ पर नहीं, बल्कि अपने ‘राष्ट्रीय हितों’ की कसौटी पर ही हर कदम आगे बढ़ाना होगा।