मीरवाइज और कश्मीरी पंडित

विचार प्रवाह : मीरवाइज का ईरान प्रेम और कश्मीरी पंडितों पर चुप्पी!

मीरवाइज का ‘ईरान प्रेम’ और कश्मीरी पंडितों पर सन्नाटा: कश्मीर के नेताओं की चयनात्मक संवेदनाओं पर उठे गंभीर सवाल

नई दिल्ली : द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

श्रीनगर से कश्मीर के कई धार्मिक संगठनों का एक प्रतिनिधिमंडल हाल ही में नई दिल्ली पहुंचा और ईरान के राजदूत से मुलाकात कर वहां के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत पर शोक जताया।

मीरवाइज उमर फारूक के नेतृत्व में इस प्रतिनिधिमंडल ने न केवल अपनी संवेदना व्यक्त की, बल्कि ईरान के लोगों के साथ गहरी एकजुटता भी दिखाई।

उन्होंने अमेरिका और इजराइल पर आरोप लगाते हुए युद्ध की निंदा की और कश्मीर को ‘ईरान-ए-सगीर’ (छोटा ईरान) तक बता दिया। लेकिन इस सक्रियता ने एक बड़ी बहस और कई गंभीर सवालों को जन्म दे दिया है।

कश्मीरी पंडितों के दर्द पर खामोशी क्यों?

सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब कश्मीरी पंडितों को घाटी से मार कर भगाया जा रहा था, तब यह संवेदना और अमन का पैगाम कहां था?

जब पंडितों के कत्लेआम की खबरें आ रही थीं, तब किसी प्रतिनिधिमंडल को उनके घरों तक जाने की फुर्सत क्यों नहीं मिली?

आज अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर जो सक्रियता दिखती है, वह अपने ही समाज के जख्मों पर सन्नाटे में क्यों बदल जाती है?

आलोचकों का पूछना है कि अगर मीरवाइज सच में अमन के दूत हैं, तो अपने दिल्ली दौरे के दौरान उन्होंने कश्मीरी पंडितों की कॉलोनियों में जाकर उनसे मुलाकात क्यों नहीं की और उन्हें वापस घाटी लौटने का आग्रह क्यों नहीं किया?

दोहरे मापदंड और चयनात्मक संवेदनशीलता

घाटी में खामेनेई की मौत के बाद बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए, दान अभियान चलाए गए, जहां लोगों ने पैसा, सोना और मवेशी तक दान दिए।

महबूबा मुफ्ती और फारूक अब्दुल्ला जैसे बड़े सियासी नाम भी ईरानी दूतावास पहुंचे। यह लामबंदी बताती है कि एक खास मुद्दे पर भावनाएं कितनी तेजी से उमड़ती हैं।

लेकिन कश्मीरी पंडितों के मामले में ऐसा कोई व्यापक अभियान कभी क्यों नहीं चला? उनके दर्द को उसी गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया?

अमन का पैगाम चयनात्मक नहीं हो सकता

कश्मीर की पहचान केवल किसी एक धर्म से नहीं, बल्कि उसकी विविधता से रही है, जिसमें कश्मीरी पंडित एक अभिन्न हिस्सा थे।

आज जरूरत इस बात की है कि कश्मीर के नेता आत्ममंथन करें। केवल एक धर्म विशेष के साथ एकजुटता दिखाना और दूसरे की पीड़ा को अनदेखा करना न तो नैतिक है और न ही स्वीकार्य।

जब तक कश्मीरी पंडितों की वापसी, उनकी सुरक्षा और उनके सम्मान की गारंटी नहीं होगी, तब तक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमन का हर दावा महज खोखला ही नजर आएगा।

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