विचार प्रवाह : ‘बाबरी मस्जिद-शैली’ शिलान्यास, धार्मिक या राजनीतिक?

“टीएमसी के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने शनिवार को मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में बाबरी मस्जिद-शैली की एक प्रस्तावित मस्जिद का शिलान्यास किया। यह कार्यक्रम भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच संपन्न हुआ और इसे केवल एक धार्मिक आयोजन से कहीं अधिक एक मज़बूत राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है”

नई दिल्ली 07 / 12 / 2025 संतोष सेठ की रिपोर्ट 

देखा जाये तो मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद-शैली की मस्जिद का शिलान्यास अपने आप में केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं है; यह एक राजनीतिक संदेश भी बनकर उभर रहा है।

हुमायूं कबीर जिस तरह भीड़, बाहरी धार्मिक नेताओं, विशाल व्यय और टकरावभरी भाषा का उपयोग कर रहे हैं, वह स्पष्ट रूप से आग से खेलने जैसा है। सांप्रदायिक विभाजन की ज़मीन पर लोकप्रियता की इमारत खड़ी करने की कोशिशें भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के लिए अत्यंत खतरनाक हैं।

साथ ही, यह सवाल भी उठता है कि आखिर हम किन प्रतीकों को आगे बढ़ा रहे हैं। जब किसी मस्जिद को बाबरी मस्जिद-शैली या बाबर के नाम पर स्थापित करने की बात होती है, तो यह केवल स्थापत्य शैली का मामला नहीं रह जाता, यह इतिहास के उन पन्नों को कुरेदने का प्रयास बन जाता है जो आज भी समाज में संवेदनशीलता रखते हैं।

बाबर, जो एक मध्यकालीन आक्रांता था और जिसकी सेना द्वारा मंदिरों के विध्वंस के उल्लेख इतिहास में दर्ज हैं, उसके नाम पर मस्जिद निर्माण की ज़िद करना क्या हिंदुओं को यह संदेश देने का प्रयास नहीं है कि हम उस ऐतिहासिक पीड़ा के प्रतीक का महिमामंडन करेंगे?

किसी भी धर्म के लिए पूजा स्थल बनाना उसका अधिकार है, लेकिन क्या वह अधिकार इस रूप में इस्तेमाल होना चाहिए कि वह सामाजिक समरसता को पीछे धकेल दे?

ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि स्वयं अयोध्या में नई मस्जिद परियोजना, जहाँ कानूनन तय स्थान पर शांतिपूर्वक निर्माण होना है, वह वर्षों से धीमी गति और न्यूनतम दानराशि के चलते संघर्ष कर रही है।

इससे यह प्रश्न और तीखा हो जाता है कि वास्तविक उद्देश्य क्या है? हम आपको बता दें कि इंडो-इस्लामिक कल्चरल फ़ाउंडेशन (IICF) के अध्यक्ष ज़फ़र फ़ारूकी ने स्वीकार किया है कि अयोध्या में मस्जिद निर्माण के लिए अनुमानित 65 करोड़ रुपये की तुलना में अभी तक केवल तीन करोड़ रुपये के आसपास ही धनसंग्रह हुआ है।

यदि हुमायूं कबीर को मस्जिद की इतनी ही चिंता है तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बनवाई जा रही मस्जिद के लिए आगे आना चाहिए था ना कि अपनी राजनीति चमकाने और सांप्रदायिक विभाजन पैदा करने का प्रयास करना चाहिए था।

1. कार्यक्रम का आयोजन और सुरक्षा

  • स्थान: बेलडांगा, मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल।

  • आयोजन: प्रस्तावित बाबरी मस्जिद-शैली की मस्जिद का शिलान्यास।

  • सुरक्षा व्यवस्था: अभूतपूर्व सुरक्षा बंदोबस्त किए गए, जिसमें 3,000 से अधिक पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया।

  • भीड़ और लॉजिस्टिक्स: आयोजकों ने 3 लाख लोगों की संभावित भीड़ का दावा किया, जिसके लिए 3,000 से अधिक स्वयंसेवकों को लगाया गया।

  • खर्च: विशाल मंच, भोजन, सुरक्षा आदि पर कुल खर्च ₹60-70 लाख तक आया।

  • विशेष अतिथि: सऊदी अरब से दो क़ाज़ी भी विशेष काफ़िले में शामिल हुए।

2. हुमायूं कबीर का राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन

  • राजनीतिक मंशा: हाल ही में टीएमसी से निलंबित किए गए हुमायूं कबीर ने इस कार्यक्रम का उपयोग अपनी राजनीतिक ताक़त का प्रदर्शन करने के लिए किया।

  • घोषणा: उन्होंने कहा कि बेलडांगा में केवल मस्जिद ही नहीं, बल्कि अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान और सभी समुदायों के लिए गेस्ट हाउस भी बनाया जाएगा।

3. शिलान्यास पर सामाजिक और नैतिक सवाल

इस घटना को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांप्रदायिक विभाजन की ज़मीन पर लोकप्रियता हासिल करने का प्रयास माना जा रहा है, जो भारत के सामाजिक ताने-बाने के लिए खतरनाक है।

  • प्रतीकों का चुनाव: मस्जिद को बाबरी मस्जिद-शैली या बाबर के नाम पर स्थापित करने की बात करना इतिहास के संवेदनशील पन्नों को कुरेदने जैसा है। बाबर एक मध्यकालीन आक्रांता था, और उसके नाम पर निर्माण की ज़िद करना सामाजिक समरसता को पीछे धकेल सकता है।

  • टकरावभरी भाषा: कबीर द्वारा इस्तेमाल की गई टकरावभरी भाषा, विशाल व्यय और बाहरी धार्मिक नेताओं की भागीदारी को ‘आग से खेलने’ जैसा बताया गया है।

4. अयोध्या मस्जिद से तुलना और वास्तविक उद्देश्य पर प्रश्न

  • अयोध्या मस्जिद की स्थिति: सुप्रीम कोर्ट के आदेश से अयोध्या में बन रही नई मस्जिद परियोजना (IICF) वर्षों से धन की कमी से जूझ रही है। अध्यक्ष ज़फ़र फ़ारूकी ने स्वीकार किया है कि अनुमानित ₹65 करोड़ की तुलना में अभी तक केवल ₹3 करोड़ के आसपास ही धनसंग्रह हुआ है।

  • प्राथमिकता पर सवाल: लेखक ने सवाल उठाया कि अगर हुमायूं कबीर को मस्जिद की इतनी ही चिंता है, तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बन रही मस्जिद के लिए आगे आना चाहिए था, न कि अपनी राजनीति चमकाने और सांप्रदायिक विभाजन पैदा करने के लिए यह कदम उठाना चाहिए था।

5. अंतिम संदेश

भारत का गर्व ऐतिहासिक संघर्षों को दोहराने में नहीं, बल्कि नए भविष्य का निर्माण करने में है। यदि धार्मिक आयोजन समाज को विभाजित करता है, तो उसके उद्देश्य पर सोचने की आवश्यकता है और राजनैतिक लाभ के लिए भावनाओं की आग पर घी नहीं डालना चाहिए।

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