करीब 19 साल के लंबे निर्वासन के बाद बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन 1 अगस्त को कोलकाता के रवींद्र सदन में एक कट्टरपंथ विरोधी साहित्यिक कार्यक्रम में भाग लेंगी।
19 साल बाद तसलीमा नसरीन की कोलकाता वापसी पर बवाल, TMC और BJP में छिड़ी जुबानी जंग”
कोलकाता: करीब दो दशक के लंबे अंतराल के बाद निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन की कोलकाता वापसी की घोषणा ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नया भूचाल ला दिया है।
तसलीमा 1 अगस्त को कोलकाता के रवींद्र सदन में आयोजित होने वाले एक कट्टरपंथ विरोधी साहित्यिक कार्यक्रम में शामिल होंगी।
लेकिन उनकी इस प्रस्तावित यात्रा ने राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) और विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (BJP) को आमने-सामने ला खड़ा किया है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक संवेदनशीलता को लेकर बंगाल में एक बार फिर पुरानी बहस तेज हो गई है।
तसलीमा नसरीन ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी 1 अगस्त की कोलकाता यात्रा की जानकारी दी थी, जिसके बाद से ही राजनीतिक बयानबाजी का दौर शुरू हो गया है:
TMC का विरोध: तृणमूल कांग्रेस के विधायक अखरुज्जमान ने तसलीमा की वापसी पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है।
उन्होंने कहा कि तसलीमा ने मुस्लिम समुदाय और इस्लाम की शरीयत के खिलाफ काफी कुछ लिखा है। अखरुज्जमान ने तंज कसते हुए कहा, “यदि कोई मुसलमानों के खिलाफ बोलेगा, तो डबल इंजन की सरकार उसका सम्मान करेगी, इसलिए उनके आने में आश्चर्य की कोई बात नहीं है।”
BJP ने किया स्वागत: वहीं, बीजेपी इसे पश्चिम बंगाल के बदलते राजनीतिक माहौल का प्रतीक मान रही है।
पार्टी नेता और मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने लेखिका का स्वागत करते हुए कहा कि वह तसलीमा की प्रशंसक हैं।
पॉल ने तत्कालीन वाम मोर्चा और मौजूदा ममता सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि पहले वामपंथियों ने मुस्लिम राजनीति को प्राथमिकता दी और एक प्रतिभाशाली लेखिका को सुरक्षा देने में विफल रहे, और बाद में ममता बनर्जी के शासन में भी उन्हें उचित संरक्षण नहीं मिला।
तसलीमा नसरीन का पूरा जीवन कट्टरपंथ के विरोध और निर्वासन से जुड़ा रहा है।
‘लज्जा’ और बांग्लादेश से निर्वासन: 1990 के दशक में उन्हें अपने नारीवादी लेखन के लिए अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।
बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए अत्याचारों पर आधारित उनके चर्चित उपन्यास “लज्जा” के छपने के बाद 1994 में उनके खिलाफ कई फतवे जारी हुए, जिसके कारण उन्हें अपना देश (बांग्लादेश) छोड़ना पड़ा।
कोलकाता में 2007 का वह हिंसक विरोध: यूरोप और अमेरिका में रहने के बाद तसलीमा 2004 में भारत आईं और अपने सबसे करीबी सांस्कृतिक शहर ‘कोलकाता’ में बस गईं।
लेकिन नवंबर 2007 में उनकी आत्मकथा “द्विखंडिता” के कुछ अंशों को लेकर मुस्लिम संगठनों ने भारी हिंसक प्रदर्शन किया। कोलकाता में हालात इतने बिगड़ गए कि सेना तक बुलानी पड़ी।
2007 के उस हिंसक विरोध के बाद तत्कालीन बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार ने तसलीमा नसरीन को कोलकाता छोड़ने का आदेश दे दिया था।
वहां से उन्हें पहले जयपुर और फिर दिल्ली भेजा गया। शुरुआत में वह दिल्ली में नजरबंदी जैसे हालात में रहीं, लेकिन बाद में भारत सरकार ने उन्हें दीर्घकालिक निवास (Long-term Visa) की अनुमति दे दी।
लगभग 19 साल बाद तसलीमा नसरीन का कोलकाता लौटना सिर्फ एक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति का एक बड़ा लिटमस टेस्ट है।
एक अगस्त का यह कार्यक्रम स्पष्ट करेगा कि आज के बदलते राजनीतिक और सामाजिक माहौल में तसलीमा नसरीन की मौजूदगी को समाज किस नजर से देखता है।
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