PM Modi holds hands with Xi Jinping and Vladimir Putin at the BRICS Summit in New Delhi, reflecting a shifting global power dynamic.
ब्रिक्स समिट 2026: मोदी, पुतिन और जिनपिंग की एक तस्वीर में दिखा नया ‘वर्ल्ड ऑर्डर’, साझा घोषणापत्र जारी”
नई दिल्ली: संतोष सेठ, संपादक (THE POLITICS AGAIN)
जब दुनिया का एक बड़ा हिस्सा युद्ध और तनाव के साये में जी रहा है, तब नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने पूरी वैश्विक राजनीति का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।
सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन एक साथ नजर आए।
पीएम मोदी को जिनपिंग और पुतिन का हाथ गर्मजोशी से पकड़े हुए देखा गया। यह तस्वीर दुनिया को शांति का सकारात्मक संदेश देने के साथ-साथ एक नए ‘वर्ल्ड ऑर्डर’ (विश्व व्यवस्था) के उभरने का स्पष्ट संकेत दे रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद अपने सोशल मीडिया हैंडल ‘एक्स’ (X) पर यह ऐतिहासिक तस्वीर साझा की है।
यह दृश्य वर्ष 2025 में तियानजिन (चीन) में हुए SCO समिट की उस तस्वीर की याद दिलाता है, जहां तीनों नेता इसी तरह एक साथ नजर आए थे।
भारत, रूस और चीन ब्रिक्स के सबसे मजबूत स्तंभ हैं। जहां रूस अपनी ऊर्जा और सैन्य ताकत के लिए जाना जाता है, वहीं चीन दुनिया का सबसे बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब है।
इन दोनों के बीच, भारत अपनी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और अभूतपूर्व डिजिटल-टेक्नोलॉजी क्षमता के साथ वैश्विक पटल पर अपना प्रभाव लगातार बढ़ा रहा है।
इस दो दिवसीय शिखर सम्मेलन के पहले दिन की समाप्ति पर आम सहमति से ब्रिक्स का ‘साझा घोषणापत्र’ जारी किया गया।
पीएम मोदी ने इसे स्वीकार किए जाने की आधिकारिक घोषणा की। सूत्रों के अनुसार, शुरुआत में ईरान और यूएई (UAE) द्वारा कड़ा रुख अपनाने के कारण घोषणापत्र के मसौदे पर बातचीत आखिरी समय तक चलती रही, लेकिन अंततः सर्वसम्मति बन गई।
शिखर सम्मेलन के समापन अवसर पर पीएम मोदी ने वैश्विक संस्थाओं में बदलाव की जोरदार पैरवी की।
उन्होंने अपनी टिप्पणी में कहा, “आज की चर्चा से यह स्पष्ट है कि बदलती दुनिया को पुरानी पड़ चुकी संस्थाओं के जरिए नहीं चलाया जा सकता।
प्रतिनिधित्व, जवाबदेही और नियम बनाने की प्रक्रिया में सुधार बेहद जरूरी हैं।” प्रधानमंत्री ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि भविष्य की अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों और उनके नियमों को तय करने में ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) को पूरी और समान भागीदारी मिलनी ही चाहिए।
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