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सुप्रीम कोर्ट का निर्देश: हाई कोर्ट 3 महीने में सुनाएं लंबित फैसले

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला : ‘हाई कोर्ट 3 महीने में सुनाएं लंबित फैसले, 24 घंटे में वेबसाइट पर हों अपलोड’

नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

देश की अदालतों में न्याय मिलने में होने वाली देरी (Delay in Justice) को खत्म करने के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने एक बेहद बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 (Article 142) के तहत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए देश के सभी हाई कोर्ट (High Courts) के लिए बाध्यकारी निर्देश जारी किए हैं।

सीजेआई (CJI) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि न्याय में देरी को रोकने के लिए फैसलों को समयबद्ध तरीके से सुनाना और उन्हें सार्वजनिक करना अनिवार्य है।

सुप्रीम कोर्ट के 5 सबसे अहम निर्देश

पीठ ने हाई कोर्ट की कार्यप्रणाली को तेज और पारदर्शी बनाने के लिए निम्नलिखित सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं:

  • 3 महीने की डेडलाइन: सभी हाई कोर्ट को यह सख्त निर्देश दिया गया है कि वे अपने सभी लंबित (Pending) फैसलों को हर हाल में तीन महीने के भीतर सुनाएं।

  • जमानत आदेशों में तेजी: अदालत ने आदेश दिया है कि जमानत (Bail) से जुड़े फैसले उसी दिन या फिर अधिकतम अगले दिन सुना दिए जाने चाहिए।

  • 24 घंटे में ऑनलाइन अपलोड: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हाई कोर्ट द्वारा सुनाए गए सभी निर्णय, फैसला सुनाए जाने के 24 घंटे के भीतर संबंधित हाई कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड हो जाने चाहिए।

  • निचली अदालतों को तत्काल सूचना: नियमित जमानत आदेशों की तत्काल सूचना बिना किसी देरी के निचली अदालतों (Lower Courts) को भेजी जाए।

  • फैसले की तिथि: अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि निर्णय के मुख्य भाग (Operative Part) के सुनाए जाने की तिथि को ही आधिकारिक रूप से फैसला सुनाए जाने की तिथि माना जाएगा।

विचाराधीन कैदियों को मिलेगी तुरंत राहत

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से जेलों में बंद उन हजारों विचाराधीन कैदियों (Undertrial Prisoners) को बड़ी राहत मिलेगी, जिन्हें जमानत मिलने के बाद भी कागजी औपचारिकताओं और आदेश की कॉपी न पहुंचने के कारण जेल में ही दिन काटने पड़ते थे।

अदालत ने निर्देश दिया है कि जमानत प्राप्त विचाराधीन कैदियों को, सभी औपचारिकताओं के अधीन रहते हुए, उसी दिन जेल से रिहा किया जाना चाहिए।

‘हाई कोर्ट प्राथमिक संस्थाएं, समय पर न्याय जरूरी’

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में इस बात पर जोर दिया कि हाई कोर्ट देश की न्याय व्यवस्था की प्राथमिक संस्थाएं हैं, जहां हर रोज हजारों लोग न्याय की उम्मीद लेकर आते हैं।

ऐसे में समय पर निर्णय सुनाना न केवल आवश्यक है, बल्कि लोगों का न्यायपालिका पर विश्वास बनाए रखने के लिए भी जरूरी है।

हालांकि, सर्वोच्च अदालत ने यह भी साफ किया कि इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य किसी भी जज (Judge) या संस्था की कार्यप्रणाली पर लांछन लगाना नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था को और अधिक सुचारू और जवाबदेह बनाना है।

Santosh SETH

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