उत्तर प्रदेश चुनाव में दलित मतदाताओं को साधने की रणनीति बनाते अखिलेश यादव

यूपी में सपा का बड़ा दांव, सौ दलित उम्मीदवारों को टिकट देगी?

अखिलेश यादव का ‘मास्टरस्ट्रोक’, 100 दलित उम्मीदवारों को मैदान में उतारने की तैयारी; BSP और BJP की बढ़ी धड़कनें”

लखनऊ : THE POLITICS AGAIN डेस्क (पॉलिटिकल रिपोर्ट): संतोष सेठ की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) ने एक ऐसा दांव चला है, जिसने बहुजन समाज पार्टी (BSP) की बेचैनी बढ़ा दी है और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) को भी माथा खुजलाने पर मजबूर कर दिया है।

बात सिर्फ टिकट बांटने की नहीं है, बल्कि उस नई ‘सामाजिक बिसात’ की है, जिस पर अखिलेश यादव अब ‘दलित, पिछड़ा और मुस्लिम’ (PDA) समीकरण को नए अंदाज में जमाने की कोशिश कर रहे हैं।

सियासी गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि समाजवादी पार्टी अगले विधानसभा चुनाव में लगभग 100 दलित उम्मीदवार (Dalit Candidates) मैदान में उतारने की तैयारी कर रही है।

सामान्य सीटों पर भी दलित चेहरों को मौका

अखिलेश यादव की इस रणनीति का सबसे अहम पहलू यह है कि पार्टी केवल आरक्षित सीटों (Reserved Seats) तक सीमित नहीं रहेगी।

  • सपा की योजना है कि सामान्य (General) सीटों पर भी मजबूत दलित चेहरों को मौका दिया जाए।

  • पार्टी का स्पष्ट मानना है कि अगर बसपा की पारंपरिक जमीन पर सेंध लगानी है, तो केवल भाषणों से काम नहीं चलेगा, बल्कि टिकट वितरण में भी साहस दिखाना होगा।

  • सूत्रों के अनुसार, जिन इलाकों में समाजवादी पार्टी का संगठन बहुत मजबूत नहीं है, वहां दलित उम्मीदवारों को उतारकर एक नया सामाजिक समीकरण बनाया जाएगा, ताकि जातीय गणित से जीत का पुल तैयार किया जा सके।

लोकसभा चुनाव के फॉर्मूले की वापसी

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, यह प्रयोग पूरी तरह नया भी नहीं है। हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने इसी रणनीति के तहत कई दलित उम्मीदवार उतारे थे, जिसका उसे भरपूर फायदा भी मिला।

अयोध्या (फैजाबाद) और मेरठ जैसी महत्वपूर्ण सामान्य सीटों पर पार्टी ने दलित चेहरों को मौका देकर एक बड़ा राजनीतिक संदेश दिया था।

इस कदम से अखिलेश यादव यह साबित करना चाहते हैं कि समाजवादी पार्टी अब केवल ‘यादव और मुस्लिम’ पहचान वाली पार्टी नहीं रह गई है, बल्कि इसका दायरा अब बहुत व्यापक है।

खिसकता हाथी, लपकती साइकिल

यह पूरी कवायद उस बदले हुए राजनीतिक माहौल का सीधा नतीजा है, जिसमें मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी धीरे-धीरे अपने पुराने प्रभाव से दूर होती दिखाई दे रही है।

  • पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा का खाता तक नहीं खुला और उसका मत प्रतिशत (Vote Share) भी तेजी से नीचे आया है।

  • सपा के रणनीतिकारों ने यह समझ लिया है कि बसपा के कमजोर पड़ने से जो राजनीतिक खालीपन बना है, उसे भरने का यह सबसे सही समय है।

  • पार्टी नेताओं का दावा है कि दलित समाज का एक बड़ा हिस्सा अब नए राजनीतिक विकल्प की तलाश में है। यदि उन्हें सम्मानजनक भागीदारी दी जाए, तो यह वर्ग स्थायी रूप से सपा के साथ जुड़ सकता है।

भाजपा भी सतर्क, तेज किया संपर्क अभियान

समाजवादी पार्टी की इस आक्रामक रणनीति से भारतीय जनता पार्टी (BJP) भी सतर्क हो गई है। भाजपा भली-भांति जानती है कि यूपी की राजनीति में दलित मतदाता सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि चुनावी दिशा तय करने वाला ‘निर्णायक वर्ग’ (Kingmaker) है।

इसी कारण भाजपा ने भी अपने दलित संपर्क अभियान को तेज कर दिया है और यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि उसका सामाजिक विस्तार और कल्याणकारी योजनाएं अभी भी समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रही हैं।

तीनों दलों के बीच सीधा मुकाबला: राजनीति के पुराने खिलाड़ी मानते हैं कि यह पूरा खेल केवल टिकटों का नहीं, बल्कि प्रतीकों और संदेशों का है।

अखिलेश यह जताना चाहते हैं कि सपा अब सर्वसमाज की पार्टी है, भाजपा अपने व्यापक सामाजिक समीकरण को बचाए रखने में जुटी है और बसपा अपने ‘कोर वोटर’ को छिटकने से रोकने की जद्दोजहद कर रही है।

बहरहाल, उत्तर प्रदेश की राजनीति का यह नया दौर बेहद दिलचस्प होने वाला है, जहाँ साइकिल, कमल और हाथी तीनों उसी मैदान में उतर चुके हैं, जहां हर वोट के पीछे एक गहरा सामाजिक गणित छिपा है।

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