PM मोदी की अपील दूरदृष्टि, 700 बिलियन $ का भंडार फिर भी संयम जरूरी
PM मोदी की अपील कोई सियासत नहीं, ‘दूरदृष्टि’ है: मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार के बावजूद भारत को क्यों है इन 5 संयमों की जरूरत?
नई दिल्ली/संपादकीय डेस्क: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
देश में जब भी कोई बड़ा वैश्विक संकट आता है, तो एक मजबूत नेतृत्व हमेशा दूरदृष्टि (Foresight) के साथ फैसले लेता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तेलंगाना के सिकंदराबाद से देशवासियों से की गई हालिया अपील को इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए।
आलोचक भले ही इस आग्रह को राजनीतिक मुद्दा बनाने का प्रयास करें, लेकिन हकीकत यह है कि अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच छिड़े युद्ध ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को एक नए संकट में धकेल दिया है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत किसी बड़े आर्थिक संकट में है? जवाब है- नहीं। लेकिन फिर भी भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए पीएम मोदी ने देशवासियों से अपनी आदतों में 1 साल के लिए कुछ जरूरी बदलाव करने का जो आग्रह किया है, वह ‘स्वदेशी’ और ‘आत्मनिर्भरता’ का सबसे बड़ा मंत्र है।
विदेशी मुद्रा भंडार ऐतिहासिक ऊंचाई पर, फिर भी तैयारी जरूरी
आंकड़े गवाह हैं कि भारत विदेशी मुद्रा के मामले में पूरी तरह सुरक्षित है। 10 अप्रैल, 2026 के आंकड़ों के अनुसार, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) 700 बिलियन अमेरिकी डॉलर के ऐतिहासिक और उच्चतम स्तर को पार कर चुका है।
यह राशि इतनी विशाल है कि भारत बिना किसी चिंता के आगामी 11 महीनों तक अपनी आयात जरूरतों को पूरा कर सकता है।
इसके बावजूद, दूरदर्शी नीतियां वही होती हैं जो संकट के दरवाजे पर दस्तक देने से पहले ही तैयारी कर लें।
क्या है वैश्विक संकट और क्यों पड़ी इस अपील की जरूरत?
आज वैश्विक हालात किसी से छिपे नहीं हैं। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच युद्ध के चलते ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) का रास्ता अवरुद्ध हो गया है।
हालात इतने गंभीर हैं कि ईरान को प्रतिदिन 2800 करोड़ रुपये का कच्चा तेल समुद्र में बहाना पड़ रहा है।
भारत हर साल लगभग 979 अरब डॉलर का आयात करता है, जिसमें से 38 प्रतिशत हिस्सा केवल पेट्रोलियम पदार्थों का होता है।
इसके अलावा 10 प्रतिशत विदेशी मुद्रा केवल सोना खरीदने में खर्च होती है। युद्ध के कारण आपूर्ति श्रृंखला टूटने से दुनिया के हर देश पर इसका असर पड़ना तय है।
पीएम मोदी के 5 प्रमुख आग्रह, जिनसे दैनिक जीवन नहीं होगा प्रभावित
प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया है कि यह संकट दो देशों के ‘अहंकार’ का नतीजा है, जो पूरी मानवता को पीछे धकेल रहा है। उन्होंने देशवासियों से केवल 1 साल के लिए इन 5 आदतों को अपनाने का आग्रह किया है:
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ईंधन बचाएं: सार्वजनिक परिवहन (Public Transport), कार पूलिंग और इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) का इस्तेमाल करें। ‘वर्क फ्रॉम होम’ को बढ़ावा दें।
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सोना न खरीदें: 1 साल के लिए सोने (Gold) की खरीद टाल दें। इससे अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा बचेगी।
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विदेशी यात्राएं और शादियां टालें: ‘डेस्टिनेशन वेडिंग’ विदेशों की बजाय भारत के खूबसूरत स्थानों पर करें, ताकि देश का पैसा देश में रहे और स्थानीय पर्यटन को बढ़ावा मिले।
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खाने के तेल में 10% की कटौती: यह केवल आयात को कम नहीं करेगा, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी बेहद फायदेमंद होगा।
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रासायनिक उर्वरकों में 50% कमी: खेतों की उर्वरा शक्ति बचाने के लिए जैविक खाद और जैविक खेती को अपनाएं।
शास्त्री जी के ‘उपवास’ और ‘कोविड काल’ की याद
पीएम मोदी की इस अपील से पूर्व प्रधानमंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री के उस दौर की याद ताजा हो जाती है, जब उन्होंने अन्न संकट के दौरान देशवासियों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने का आग्रह किया था। कोविड काल में भी देश ने एकजुट होकर मुश्किलों का सामना किया था।
लबोलुआब यह है कि प्रधानमंत्री के इन सुझावों से किसी भी आम इंसान की दिनचर्या बुरी तरह प्रभावित नहीं होती है।
1 साल तक सोना न खरीदने या विदेश न जाने से किसी का कोई बड़ा नुकसान नहीं होने वाला। इसके उलट, इन छोटे-छोटे बदलावों से भारत वैश्विक हालातों का अधिक कुशलता से मुकाबला कर सकेगा और देश में ‘स्वदेशी’ को एक नई ताकत मिलेगी।











