PM Modi Appeal Global Crisis India

PM मोदी की संयम की अपील: राष्ट्रहित पर राजनीति क्यों ?

संपादकीय: PM मोदी की संयम की अपील पर राजनीति क्यों? सोने और ईंधन की बचत ही है मजबूत अर्थव्यवस्था का आधार”

नई दिल्ली : द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

आज पूरी दुनिया एक ऐसे ऐतिहासिक दौर से गुजर रही है, जहां युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, ऊर्जा संकट और वैश्विक बाजार की अनिश्चितताओं ने मानव सभ्यता को नई चुनौतियों के सामने खड़ा कर दिया है।

खाड़ी देशों में लंबे समय से चल रहे संघर्ष और युद्ध की विभीषिका ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरे तक प्रभावित किया है।

कच्चे तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि, आपूर्ति श्रृंखलाओं का बाधित होना

डॉलर के मुकाबले विभिन्न देशों की मुद्राओं का कमजोर होना और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उत्पन्न असंतुलन ने लगभग हर राष्ट्र को झकझोर कर रख दिया है।

इन वैश्विक परिस्थितियों से भारत भी अछूता नहीं रह सकता। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों से ईंधन के संयमित उपयोग और सोने की खरीद को सीमित करने का आह्वान केवल एक ‘आर्थिक सलाह’ नहीं, बल्कि राष्ट्रहित में किया गया एक दूरदर्शी चिंतन है।

संयम की अपील पर विपक्ष की संकीर्ण राजनीति

दुर्भाग्य यह है कि जिस मितव्ययिता की अपील पर पूरे देश को एकजुट होकर गंभीरता से विचार करना चाहिए था, उसे भी राजनीतिक विवाद का हथियार बना दिया गया।

  • कुछ विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री की इस अपील को जनता में भय फैलाने वाला कदम बताया।

  • कुछ ने इसे सरकार की आर्थिक विफलताओं को छिपाने का प्रयास करार दिया।

जबकि वास्तविकता यह है कि यह अपील राष्ट्र को भविष्य की संभावित चुनौतियों के प्रति सचेत करने और समय रहते आत्मानुशासन अपनाने का संदेश है।

जब विश्व के बड़े-बड़े राष्ट्र आर्थिक संकटों से जूझ रहे हों, तब भारत के प्रधानमंत्री यदि नागरिकों को संयम का सूत्र देते हैं, तो उसे राजनीतिक चश्मे से नहीं, बल्कि ‘राष्ट्रीय दृष्टि’ से देखा जाना चाहिए।

‘संयम’ ही है भारतीय संस्कृति का मूल आधार

भारतीय जीवन-दर्शन में संयम को केवल व्यक्तिगत गुण नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी शक्ति माना गया है।

  • महावीर, बुद्ध, गांधी और विनोबा भावे जैसे महापुरुषों ने त्याग और संयम को ही मानवता की सबसे बड़ी शक्ति बताया।

  • भारतीय संस्कृति कहती है कि जितना आवश्यक हो उतना ही उपभोग करो, क्योंकि असीमित उपभोग अंततः संकट को जन्म देता है।

आज जब पूरी दुनिया अंधाधुंध उपभोक्तावाद के दुष्परिणाम भुगत रही है, तब भारत की यही संयम आधारित संस्कृति दुनिया को समाधान का मार्ग दिखा सकती है।

सोने का आयात और ईंधन का खर्च: अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ

सोने के प्रति भारतीय समाज का आकर्षण ऐतिहासिक है। लेकिन यह एक कठोर सत्य है कि भारत का अधिकांश सोना आयातित होता है।

हर वर्ष अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार सोने के आयात पर खर्च होता है, जो उत्पादक कार्यों के बजाय लॉकरों में निष्क्रिय पड़ा रहता है।

रुपये की गिरती कीमत के बीच सोने की खरीद में संयम बरतना देश की आर्थिक मजबूती के लिए आवश्यक है।

इसी प्रकार, भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयातित तेल पर निर्भर है। खाड़ी देशों में युद्ध के कारण तेल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं।

यदि हम ईंधन का अनावश्यक उपयोग रोकें और सार्वजनिक परिवहन को अपनाएं, तो देश की अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत मिलेगी और पर्यावरण का भी संरक्षण होगा।

दूरदर्शी नेतृत्व और संकट से पहले की तैयारी

एक जिम्मेदार प्रधानमंत्री का कर्तव्य केवल संकट आने पर कदम उठाना नहीं, बल्कि समय रहते जनता को तैयार करना भी होता है।

आज जब दुनिया के कई देशों में भारी महंगाई और सामाजिक तनाव है, तब भारत अपेक्षाकृत स्थिर स्थिति में है।

यह प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में बुनियादी ढांचे के विस्तार, डिजिटल अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भर भारत अभियान का ही परिणाम है। वैश्विक मंदी के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।

निष्कर्ष: अवसर को राष्ट्रीय एकता में बदलें

लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार सभी को है, लेकिन हर विषय को राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू में तौलना राष्ट्रहित के विरुद्ध है।

यदि प्रधानमंत्री जनता से संयम की अपील करते हैं, तो विपक्ष को भी जनता को जागरूक करना चाहिए।

आज आवश्यकता राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता की है। यदि हम इस संयम की भावना को समझ सकें, तो न केवल वर्तमान संकटों का सामना कर पाएंगे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मजबूत और ‘आत्मनिर्भर भारत’ का निर्माण भी कर सकेंगे।

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