Chola Copper Plates Returned India

नीदरलैंड ने लौटाए 11वीं सदी के 21 ऐतिहासिक चोल ताम्रपत्र

नीदरलैंड में PM मोदी की ऐतिहासिक कूटनीतिक जीत: 11वीं सदी के 21 ‘चोल ताम्रपत्र’ भारत को मिले वापस; शाही जोड़े से भी की मुलाकात

द हेग/नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नीदरलैंड दौरे से भारत के लिए एक बेहद ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण खबर सामने आई है।

कूटनीतिक और आर्थिक समझौतों के साथ-साथ इस दौरे ने भारत के सांस्कृतिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है।

नीदरलैंड की डच सरकार ने 11वीं सदी के चोल राजवंश (Chola Dynasty) के 21 ऐतिहासिक ताम्रपत्र ससम्मान भारत को वापस सौंप दिए हैं।

इसके साथ ही पीएम मोदी ने नीदरलैंड के राजा विलेम-अलेक्जेंडर और रानी मैक्सिमा से भी अहम मुलाकात की, जिसने दोनों देशों के कूटनीतिक रिश्तों को नई ऊंचाई दी है।

हेग के रॉयल पैलेस में शाही मुलाकात प्रधानमंत्री मोदी ने शनिवार को हेग (The Hague) स्थित रॉयल पैलेस में नीदरलैंड के शाही जोड़े से मुलाकात की।

इस उच्च स्तरीय बैठक के दौरान दोनों देशों के बीच भविष्य की साझेदारी को लेकर गहन चर्चा हुई।

  • प्रमुख मुद्दे: बैठक में मुख्य रूप से डिजिटल तकनीक (Digital Technology), नवाचार (Innovation), फिनटेक (Fintech) और ‘ब्लू इकोनॉमी’ (Blue Economy) जैसे अहम क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया।

2012 से चल रही थी कोशिश, अब मिली सफलता

पीएम मोदी के इस दौरे का सबसे बड़ा आकर्षण 11वीं सदी के चोल राजवंश के ताम्रपत्रों की वापसी रहा।

इन बहुमूल्य ताम्रपत्रों को नीदरलैंड में ‘लाइडेन प्लेट्स’ (Leiden Plates) के नाम से भी जाना जाता है।

भारत सरकार साल 2012 से ही इन्हें वापस लाने की कोशिश में जुटी थी। अब लंबी अंतरराष्ट्रीय बातचीत और पीएम मोदी के सफल दौरे के बाद नीदरलैंड ने आधिकारिक तौर पर इन्हें भारत को सौंप दिया है।

क्यों खास है 30 किलो का यह प्राचीन खजाना?

इन 21 ऐतिहासिक ताम्रपत्रों का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व बहुत बड़ा है:

  • वजन और काल: लगभग 30 किलो वजनी इन ताम्रपत्रों को चोल वंश का सबसे महत्वपूर्ण जीवित रिकॉर्ड माना जाता है। ये महान हिंदू सम्राट राजराजा चोल प्रथम और उनके पुत्र राजेंद्र चोल के काल के हैं।

  • क्या लिखा है? इन ताम्रपत्रों पर संस्कृत और तमिल भाषा में एक बौद्ध मठ को दिए गए दान का विस्तृत विवरण दर्ज है।

  • शाही मुहर: इन 21 ताम्रपत्रों को एक साथ जोड़ने वाले कांस्य (Bronze) के छल्ले पर चोल वंश की ‘शाही मुहर’ लगी हुई है, जो इसकी प्रामाणिकता और भव्यता को दर्शाती है।

  • कैसे पहुंचे नीदरलैंड? इतिहास के पन्नों के अनुसार, 1700 के दशक में एक ईसाई मिशनरी इन बहुमूल्य ताम्रपत्रों को अपने साथ नीदरलैंड ले गया था।

भारत की इस ऐतिहासिक धरोहर की वापसी को पीएम मोदी की विदेश नीति और सांस्कृतिक कूटनीति की एक बहुत बड़ी सफलता माना जा रहा है।