‘मंगल पांडे व्यक्ति नहीं, आंदोलन थे’: दिल्ली में आयोजित हुई विशेष गोष्ठी
‘मंगल पांडे व्यक्ति नहीं, एक आंदोलन थे’: इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती की गोष्ठी में क्रांतिवीर को दी गई श्रद्धांजलि”
नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक मंगल पांडे जी की जयंती के अवसर पर दिल्ली की झिलमिल कॉलोनी में एक विशेष विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया।
‘इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती, दिल्ली’ (संबद्ध अखिल भारतीय साहित्य परिषद) के उत्तर-पूर्वी जिला द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में साहित्यकारों और वक्ताओं ने क्रांतिवीर मंगल पांडे को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्हें सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक ‘आंदोलन’ का जनक बताया।
कार्यक्रम का शुभारंभ परिषद गीत के साथ हुआ। इस गोष्ठी की अध्यक्षता प्रांत कार्यकारिणी सदस्य जगदीश सिंह जी ने की, जबकि मंच का सफल संचालन महामंत्री गुलशन लूथरा जी द्वारा किया गया।
कार्यक्रम के शुरुआत में प्रांत महामंत्री मनोज शर्मा जी ने मंगल पांडे जी के चित्र पर श्रद्धासुमन अर्पित किए।
‘उस चिंगारी ने हिला दी थी दिल्ली तक की सल्तनत’
गोष्ठी में चर्चा के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि मंगल पांडे ने जो चिंगारी सुलगाई थी, उसने पूरी अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला कर रख दी थीं।
वक्ताओं ने एक रोचक तथ्य साझा करते हुए कहा कि मंगल पांडे के विद्रोह के बाद अंग्रेज इतने खौफजदा हो गए थे कि उन्होंने आम सिपाहियों से राइफलें ही छीन लीं और उनके हाथों में सिर्फ डंडे थमा दिए।
यही कारण है कि आज स्वतंत्र भारत में भी अमूमन सिपाही के हाथ में डंडा ही दिखाई देता है। मंगल पांडे के उस आंदोलन ने आम जनमानस के मन से अंग्रेजों का डर पूरी तरह खत्म कर दिया था और जनता दिल्ली तक कूच कर गई थी।
जल्लादों ने भी फांसी देने से कर दिया था इनकार
मंगल पांडे के अदम्य साहस का जिक्र करते हुए बताया गया कि अंग्रेजों ने उन्हें 18 अप्रैल 1857 को फांसी देने का फरमान सुनाया था।
लेकिन उनका प्रताप ऐसा था कि जल्लादों के भीतर भी देशप्रेम उमड़ आया और उन्होंने पांडे जी को फांसी देने से साफ मना कर दिया।
डर के मारे अंग्रेजों ने तय तारीख से दस दिन पहले ही 8 अप्रैल को दूसरे अज्ञात जल्लादों को बुलाकर गुपचुप तरीके से उन्हें फांसी दे दी।
29 वर्ष की आयु में हो गए अमर
वक्ताओं ने कहा कि तगड़ी कद-काठी वाले मंगल पांडे 22 वर्ष की आयु में सिपाही भर्ती हुए और मात्र 29 वर्ष की उम्र में ही अपना नाम अमर कर गए।
जब बात धर्म की आई, तो उन्होंने अपनी नौकरी की परवाह नहीं की और गाय की चर्बी वाले कारतूसों के इस्तेमाल से साफ इनकार कर दिया।
उन्होंने न सिर्फ बगावत की, बल्कि अपनी बटालियन को भी अंग्रेजों के खिलाफ तैयार कर लिया। इस पुण्य आत्मा के अदम्य साहस को आज पूरा साहित्य जगत नमन कर रहा है।
गोष्ठी के दौरान एन.पी. सिंह राठौर जी, संतोष जी, श्रीमती अनीता वर्मा जी, के.के. शर्मा जी, सुरेश जी और प्रेम गोदारा जी ने भी अपने सारगर्भित विचार रखे।
कार्यक्रम के अंत में संयुक्त मंत्री सुनील दत्ता जी ने उपस्थित सभी अतिथियों और वक्ताओं का धन्यवाद ज्ञापन किया।











