मद्रास हाईकोर्ट : तिरुप्परनकुंद्रम की पहाड़ी पर जलेगा ‘कार्तिगई दीपम’

“मद्रास हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसले में तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी के दीपथून पर ‘कार्तिगई दीपम’ जलाने की अनुमति को न केवल बरकरार रखा है, बल्कि राज्य सरकार की दलीलों पर भी सख्त टिप्पणी की है”

चेन्नई 07 / 01 / 2026 संतोष सेठ की रिपोर्ट 

अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि सदियों पुरानी परंपराओं को प्रशासन की ‘सुविधा’ या ‘काल्पनिक डर’ की बलि नहीं चढ़ाया जा सकता।

“प्रशासन का काम भय पैदा करना नहीं, सुरक्षा देना है”

तमिलनाडु सरकार ने कोर्ट में दलील दी थी कि पहाड़ी पर दीपम जलाने से सामाजिक तनाव बढ़ सकता है और कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा हो सकती है। कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा:

  • निराधार आशंका: प्रशासन द्वारा लगाए गए प्रतिबंध निराधार और कल्पनाजन्य हैं।

  • शासन का दायित्व: प्रशासन का दायित्व समाज में भय पैदा करना नहीं, बल्कि निष्पक्ष और साहसिक ढंग से कानून-व्यवस्था बनाए रखना है।

  • संवैधानिक मर्यादा: कोर्ट ने कहा कि यदि हर परंपरा को विवाद के नाम पर रोक दिया गया, तो संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता मात्र कागजी बनकर रह जाएगी।

सामूहिक धार्मिक स्वतंत्रता की जीत

अदालत ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक बिंदु को रेखांकित किया। न्यायालय ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता केवल घर के भीतर की निजी पूजा तक सीमित नहीं है। सामूहिक और सार्वजनिक धार्मिक अभिव्यक्तियां भी इसके अंतर्गत आती हैं।

  • याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि कार्तिगई दीपम क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। इसे रोकने का प्रयास समाज में अनावश्यक विभाजन पैदा करता है।

  • कोर्ट ने इस तर्क से सहमति जताते हुए आदेश दिया कि परंपरागत रीति से ही दीपम प्रज्वलित किया जाए।

दोहरे मापदंड और चयनात्मक धर्मनिरपेक्षता पर प्रहार

देखा जाए तो यह निर्णय उस मानसिकता पर करारा प्रहार है, जो अक्सर हिंदू परंपराओं को कानून-व्यवस्था, प्रदूषण या शोर के नाम पर प्रतिबंधित करने की कोशिश करती है।

  • अदालत का संदेश: धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यह नहीं है कि राज्य केवल बहुसंख्यक समाज की परंपराओं के प्रति कठोर हो जाए।

  • सांस्कृतिक आत्मसम्मान: यह फैसला उन हिंदू संगठनों और भक्तों के लिए बड़ी जीत है, जो लंबे समय से इस मांग को लेकर संघर्ष कर रहे थे कि उनकी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को शक के चश्मे से न देखा जाए।

फैसले का सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव

मद्रास हाईकोर्ट का यह आदेश वर्तमान राजनीतिक माहौल में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

  • प्रशासनिक जवाबदेही: यह फैसला स्पष्ट करता है कि प्रशासनिक असफलता को छिपाने के लिए धार्मिक आयोजनों पर प्रतिबंध लगाना स्वीकार्य नहीं है।

  • सांस्कृतिक पुनर्जागरण: कार्तिगई दीपम का सामाजिक महत्व सामूहिकता में है। पहाड़ी पर जलता दीप समाज को जोड़ने का काम करता है। इस आदेश से समाज में यह विश्वास प्रबल हुआ है कि न्यायपालिका परंपराओं और संविधान की आत्मा की रक्षा के लिए सजग है।

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