Bengal Election Analysis

बंगाल चुनाव : जानिए ! भाजपा की ऐतिहासिक जीत के प्रमुख कारण

बंगाल में 15 साल बाद सत्ता परिवर्तन: ममता की विदाई तय, जानिए BJP की ऐतिहासिक जीत और TMC की हार के 7 बड़े कारण

कोलकाता: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत हो रही है। 15 साल से सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) की विदाई लगभग तय हो गई है और भारतीय जनता पार्टी (BJP) राज्य में पहली बार अपनी सरकार बनाती दिख रही है।

2011 में वामदलों के 34 साल के किले को ढहाकर सत्ता में आईं ‘स्ट्रीट फाइटर’ ममता बनर्जी का किला आखिरकार ढह गया है।

इस बार भाजपा ने केवल नैरेटिव ही नहीं बदला, बल्कि बूथ स्तर तक अपने संगठनात्मक ढांचे को अभेद्य बनाया।

आइए विस्तार से समझते हैं उन 7 प्रमुख कारणों को, जिन्होंने बंगाल में सत्ता परिवर्तन की पटकथा लिखी:

1. 15 साल की सत्ता विरोधी लहर और भ्रष्टाचार

15 साल के लंबे शासनकाल के बाद ममता सरकार के खिलाफ भारी एंटी-इंकंबेंसी थी। इसके अलावा, भ्रष्टाचार और ‘कट मनी’ इस चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बने। कई मंत्रियों पर लगे घोटालों के आरोपों ने टीएमसी की छवि को नुकसान पहुंचाया।

  • पारा क्लब और कट मनी: ममता सरकार ने ‘पारा क्लबों’ (मोहल्ला क्लब) को भारी फंड दिया (2012-2020 के बीच करीब 1300 करोड़)।

  • ये क्लब टीएमसी कार्यकर्ताओं के रूप में काम करते थे और कट मनी का सबसे बड़ा अड्डा बन गए थे, जिससे आम जनता में भारी रोष था।

  • कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा: संदेशखाली जैसी घटनाओं और आरजी कर मेडिकल कॉलेज में महिला डॉक्टर के साथ हुए दुष्कर्म-हत्या कांड ने ममता सरकार की कानून-व्यवस्था की पोल खोल दी।

  • महिला वोटरों और शहरी वर्ग ने सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए वोट किया। भाजपा ने आरजी कर पीड़िता की मां को चुनाव लड़ाकर इस मुद्दे को और धार दी।

2. SIR प्रक्रिया और बंपर मतदान का असर

बंगाल में SIR (Systematic Electoral Roll) प्रक्रिया गेम-चेंजर साबित हुई। इसके तहत मतदाता सूची से करीब 90 लाख नाम काटे गए, जिनमें से अधिकांश टीएमसी के प्रभुत्व वाली सीटों से थे।

इसके अलावा, राज्य में रिकॉर्ड 92.93% मतदान हुआ। इतिहास गवाह है कि जब भी बंपर वोटिंग होती है, वह अक्सर सत्ता परिवर्तन का संकेत होती है।

3. चुनाव में निर्णायक फैक्टर बने ‘युवा’

बंगाल के 6.44 करोड़ मतदाताओं में से करीब 1.4 से 1.7 करोड़ युवा (18-29 वर्ष) हैं। हर चौथा वोटर युवा था।

एसएससी (SSC) और शिक्षक भर्ती घोटालों, 26 हजार नियुक्तियां रद्द होने और बेरोजगारी जैसे मुद्दों ने युवाओं में भयंकर आक्रोश पैदा किया। इस युवा वर्ग ने टीएमसी के खिलाफ निर्णायक वोटिंग की।

4. हिंसा-मुक्त चुनाव और साइलेंट वोटर की ताकत

बंगाल के चुनाव हमेशा अपनी खूनी हिंसा के लिए जाने जाते रहे हैं। लेकिन इस बार चुनाव आयोग द्वारा केंद्रीय बलों (CAPF) की भारी तैनाती से मतदान अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा।

इससे वो ‘साइलेंट वोटर’ बिना किसी डर के घरों से बाहर निकला, जो पहले हिंसा के डर से सत्ता के खिलाफ वोट देने नहीं जाता था।

5. भाजपा ने अपनी पुरानी गलतियों से लिया सबक

2021 की तुलना में भाजपा की रणनीति में जमीन-आसमान का अंतर था:

  • मोदी बनाम ममता नहीं: भाजपा ने इस बार चुनाव को पीएम मोदी बनाम ममता बनर्जी नहीं बनने दिया। व्यक्तिगत हमलों से बचते हुए पूरा फोकस 15 साल की विसंगतियों पर रखा।

  • स्थानीय नेतृत्व पर भरोसा: बाहरी नेताओं (जैसे पिछले चुनाव में कैलाश विजयवर्गीय) के बजाय भाजपा ने टीएमसी के ही पुराने रणनीतिकार शुभेंदु अधिकारी को पूरी छूट दी।

  • स्थानीय नेताओं ने बांग्ला अस्मिता और ‘झालमुरी’ जैसे स्थानीय जुड़ाव से जनता को अपने पाले में किया।

6. अमित शाह की ‘माइक्रो मैनेजमेंट’ रणनीति

भाजपा के मुख्य रणनीतिकार और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बंगाल में डेरा डाल दिया था। चुनाव के आखिरी 15 दिनों में उन्होंने राज्य में रहकर दो दर्जन से अधिक रैलियां कीं और पर्दे के पीछे बूथ लेवल की रणनीतियां तैयार कीं।

उन्होंने ‘अंग, बंग और कलिंग’ में सरकार बनाने का जो नारा दिया था, उसे बंगाल के नतीजों ने सच साबित कर दिया।

7. सरकारी कर्मचारियों की भारी नाराजगी

टीएमसी की हार का एक बहुत बड़ा कारण राज्य के सरकारी कर्मचारी भी रहे। जहां पूरे देश में आठवें वेतन आयोग की चर्चा हो रही है, वहीं बंगाल सरकार अपने कर्मचारियों को अब भी छठे वेतन आयोग के हिसाब से वेतन दे रही है।

लंबे समय से सातवें वेतन आयोग की मांग कर रहे इन नाराज कर्मचारियों ने सरकार के खिलाफ वोट कर अपना गुस्सा निकाला।

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