ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: कांग्रेस का विरोध बनाम भारत की रणनीतिक जरूरत
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: कांग्रेस बता रही ‘विनाश’, रक्षा विशेषज्ञ बोले- चीन के चक्रव्यूह का अचूक जवाब है यह ‘अनसिंकेबल एयरक्राफ्ट कैरियर’
नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के ग्रेट निकोबार द्वीप पर प्रस्तावित 81,000 करोड़ रुपये की विशाल विकास परियोजना इन दिनों देश में एक तीखी राजनीतिक और रणनीतिक बहस का केंद्र बन गई है।
एक ओर विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी, इसे पर्यावरण और आदिवासियों के लिए खतरा बता रहे हैं, तो वहीं दूसरी ओर सरकार और रक्षा विशेषज्ञ इसे चीन को घेरने और भारत की समुद्री ताकत बढ़ाने के लिए एक ‘ब्रह्मास्त्र’ मान रहे हैं।
आइए समझते हैं इस पूरी परियोजना का सच और इसके रणनीतिक मायने।
राहुल गांधी और कांग्रेस का विरोध: ‘विकास के नाम पर विनाश’
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल ही में इस द्वीप का दौरा किया और इस परियोजना को “प्राकृतिक और जनजातीय विरासत के खिलाफ सबसे बड़ा अपराध” करार दिया।
उनका आरोप है कि इस प्रोजेक्ट के लिए लगभग 160 वर्ग किलोमीटर वर्षावन क्षेत्र को खत्म कर दिया जाएगा और लाखों पेड़ काटे जाएंगे।
कांग्रेस का तर्क है कि इससे वहां रहने वाली ‘शोंपेन’ (Shompen) जनजाति के अस्तित्व पर गंभीर संकट आ जाएगा।
इससे पहले सोनिया गांधी भी लेख के जरिए इस इकोसिस्टम को लेकर चिंता जता चुकी हैं। विपक्ष का आरोप है कि स्थानीय समुदायों की सहमति के बिना यह सब किया जा रहा है और वे इस मुद्दे को संसद में उठाने की तैयारी में हैं।
क्या है 81,000 करोड़ का यह मेगा प्रोजेक्ट?
नीति आयोग द्वारा तैयार और केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत इस योजना के चार प्रमुख घटक हैं:
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एक विशाल ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह (गैलेथिया खाड़ी में)
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अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
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ऊर्जा संयंत्र (Power Plant)
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सैन्य ढांचे का विस्तार
चीन की उड़ी नींद: मलक्का डिलेमा और ‘नेकलेस ऑफ डायमंड्स’
ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति दुनिया में सबसे खास है। यह ‘मलक्का जलडमरूमध्य’ (Strait of Malacca) के पश्चिमी प्रवेश द्वार से मात्र 40 समुद्री मील दूर है।
दुनिया का 30% कंटेनर व्यापार और चीन का 60-75% ऊर्जा व तेल आयात इसी मार्ग से होता है। चीनी रणनीतिकार इसे अपनी सबसे बड़ी कमजोरी मानते हैं, जिसे ‘मलक्का डिलेमा’ कहा जाता है।
चीन ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (ग्वादर, हम्बनटोटा आदि) के जरिए भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है। इसके जवाब में भारत ने ‘नेकलेस ऑफ डायमंड्स’ रणनीति अपनाई है, जिसका सबसे बड़ा केंद्र ग्रेट निकोबार बनेगा।
ईरान-होर्मुज जलडमरूमध्य विवाद ने भी यह साबित कर दिया है कि समुद्री मार्गों पर नियंत्रण कितना जरूरी है।
‘अनसिंकेबल एयरक्राफ्ट कैरियर’: पूर्व वायुसेना प्रमुख का तर्क
परियोजना के समर्थन में पूर्व वायुसेना प्रमुख आर.के.एस. भदौरिया ने मोर्चा संभाला है। उन्होंने विपक्ष के दावों को खारिज करते हुए कहा कि ग्रेट निकोबार भारत के लिए एक “अनसिंकेबल एयरक्राफ्ट कैरियर” (कभी न डूबने वाला विमानवाहक पोत) है।
जब आपके पास अग्रिम मोर्चे पर हवाई पट्टी और नौसैनिक ढांचा होता है, तो आप पूरे समुद्री क्षेत्र को नियंत्रित कर सकते हैं।
आर्थिक लाभ: विदेशी बंदरगाहों पर खत्म होगी निर्भरता
वर्तमान में भारत का 75% ट्रांसशिपमेंट कार्य विदेशी बंदरगाहों (कोलंबो, सिंगापुर आदि) पर निर्भर है, जिससे देश को हर साल 20 से 40 करोड़ डॉलर का नुकसान होता है।
गैलेथिया बे की प्राकृतिक गहराई (20 मीटर से अधिक) दुनिया के सबसे बड़े मालवाहक जहाजों (10-25 हजार TEU) को डॉक करने के लिए आदर्श है।
इस प्रोजेक्ट के पूरा होने से भारत 1 लाख प्रत्यक्ष और 1.5 लाख अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा करेगा और भारी विदेशी मुद्रा बचाएगा।
पर्यावरण विनाश के आरोपों का सच क्या है?
रक्षा विशेषज्ञों और सरकारी आंकड़ों के अनुसार, यह दावा भ्रामक है कि पूरे द्वीप का जंगल काटा जा रहा है।
परियोजना के लिए द्वीप के कुल वन क्षेत्र का केवल 1.82% हिस्सा ही इस्तेमाल किया जा रहा है। 82% जंगल पूरी तरह से सुरक्षित और अछूता रहेगा।
इस प्रोजेक्ट को जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ZSI) और वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) जैसी संस्थाओं से मंजूरी मिल चुकी है और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) भी विरोध की याचिकाओं को खारिज कर चुका है।
निष्कर्ष यह है कि ग्रेट निकोबार परियोजना केवल एक बुनियादी ढांचा नहीं है; यह भारत के भविष्य, आर्थिक आत्मनिर्भरता और चीन जैसी विस्तारवादी ताकतों को रोकने के लिए एक सख्त सामरिक आवश्यकता है।











