Himanta Biswa Sarma

जानिए ! असम में BJP की जीत के ‘शिल्पकार’ हिमंत बिस्व सरमा के बारे में

असम में BJP की हैट्रिक के ‘शिल्पकार’ हिमंत बिस्व सरमा: राहुल गांधी के ‘कुत्ते’ वाले विवाद से लेकर ‘मामा’ और CM बनने तक की पूरी कहानी

गुवाहाटी/नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

असम विधानसभा चुनाव के रुझानों में एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी (BJP) प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाती हुई दिख रही है।

126 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा ने बहुमत का जादुई आंकड़ा आसानी से पार कर लिया है और कांग्रेस काफी पीछे छूट गई है।

लगातार तीसरी बार असम में कमल खिलाने का पूरा श्रेय राज्य के मुख्यमंत्री और पूर्वोत्तर में भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले हिमंत बिस्व सरमा को दिया जा रहा है।

2016 से लेकर अब तक असम और पूर्वोत्तर में भाजपा का झंडा बुलंद करने वाले हिमंत का राजनीतिक सफर बेहद दिलचस्प और संघर्षपूर्ण रहा है।

आइए जानते हैं असम के लोकप्रिय ‘मामा’ यानी हिमंत बिस्व सरमा के छात्र नेता से लेकर मुख्यमंत्री बनने तक की पूरी कहानी:

वकालत, छात्र राजनीति और राजीव गांधी से मुलाकात

1 फरवरी 1969 को जोरहाट में जन्मे हिमंत बिस्व सरमा की शुरुआती शिक्षा गुवाहाटी में हुई। कॉटन कॉलेज से राजनीति विज्ञान में ग्रैजुएशन, पोस्ट-ग्रैजुएशन, लॉ (LLB) और बाद में पीएचडी करने वाले हिमंत पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहे। उन्होंने 1996 से 2001 तक गुवाहाटी हाईकोर्ट में वकालत भी की।

उनका राजनीतिक सफर ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) से शुरू हुआ। 18 साल की उम्र में वे कॉटन कॉलेज छात्र संघ के महासचिव चुने गए।

उनकी नेतृत्व क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि छात्र जीवन में ही वे दिल्ली जाकर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से मिले और एक फुटबॉल स्टेडियम के लिए फंड मंजूर करवा लाए थे।

कांग्रेस के ताकतवर मंत्री और वह ‘पिद्दी’ वाला विवाद

आसू से मतभेदों के बाद पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया उन्हें कांग्रेस में लेकर आए। 2001 में हिमंत ने जालुकबारी सीट से चुनाव जीता और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के कार्यकाल (2002-2014) में वे स्वास्थ्य, शिक्षा और वित्त जैसे विभागों को संभालते हुए सरकार के ‘नंबर 2’ नेता बन गए। उन्होंने राज्य में कई मेडिकल कॉलेजों का जाल बिछाया।

लेकिन, 2011 के बाद तरुण गोगोई ने जब अपने बेटे गौरव गोगोई को आगे बढ़ाना शुरू किया, तो हिमंत ने बगावत कर दी।

2015 में इस विवाद को सुलझाने के लिए वे राहुल गांधी से मिलने दिल्ली पहुंचे। हिमंत कई बार बता चुके हैं कि उस बैठक में राहुल गांधी उनकी बातों को अनसुना कर अपने पालतू कुत्ते ‘पिद्दी’ को बिस्किट खिलाने में व्यस्त थे।

इस अपमान के बाद उन्होंने सोनिया गांधी को कड़ा पत्र लिखा और 2015 में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया।

भाजपा में एंट्री: अमित शाह का भरोसा और पूर्वोत्तर फतह

अगस्त 2015 में हिमंत अमित शाह के नेतृत्व में आधिकारिक तौर पर भाजपा में शामिल हो गए। उस वक्त पूर्वोत्तर में भाजपा को एक मजबूत स्थानीय चेहरे की तलाश थी, जिसे सरमा ने पूरा किया।

2016 में उन्होंने एक प्रमुख रणनीतिकार के रूप में असम में पहली बार भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनवाई।

उन्हें ‘नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस’ (NEDA) का संयोजक बनाया गया और उन्होंने मेघालय, मणिपुर व अरुणाचल प्रदेश में भी कमल खिला दिया।

2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की दोबारा जीत के बाद, पार्टी आलाकमान ने सर्वानंद सोनोवाल की जगह 10 मई 2021 को हिमंत को असम का 15वां मुख्यमंत्री बना दिया।

कट्टर हिंदुत्व की छवि और दिल्ली के ‘संकटमोचक’

कांग्रेस पृष्ठभूमि से आने के बावजूद हिमंत ने भाजपा की कट्टर हिंदुत्व राजनीति को पूरी तरह आत्मसात कर लिया।

मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने गोहत्या विरोधी कानून (मवेशी संरक्षण अधिनियम) लागू किया, सरकारी मदरसों को सामान्य स्कूलों में बदला और ‘मियां’ मुसलमानों के खिलाफ अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाया।

वे आज अमित शाह और पीएम मोदी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में से एक हैं। चाहे महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी सरकार गिराने के दौरान एकनाथ शिंदे गुट के बागी विधायकों को गुवाहाटी में सुरक्षित ठहराना हो,

या खालिस्तानी समर्थक अमृतपाल के सहयोगियों को डिब्रूगढ़ जेल में रखना हो, दिल्ली आलाकमान ने हमेशा सरमा पर भरोसा जताया है।

इन सख्त और आक्रामक फैसलों के समानांतर, असम की जनता के बीच उनकी छवि एक बेहद मिलनसार नेता की है।

असम के युवा और महिलाएं उन्हें प्यार से ‘मामा’ (बड़े भाई) कहते हैं, जो उनके बीच जाकर नाचने-गाने और बेबाकी से बात करने के लिए मशहूर हैं।

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