ग्लोबल मार्केट में भारत का ‘सिल्वर स्ट्राइक’: 6,000 टन चांदी का आयात कर दुनिया को चौंकाया

“वैश्विक कमोडिटी बाजार में एक ऐसी खामोश हलचल हो रही है जिसने लंदन से लेकर न्यूयॉर्क तक के वित्तीय गलियारों में चिंता बढ़ा दी है। सालों तक चांदी की नब्ज पश्चिमी देशों के हाथों में रही”

नई दिल्ली/न्यूयॉर्क 07 / 01 / 2026 संतोष सेठ की रिपोर्ट 

लेकिन 2026 की शुरुआत में भारत एक ऐसी ‘व्हेल’ (सबसे बड़ा खिलाड़ी) की तरह उभरा है, जो अब सिर्फ बाजार का हिस्सा नहीं रहा, बल्कि उसके नियम तय कर रहा है।

पश्चिमी तिजोरियां खाली, भारत का भंडार फुल

भारतीय वाणिज्य मंत्रालय के ताजा आंकड़ों ने पूरी दुनिया के अर्थशास्त्रियों को हैरान कर दिया है। साल 2025 के दौरान और 2026 की शुरुआत तक भारत ने लगभग 6,000 मीट्रिक टन चांदी का आयात किया है। यह मात्रा पूरी दुनिया में होने वाले कुल वार्षिक खनन (Mining) का करीब 25 प्रतिशत है।

बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि यह चांदी अब लंदन (LBMA) की तिजोरियों से निकलकर सीधे भारतीय हाथों में आ गई है, जहाँ से इसका वापस ग्लोबल मार्केट में आना लगभग नामुमकिन है।

‘प्राइस-सेंसिटिव’ से ‘प्राइस-मेकर’ बना भारत

अब तक माना जाता था कि भारतीय खरीदार केवल कीमतें गिरने पर ही चांदी या सोना खरीदते हैं। लेकिन इस बार कहानी पूरी तरह बदल चुकी है। भारत अब ‘बाइंग द रिप’ (Buying the Rip) की रणनीति अपना रहा है, यानी कीमतें बढ़ने के बावजूद भारतीय बाजार में आक्रामक खरीदारी जारी है।

बड़ी बात: जहां अंतरराष्ट्रीय मार्केट में चांदी की ‘पेपर’ (कागजी) कीमत कम दिख रही है, वहीं मुंबई के हाजिर बाजार (Physical Market) में भाव $75 प्रति औंस के करीब पहुंच गए हैं। यह संकेत है कि भारत ने पश्चिमी देशों के ‘कागजी भाव’ को सिरे से नकार दिया है।

चांदी की ‘महा-डिमांड’ के 3 बड़े कारण

  1. सोलर क्रांति और PLI स्कीम: भारत सरकार की पीएलआई योजना के तहत देश में सोलर पैनल की विशाल ‘गीगाफैक्ट्रियां’ लग रही हैं। सोलर सेल बनाने के लिए चांदी अनिवार्य है। भारतीय कंपनियां भविष्य की सप्लाई को सुरक्षित करने के लिए अभी से भारी स्टॉक जमा कर रही हैं।

  2. न्यू-एज टेक्नोलॉजी: 5G नेटवर्क, डेटा सेंटर्स और AI आधारित प्रणालियों में चांदी की भूमिका अहम है। साथ ही, एक इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) में औसतन 25 ग्राम चांदी लगती है। 2030 तक ग्लोबल ईवी मार्केट में चांदी की खपत कई गुना बढ़ने वाली है।

  3. करेंसी वॉर और ‘डी-डलराइजेशन’: ब्रिक्स (BRICS) देशों के बीच डॉलर पर निर्भरता कम करने की होड़ मची है। भारत चांदी को एक ‘हार्ड एसेट’ (ठोस संपत्ति) के रूप में देख रहा है, जिसे ‘यूनिट 939’ जैसी रणनीतिक योजनाओं के तहत सुरक्षित किया जा रहा है।

चीन और अमेरिका के बीच ‘मेटल वॉर’

चांदी अब सिर्फ एक धातु नहीं, बल्कि युद्ध का एक हथियार (Strategic Weapon) बन गई है।

  • चीन का एक्शन: दुनिया के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक चीन ने चांदी के निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं। चीन का मानना है कि भविष्य की जंग तेल पर नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी और मेटल्स पर लड़ी जाएगी।

  • अमेरिका का डर: ट्रंप प्रशासन ने चांदी और तांबे को ‘रेयर मेटल’ की श्रेणी में डाल दिया है। पश्चिमी देशों को डर है कि अगर फिजिकल चांदी की कमी हुई, तो उनके टेक-प्रोजेक्ट्स ठप हो सकते हैं।

एक्सपर्ट व्यू: क्या $100 के पार जाएगी चांदी?

मार्केट एनालिस्ट्स का मानना है कि हम एक ऐतिहासिक ‘शॉर्ट स्क्वीज’ की ओर बढ़ रहे हैं। जब पश्चिमी एक्सचेंजों के पास फिजिकल डिलीवरी देने के लिए चांदी नहीं बचेगी, तब कीमतों में अचानक विस्फोट हो सकता है। जिस रफ्तार से भारत खरीदारी कर रहा है, वह दिन दूर नहीं जब चांदी ट्रिपल डिजिट ($100 से ऊपर) में ट्रेड करती दिखेगी।

PREMIUM NEWS

अपनी Premium Membership चुनें

Premium articles बिना restriction पढ़ें।

Monthly

₹99/month

30 days Premium access

You have successfully subscribed to the newsletter

There was an error while trying to send your request. Please try again.

The Politics Again will use the information you provide on this form to be in touch with you and to provide updates and marketing.