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भारत-नेपाल सीमा विवाद: लिपुलेख पर नेपाल का दावा, भारत सख्त

भारत-नेपाल सीमा विवाद फिर गरमाया: लिपुलेख पर नेपाल ने दोहराया दावा, भारत ने ‘एकतरफा कृत्रिम विस्तार’ बताकर किया खारिज

नई दिल्ली/काठमांडू: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

भारत और नेपाल के बीच दशकों पुराना सीमा विवाद एक बार फिर से सतह पर आ गया है। इस बार विवाद के केंद्र में है उत्तराखंड का लिपुलेख दर्रा और वहां से होकर गुजरने वाली पवित्र ‘कैलाश मानसरोवर यात्रा’।

सोमवार को नेपाल सरकार ने लिपुलेख दर्रे पर अपना पुराना क्षेत्रीय दावा एक बार फिर दोहराते हुए भारत के साथ कूटनीतिक बातचीत के जरिए समाधान निकालने की वकालत की है।

नेपाल की यह प्रतिक्रिया भारत द्वारा उसके दावों को कड़े शब्दों में खारिज किए जाने के ठीक एक दिन बाद आई है।

भारत ने नेपाल की आपत्तियों को किया दरकिनार

दरअसल, रविवार को भारत ने उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से दशकों से आयोजित होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर नेपाल की आपत्तियों को सिरे से खारिज कर दिया था।

भारत ने स्पष्ट और सख्त शब्दों में कहा कि पड़ोसी देश द्वारा क्षेत्रीय दावों का इस तरह का ‘‘एकतरफा कृत्रिम विस्तार’’ उसे किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।

नेपाल का रुख: ‘यह क्षेत्र हमारा है’

भारत की इस कड़ी प्रतिक्रिया से पहले नेपाल के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर भारत और चीन द्वारा लिपुलेख दर्रे के रास्ते आगामी कैलाश मानसरोवर यात्रा आयोजित करने की योजना पर भारी आपत्ति जताई थी।

नेपाल सरकार के प्रवक्ता और शिक्षा, विज्ञान व प्रौद्योगिकी मंत्री सस्मित पोखरेल ने मीडिया से बातचीत में दावा किया, ‘‘नेपाल का अपनी सीमा बढ़ाने का कोई इरादा नहीं है; यह क्षेत्र नेपाल का ही है। सरकार का इस बारे में स्पष्ट दृष्टिकोण है और वह अपने रुख के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है।’’

पोखरेल ने आगे कहा कि इस मुद्दे को दोनों देशों के बीच आपसी सहयोग और राजनयिक बातचीत के माध्यम से हल करने की आवश्यकता है।

उन्होंने जानकारी दी कि नेपाल के विदेश मंत्रालय ने इस मामले को लेकर भारत को एक औपचारिक पत्र (प्रोटेस्ट नोट) भी भेज दिया है।

कैलाश मानसरोवर यात्रा और इसका महत्व

चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में स्थित कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील हिंदुओं, जैनियों और बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए गहरी धार्मिक आस्था का केंद्र है।

भारत और चीन के बीच संबंधों को सामान्य बनाने के प्रयासों के तहत लगभग पांच साल के लंबे अंतराल के बाद पिछले साल यह यात्रा फिर से शुरू हुई थी।

भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने इसी साल 30 अप्रैल को घोषणा की थी कि वार्षिक कैलाश मानसरोवर यात्रा इस वर्ष जून से अगस्त तक दो मुख्य मार्गों—उत्तराखंड में ‘लिपुलेख दर्रा’ और सिक्किम में ‘नाथू ला दर्रा’ के रास्ते आयोजित की जाएगी। इसी घोषणा के बाद नेपाल ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई।

कूटनीतिक जटिलता और 2020 का ‘नया नक्शा’ विवाद

लिपुलेख का यह मुद्दा कोई नया नहीं है। साल 2020 में यह विवाद तब अपने चरम पर पहुंच गया था, जब नेपाल की तत्कालीन सरकार ने अपना एक नया राजनीतिक मानचित्र जारी कर दिया था।

उस विवादित नक्शे में नेपाल ने भारत के लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को अपने संप्रभु क्षेत्र के रूप में दिखाया था, जिसे भारत ने हमेशा से ही खारिज किया है।

रक्षा और विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और नेपाल के बीच ‘रोटी-बेटी’ के प्रगाढ़ संबंध और गहरी सांस्कृतिक समानताएं रही हैं।

इसके बावजूद, सीमा विवाद को लेकर नेपाल का यह “एकतरफा” नैरेटिव दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

Santosh SETH

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