सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाने वाले किशोरों के खिलाफ पॉक्सो अधिनियम के प्रावधानों के कथित दुरुपयोग पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
‘इज्जत’ बचाने के लिए पॉक्सो का दुरुपयोग, प्रेम संबंधों में किशोरों के भागने को कैसे रोकेंगे? सुप्रीम कोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल”
नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
देश के उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने समाज, सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाते हुए एक बेहद संवेदनशील मुद्दे पर चिंता जाहिर की है।
सोमवार को एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि प्रेम संबंधों के चलते लड़के-लड़कियों के घर छोड़कर भागने की घटनाओं को आखिर कैसे रोका जा सकता है?
इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाने वाले किशोरों (Teenagers) के खिलाफ पॉक्सो (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण – POCSO) अधिनियम के हो रहे कथित दुरुपयोग पर भी गंभीर चिंता जताई।
न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने समाज की एक कड़वी सच्चाई की ओर इशारा करते हुए टिप्पणी की।
पीठ ने कहा कि जब किशोर लड़कियां अपने साथियों (पार्टनर्स) के साथ अपनी मर्जी से चली जाती हैं, तो उनके माता-पिता अक्सर अपनी तथाकथित ‘सामाजिक प्रतिष्ठा’ या ‘इज्जत’ बचाने के लिए लड़कों के खिलाफ आपराधिक मामले (Kidnapping और POCSO) दर्ज करा देते हैं।
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि पॉक्सो (POCSO) कानून को बनाने का मुख्य उद्देश्य बच्चों को यौन उत्पीड़न और शोषण से बचाना है, न कि आपसी सहमति से बने संबंधों को अपराध की श्रेणी में डालना।
पीठ ने मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर जोर देते हुए कहा, “15 से 18 वर्ष की आयु बेहद संवेदनशील होती है। यह जीवन में प्रयोग (Experiment) करने की उम्र है।”
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने यौन संबंधों के मामले वास्तव में पॉक्सो के कठोर दायरे में आते हैं?
आपको बता दें कि शीर्ष अदालत किशोरों के निजता (Privacy) के अधिकार से जुड़े एक मामले की स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेकर सुनवाई कर रही है।
यह पूरी कानूनी बहस कलकत्ता उच्च न्यायालय के 2023 के एक विवादास्पद फैसले के बाद शुरू हुई थी।
उस फैसले में उच्च न्यायालय ने किशोर लड़कियों को अपनी यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखने की सलाह दी थी।
हालांकि, 2024 में उच्चतम न्यायालय ने इस फैसले को खारिज कर दिया था और किशोरों की निजता के अधिकार पर कई दिशा-निर्देश जारी किए थे।
इस मामले में अदालत की सहायता कर रहीं वरिष्ठ अधिवक्ता (Amicus Curiae) माधवी दीवान ने अदालत में पॉक्सो मामलों में व्यवस्था की विफलता को लेकर एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की।
उन्होंने पीठ को एक उदाहरण देते हुए बताया कि एक नाबालिग लड़की 25 वर्षीय पुरुष के साथ भाग गई थी। अब वह उसके साथ खुश है और उनका एक बच्चा भी है, लेकिन कानून के तहत युवक को अपराधी माना जाता है।
दीवान ने दलील दी कि कानून के इस दुरुपयोग को रोकने के लिए एक ठोस व्यवस्था की सख्त जरूरत है, क्योंकि आपसी सहमति से रिश्तों में शामिल किशोरों को भी बिना वजह जेल भेज दिया जाता है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस तथ्य पर भी गौर किया कि किशोरों के बीच शारीरिक संबंध वर्ष 2012 में सहमति की कानूनी उम्र 16 से बढ़ाकर 18 वर्ष किए जाने से पहले भी बन रहे थे।
पीठ ने कहा कि सहमति की उम्र 18 साल किए जाने के बाद से ऐसे मामले कानूनी रूप से अवैध हो गए हैं और इसके चलते आपराधिक मामलों की बाढ़ आ गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा है कि इस दिशा में जो भी दिशा-निर्देश दिए जाएं, वे पूरी तरह से व्यावहारिक (Practical) होने चाहिए ताकि किशोरों के कल्याण और बाल संरक्षण के उपायों को सही मायनों में प्रभावी बनाया जा सके। अब इस अहम मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई को होगी।
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