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जेएनयू में फिर एक बार भड़की वैचारिक जंग : छिड़ा सियासी संग्राम

“दिल्ली दंगा साजिश मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार किए जाने के बाद, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) एक बार फिर विवादों के केंद्र में है”

नई दिल्ली 07 / 01 / 2026 संतोष सेठ की रिपोर्ट 

अदालत के फैसले के विरोध में परिसर के भीतर कुछ छात्र समूहों द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ उग्र और विवादास्पद नारेबाजी की गई, जिसके वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं।

न्यायिक फैसले पर ‘सड़कछाप’ चुनौती?

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के कुछ ही घंटों बाद जेएनयू के साबरमती और गंगा ढाबा क्षेत्र में छात्रों की भीड़ जुटना शुरू हुई। प्रदर्शनकारियों ने न केवल अदालती फैसले पर सवाल उठाए, बल्कि देश की शीर्ष संवैधानिक हस्तियों के खिलाफ अपमानजनक नारे भी लगाए।

आलोचकों का तर्क है कि ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ की यह पुरानी कार्यशैली है—जब तक न्यायपालिका उनके अनुकूल फैसला दे, तब तक वह महान है, अन्यथा वह “अभिव्यक्ति की आजादी” की आड़ में अराजकता फैलाने का जरिया बन जाती है।

अर्बन नक्सल नेटवर्क और बदलता भारत

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कोई संयोग नहीं है। जब भी देश के भीतर आतंकवाद, माओवाद या ‘शहरी नक्सल’ (Urban Naxal) नेटवर्क पर कानून का शिकंजा कसता है, तो जेएनयू जैसे संस्थानों से एक विशेष वर्ग सक्रिय हो जाता है।

  • बदला हुआ परिदृश्य: आज का भारत 1990 का दशक नहीं है। कश्मीर में आतंकवाद की कमर तोड़ना और माओवाद को अंतिम चरण में पहुँचाना यह साबित करता है कि अब देश की राजनीतिक इच्छाशक्ति और सुरक्षा बलों की रणनीति पूरी तरह स्पष्ट है।

  • कानूनी प्रक्रिया: सुप्रीम कोर्ट का निर्णय किसी सरकार का नहीं, बल्कि संविधान की मर्यादा का प्रतिबिंब है। ऐसे में नारेबाजी के जरिए देश की न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करने की कोशिशों पर अब सवाल खड़े हो रहे हैं।

राजनीतिक बयानबाजी का दौर

इस घटना ने दिल्ली की राजनीति को पूरी तरह गर्मा दिया है:

  • JNUSU का पक्ष: छात्र संघ अध्यक्ष अदिति मिश्रा ने दावा किया कि ये नारे केवल ‘वैचारिक’ विरोध थे और किसी व्यक्ति विशेष को निशाना नहीं बनाया गया। उन्होंने इसे 5 जनवरी 2020 की हिंसा के विरोध में किया गया वार्षिक प्रदर्शन बताया।

  • बीजेपी का पलटवार: केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह और बीजेपी नेता कपिल मिश्रा ने इस कृत्य की कड़ी निंदा की है। उन्होंने कहा कि मुट्ठी भर लोग जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान को देश विरोधी सोच का अड्डा बनाना चाहते हैं, जिसे अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

निष्कर्ष

जेएनयू से यह अपेक्षा की जाती है कि वह राष्ट्र को नई दिशा देने वाले विचार पैदा करे, न कि विभाजनकारी एजेंडे को हवा दे। फिलहाल, दिल्ली पुलिस और विश्वविद्यालय प्रशासन वायरल वीडियो की जांच कर रहे हैं। यह स्पष्ट है कि नया भारत अब नारों के भ्रमजाल में फंसने वाला नहीं है और कानून का रास्ता किसी भी दबाव में नहीं रुकेगा।

टुकड़े टुकड़े गैंग को समझना होगा कि आज का भारत 1990 या 2000 का भारत नहीं है। यह वही भारत है जिसने कश्मीर में आतंकवाद की कमर तोड़ी, माओवाद को खत्म करने की राह पर है और उग्रवाद को समाप्त कर दिया है।

Santosh SETH

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