ऐतिहासिक फैसला: धार की भोजशाला को हाई कोर्ट ने माना मंदिर
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: धार की ‘भोजशाला’ को माना मंदिर, हिंदुओं को मिला पूजा का पूर्ण अधिकार; ASI की रिपोर्ट पर मुहर”
इंदौर/धार: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक ‘भोजशाला’ (Bhojshala) को लेकर चल रहे दशकों पुराने विवाद में शुक्रवार (15 मई) को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने अपना ऐतिहासिक और बहुप्रतीक्षित फैसला सुना दिया है।
हाई कोर्ट ने हिंदू पक्ष की मांग को स्वीकार करते हुए भोजशाला को आधिकारिक तौर पर ‘मंदिर’ करार दिया है।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि यह स्थल परमार वंश के राजा भोज द्वारा स्थापित मां वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर और संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र था, और यहां हिंदू पूजा-अर्चना की निरंतरता कभी समाप्त नहीं हुई।
हाई कोर्ट के फैसले की प्रमुख बातें
हाई कोर्ट ने 12 मई को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। 2022 में ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ द्वारा दायर याचिका का निपटारा करते हुए कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश और निष्कर्ष दिए हैं:
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धार्मिक स्वरूप: इस विवादित क्षेत्र का धार्मिक स्वरूप ‘देवी वाग्देवी सरस्वती’ के मंदिर सहित भोजशाला का है।
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ASI रिपोर्ट पर भरोसा: कोर्ट ने पुरातात्विक साक्ष्यों और ‘आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया’ (ASI) की सर्वेक्षण रिपोर्ट पर पूरी तरह से भरोसा जताया।
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प्रशासन और प्रबंधन: केंद्र सरकार और ASI इस संपत्ति का समग्र प्रशासन जारी रखेंगे। मंदिर और संस्कृत शिक्षण के उद्देश्यपूर्ण प्रबंधन के लिए उचित निर्णय लिए जाएंगे।
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तीर्थयात्रियों को सुविधाएं: कोर्ट ने प्रशासन को निर्देश दिया है कि तीर्थयात्रियों को बुनियादी सुविधाएं प्रदान करना और देवता के स्वरूप की पवित्रता का संरक्षण करना उनका संवैधानिक कर्तव्य है।
ASI के सर्वे में क्या-क्या मिला था?
हाई कोर्ट के आदेश पर ASI ने भोजशाला परिसर का 98 दिनों (साल 2024 में) तक वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया था। इस 2000 पन्नों की रिपोर्ट ने फैसले में अहम भूमिका निभाई:
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परिसर में 106 खंभे और 82 प्लास्टर मिले, जो पुराने हिंदू मंदिरों का हिस्सा थे और जिन्हें बाद में कमाल मौला मस्जिद में इस्तेमाल किया गया।
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स्तंभों पर देवी-देवताओं की मूर्तियों, शेर, हाथी और अन्य आकृतियों को तोड़ा या विकृत किया हुआ पाया गया।
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सर्वे में 10वीं-11वीं शताब्दी के परमार कालीन शिलालेख और सिक्के भी बरामद हुए।
“अब वहां सिर्फ पूजा होगी”- हिंदू पक्ष के वकील
इस फैसले के बाद हिंदू पक्ष के वकील विष्णु शंकर जैन ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा,
“हाई कोर्ट ने भोजशाला को राजा भोज का मंदिर माना है और हमें पूजा का पूर्ण अधिकार दिया है। ASI की रिपोर्ट पर कोर्ट ने मुहर लगा दी है। अब वहां सिर्फ पूजा होगी, आज वहां आखिरी नमाज पढ़ी गई है। मुस्लिम पक्ष चाहे तो सरकार से वैकल्पिक जमीन (Alternate Land) की मांग कर सकता है।”
धार जिले में हाई अलर्ट, चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात
इस संवेदनशील फैसले को देखते हुए धार जिले में सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी कर दी गई है।
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जिले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 लागू कर दी गई है, जिससे 5 से ज्यादा लोगों के इकट्ठा होने, धरना-प्रदर्शन और जुलूस पर पूर्ण प्रतिबंध है।
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पुलिस सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट करने वालों की सख्त निगरानी कर रही है।
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बोतलों में पेट्रोल-डीजल की बिक्री पर भी तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई है।
धार भोजशाला विवाद: 1010 ई. के राजा भोज से लेकर 2026 के हाई कोर्ट फैसले तक… जानें पूरे 1000 साल की ‘टाइमलाइन’ और ASI रिपोर्ट के सबसे बड़े दावे
अदालत के इस ऐतिहासिक फैसले के पीछे पुरातात्विक साक्ष्य और ASI की 2000 पन्नों की रिपोर्ट सबसे बड़ा आधार बनी है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह विवाद आज का नहीं, बल्कि सदियों पुराना है?
‘The Politics Again’ की इस विशेष रिपोर्ट में आइए समझते हैं राजा भोज के काल से लेकर अदालत के फैसले तक की पूरी टाइमलाइन और वे ठोस साक्ष्य, जिन्होंने इस केस की दिशा बदल दी।
राजा भोज से अदालत तक: विवाद की संक्षिप्त टाइमलाइन
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1010-1055 ई.: परमार वंश के प्रतापी राजा भोज का शासनकाल।
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1034 ई.: इस स्थल पर ‘सरस्वती सदन’ (संस्कृत शिक्षा केंद्र) के निर्माण का ऐतिहासिक उल्लेख।
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1305-1409 ई.: मालवा पर मुस्लिम आक्रमण और इस ऐतिहासिक संरचना में बदलाव के प्रयास।
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1459 ई.: कमाल मौला से जुड़ी संरचना का पहली बार उल्लेख।
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1875 ई.: खुदाई के दौरान मां वाग्देवी (सरस्वती) की प्रतिमा मिलने का दावा।
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1909 ई.: ब्रिटिश काल में इस परिसर को ‘संरक्षित स्मारक’ घोषित किया गया।
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1934 ई.: भोजशाला और कमाल मौला मस्जिद को लेकर प्रशासनिक स्तर पर आदेश जारी।
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1952 ई.: वसंत पंचमी के दिन ‘भोज उत्सव’ मनाने की शुरुआत।
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2003 ई.: विवाद सुलझाने के लिए हिंदुओं को मंगलवार (पूजा) और मुस्लिमों को शुक्रवार (नमाज) के दिन की व्यवस्था लागू की गई।
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2022 ई.: हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस और अन्य पक्षकारों द्वारा हाई कोर्ट में नई रिट याचिका दाखिल की गई, जिसमें वैज्ञानिक जांच की मांग हुई।
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2024 ई.: हाई कोर्ट के आदेश पर ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) ने सर्वे शुरू किया।
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2026 ई.: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला- भोजशाला परिसर को ‘मंदिर’ माना गया।
98 दिन का वैज्ञानिक सर्वे और ASI के 5 सबसे बड़े दावे
हाई कोर्ट के आदेश के बाद ASI के अतिरिक्त महानिदेशक आलोक त्रिपाठी के नेतृत्व में पुरातत्वविदों और विशेषज्ञों की टीम ने 98 दिनों तक ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (GPR), वैज्ञानिक तकनीकों और खुदाई के जरिए सर्वे किया। 10 वॉल्यूम में पेश की गई 2000 पन्नों की रिपोर्ट के प्रमुख दावे हैं:
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मंदिर शैली के अवशेष: परिसर में परमारकालीन विशाल संरचना होने के स्पष्ट संकेत मिले हैं।
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106 स्तंभों का राज: परिसर में मिले 106 स्तंभ और 82 पिलास्टर पुरानी ‘मंदिर संरचनाओं’ से जुड़े बताए गए हैं। वर्तमान ढांचे में इन्हीं पुरानी संरचनाओं के हिस्सों का उपयोग किया गया।
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खंडित मूर्तियां: सर्वे के दौरान कई मूर्तियों और आकृतियों को क्षतिग्रस्त अवस्था में पाया गया।
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संस्कृत शिलालेख सबसे पुराने: रिपोर्ट में 150 से अधिक संस्कृत और प्राकृत अभिलेखों (कई नागरी लिपि में) का जिक्र है। रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि ये अभिलेख अरबी-फारसी लेखों से काफी पुराने हैं और इनका संबंध परमार शासकों से है।
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जल्दबाजी का निर्माण: रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि बाद की संरचना (मस्जिद) जल्दबाजी में बनाई गई प्रतीत होती है।
लंदन में है मां वाग्देवी की प्रतिमा
इस पूरे विवाद में मां वाग्देवी की प्रतिमा हमेशा केंद्र में रही है। रिकॉर्ड बताते हैं कि 1875 में खुदाई के दौरान यह प्रतिमा मिली थी, जिसे बाद में ब्रिटिश अधिकारी इंग्लैंड ले गए।
हिंदू संगठन लंबे समय से ब्रिटिश म्यूजियम में रखी इस प्रतिमा को वापस भारत लाकर भोजशाला में स्थापित करने की मांग कर रहे हैं।
2003 की व्यवस्था बनी थी ‘विवाद की धुरी’
2003 में प्रशासन द्वारा लागू की गई व्यवस्था के तहत मंगलवार को हिंदू पक्ष को पूजा और शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष को नमाज की अनुमति दी गई थी।
लेकिन जब भी वसंत पंचमी (हिंदुओं का बड़ा त्योहार) और शुक्रवार एक ही दिन पड़ते थे, तो दोनों पक्षों के आमने-सामने आने से भारी तनाव और विवाद की स्थिति बन जाती थी।
अब हाई कोर्ट के फैसले और ASI की रिपोर्ट ने इस 1000 साल पुराने इतिहास के पन्नों को पूरी तरह से साफ कर दिया है।











