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लाल सलाम का अंत: केरल चुनाव के बाद देश में वामपंथ का सफाया

लाल सलाम का ‘पैकअप’: बंगाल और त्रिपुरा के बाद अब केरल भी वामपंथ मुक्त, 1967 के बाद पहली बार देश में कोई कम्युनिस्ट सरकार नहीं

नई दिल्ली/तिरुवनंतपुरम: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

भारतीय राजनीति के इतिहास में साल 2026 एक ऐसे अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है, जब देश के सत्ता-नक्शे से ‘लाल रंग’ पूरी तरह मिट गया है।

1957 में केरल में पहली बार लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई कम्युनिस्ट सरकार से शुरू हुआ सफर, आज उसी केरल में अपनी आखिरी सांसें गिनता नजर आ रहा है।

2026 के केरल विधानसभा चुनाव में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) की हार के साथ ही भारत 1967 के बाद पहली बार कम्युनिस्ट शासन से पूरी तरह मुक्त हो गया है।

बंगाल और त्रिपुरा के बाद अब केरल से भी लाल झंडे की विदाई ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत में ‘लाल सलाम’ का पूरी तरह से पैकअप हो चुका है?

ईएमएस नंबूदरीपाद से शुरू हुआ था सफर

5 अप्रैल 1957 को ईएमएस नंबूदरीपाद ने केरल में दुनिया की पहली ऐसी कम्युनिस्ट सरकार की शपथ ली थी, जो बंदूक के दम पर नहीं बल्कि लोकतंत्र के जरिए सत्ता में आई थी।

इस सरकार ने जमींदारी प्रथा और निजी शिक्षा व्यवस्था पर प्रहार किए, जिसके कारण भारी विरोध हुआ और 1959 में जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल कर इसे बर्खास्त कर दिया था। लेकिन वहां से वामपंथ खत्म नहीं हुआ, बल्कि इसका विस्तार हुआ।

बंगाल का अजेय किला: 34 साल का राज और फिर पतन

वामदलों का सबसे बड़ा गढ़ पश्चिम बंगाल रहा। 1977 में ज्योति बसु के नेतृत्व में लेफ्ट फ्रंट ने जो सत्ता हासिल की, वह लगातार 34 सालों तक कायम रही।

‘ऑपरेशन बर्गा’ के जरिए भूमि सुधार और पंचायती राज ने उन्हें गरीबों का मसीहा बना दिया। लेकिन समय के साथ पार्टी कैडर का अत्यधिक दबदबा और तानाशाही बढ़ने लगी।

2006-07 में सिंगूर और नंदीग्राम में टाटा मोटर्स और केमिकल हब के लिए किसानों की जमीन अधिग्रहण के प्रयास ने वामपंथ की जड़ें खोद दीं।

नंदीग्राम फायरिंग के बाद ममता बनर्जी का उदय हुआ और 2011 में 34 साल पुराना लाल किला हमेशा के लिए ढह गया।

त्रिपुरा में 25 साल का शासन और लेनिन की मूर्ति का गिरना

बंगाल के बाद वामपंथ की उम्मीदें त्रिपुरा पर टिकी थीं, जहां मानिक सरकार के नेतृत्व में पार्टी ने 25 साल (1993-2018) राज किया।

लेकिन 2018 में भाजपा के हाथों मिली करारी हार ने यहां भी उनका सूपड़ा साफ कर दिया। बेलोनिया में लेनिन की मूर्ति का बुलडोजर से गिराया जाना एक युग के अंत का प्रतीक बन गया।

केरल 2026: आखिर क्यों खिसक गई पिनराई विजयन की जमीन?

केरल में हर 5 साल में सत्ता बदलने का रिवाज था, जिसे पिनराई विजयन ने 2021 में तोड़ा था। लेकिन 2026 में उनकी हार ने वामदलों को शून्य पर ला खड़ा किया है। इस हार के पीछे कई बड़े कारण हैं:

  • आर्थिक संकट और कर्ज: केरल की आर्थिक हालत बेहद खराब है। राज्य का कर्ज 4 लाख करोड़ के पार जा चुका है और कमाई का 20% केवल ब्याज चुकाने में जा रहा है।

  • रोजगार का अभाव: अच्छी शिक्षा के बावजूद राज्य में निवेश और नई नौकरियों की कमी के कारण युवाओं का मोहभंग हुआ।

  • भ्रष्टाचार और विवाद: मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की सरकार गोल्ड स्मगलिंग केस और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिर गई।

  • युवाओं से दूरी और बूढ़ा कैडर: वामदलों की सबसे बड़ी ताकत उनका अनुशासित कैडर था। लेकिन आज पार्टी में 50 साल से ऊपर के लोगों का दबदबा है। 1970 के दशक के घिसे-पिटे नारों से आज की इंटरनेट वाली पीढ़ी खुद को जोड़ नहीं पाई।

आज स्थिति यह है कि 1925 में बनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) आज देश के किसी भी राज्य की सत्ता में नहीं है।

‘लाल सलाम’ जो कभी मजदूर, किसान और आम आदमी की क्रांति की आवाज हुआ करता था, आज केवल सोशल मीडिया का एक हैशटैग बनकर रह गया है।

Santosh SETH

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