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दिवाली: खुशियों का पर्व या प्रदूषण का संकट? पर्यावरण बनाम राजनीति का द्वंद्व

प्रकाश का पर्व या सांसों का संकट? दिवाली पर प्रदूषण और उस पर होती ‘सियासत’ के बीच आम आदमी की मजबूरी”

The Politics Again डेस्क (संपादकीय): संतोष सेठ  

त्योहार खुशियां बांटने के लिए होते हैं, सांसों में जहर घोलने के लिए नहीं। दीपावली प्रकाश, प्रसन्नता और उल्लास का पर्व है।

लेकिन यदि इस उत्सव की चमक के पीछे आसमान जहरीले धुएं से भर जाए, बच्चों-बुजुर्गों का दम घुटने लगे और आम आदमी स्वच्छ हवा के लिए तरसने लगे, तो हमें अपनी उत्सव परंपराओं और सामाजिक जिम्मेदारियों पर गहराई से विचार करना होगा।

विडंबना यह है कि आज ‘प्रदूषण’ जैसी जीवन-मरण की समस्या पर भी ‘राजनीति’ का गहरा धुआं छाने लगा है।

जब लोगों की सांसें संकट में हों, तब इस समस्या को धर्म, जाति और राजनीतिक चश्मे से देखना न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि हमारी सामाजिक संवेदनहीनता का प्रमाण भी है।

दीया मिर्जा का वीडियो और राजनीतिक संवेदनहीनता

हाल ही में अभिनेत्री और पर्यावरण कार्यकर्ता दीया मिर्जा ने पटाखों से होने वाले वायु और ध्वनि प्रदूषण के प्रति जागरूकता का एक संदेश दिया।

बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) ने अपने ‘पर्यावरण अनुकूल दीपावली अभियान’ में इस वीडियो को जारी किया, लेकिन दुर्भाग्यवश राजनीतिक विवाद के बाद उसे हटाना पड़ा।

सवाल यह है कि प्रदूषण के खिलाफ आवाज उठाना आखिर विवाद का विषय कैसे बन गया? पर्यावरण संरक्षण के पक्ष में बोलना किसी धर्म या त्योहार का विरोध कैसे हो सकता है?

मुंबई उच्च न्यायालय (Bombay High Court) द्वारा बीएमसी को वीडियो दोबारा जारी करने का निर्देश देना इस बात का प्रमाण है कि जनहित की आवाज को राजनीतिक दबाव के आगे दबाया नहीं जा सकता।

पर्यावरण संरक्षण किसी व्यक्ति, दल या धर्म की जागीर नहीं, बल्कि समूचे समाज की साझा जिम्मेदारी है।

मुंबई और दिल्ली-NCR: धुएं में घुटते महानगर

मुंबई का उदाहरण इस समस्या की गंभीरता को और उजागर करता है। सामान्यतः समुद्री हवाओं के कारण मुंबई को अपेक्षाकृत बेहतर वायु संचार का लाभ मिलता है, लेकिन अब वहां भी संकट गहरा गया है।

बीएमसी की पर्यावरण स्थिति रिपोर्ट 2025-26 के अनुसार, मुंबई के 14 वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्रों में से 13 पर PM-10 का वार्षिक औसत स्तर राष्ट्रीय सीमा (60 माइक्रोग्राम) से अधिक पाया गया।

चेंबूर और बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) में तो यह 125 माइक्रोग्राम तक पहुंच गया। समुद्री हवाओं के भरोसे अब पर्यावरण की रक्षा नहीं की जा सकती।

वहीं, सर्दियों की शुरुआत होते ही दिल्ली-NCR (गाजियाबाद, नोएडा, गुरुग्राम) की स्थिति और भी भयावह हो जाती है।

सुबह की सैर स्वास्थ्य के बजाय जोखिम बन जाती है। बच्चों और बुजुर्गों को अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।

प्रदूषण का पूरा दोष सिर्फ दिवाली पर नहीं

यह समझना भी आवश्यक है कि प्रदूषण का पूरा दोष केवल दीपावली के पटाखों पर डालकर हम अपनी बाकी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो सकते।

निर्माण स्थलों से उड़ती धूल, वाहनों का धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, कचरा जलाना और कमजोर शहरी नियोजन (Urban Planning) इसके सबसे बड़े कारण हैं, जो वर्षभर सक्रिय रहते हैं।

पटाखे तो सिर्फ इस मौसमी समस्या को चरम पर पहुंचा देते हैं। केवल दिवाली के आसपास प्रतिबंध लगाना और शेष वर्ष आंखें मूंद लेना समस्या का वास्तविक समाधान नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश: कागज पर सख्त, सड़कों पर बेअसर

सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली-NCR में केवल प्रमाणित ‘हरित पटाखों’ (Green Crackers) की सीमित बिक्री और निर्धारित समय (रात 8 से 10 बजे) में उनके उपयोग की अस्थायी अनुमति दी है।

लेकिन हरित पटाखों की आड़ में पारंपरिक पटाखों की खुलेआम बिक्री और निर्धारित समय के बाद आतिशबाजी प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खोल देती है। कानून बनाना पर्याप्त नहीं, उसका कठोर क्रियान्वयन भी जरूरी है।

निष्कर्ष: हवा सबकी साझा है, संकट भी सबका है

दीपावली के उत्सव को सीमित पटाखों, सामूहिक आतिशबाजी और पर्यावरण अनुकूल विकल्पों के साथ भी पूरे उल्लास से मनाया जा सकता है।

उत्सव की सार्थकता शोर में नहीं, बल्कि मन की प्रसन्नता और सामाजिक सद्भाव में है। प्रदूषण किसी की जाति, धर्म या राजनीतिक विचारधारा देखकर फेफड़ों में प्रवेश नहीं करता।

हवा सबकी साझा है और उसका संकट भी सबका साझा है। दीपावली के दीप जलें, खुशियां बिखरें, लेकिन किसी की सांसों में अंधेरा न उतरे। प्रकाश का पर्व मनाएं, प्रदूषण का नहीं— यही समय की सबसे बड़ी पुकार है।

दीपावली, प्रदूषण और हमारा पर्यावरण: क्या हैं असली कारण?

प्रदूषण के मुख्य कारण (Causes)

प्रभाव और प्रशासनिक कदम (Impact & Action)

दिवाली के पटाखे

त्योहार पर वायु गुणवत्ता को रातों-रात खतरनाक स्तर पर पहुंचा देते हैं।

वर्षभर के स्थायी कारण

निर्माण स्थलों की धूल, वाहनों का धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन और कचरा जलाना।

मुंबई की खराब हवा

14 में से 13 निगरानी केंद्रों पर PM-10 का स्तर राष्ट्रीय सीमा (60) से दोगुना (125 तक)।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश

केवल प्रमाणित हरित पटाखों (Green Crackers) की अनुमति, समय रात 8 से 10 बजे।

दीया मिर्जा विवाद

BMC द्वारा पर्यावरण जागरूकता वीडियो हटाया गया; हाई कोर्ट ने दोबारा अपलोड करवाया।

नागरिक जिम्मेदारी

शोर और धुएं के बजाय दीपों और सामाजिक सद्भाव के साथ त्योहार मनाएं।

Santosh SETH

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