China Nuclear Labyrinth Desert Base

चीन का परमाणु चक्रव्यूह: रेगिस्तान में बना 3-लेयर का अभेद्य न्यूक्लियर बेस

चीन का ‘परमाणु चक्रव्यूह’: रेगिस्तान में बना रहा 3 लेयर का अभेद्य न्यूक्लियर बेस, अमेरिका के लिए भेदना होगा नामुमकिन”

बीजिंग/वाशिंगटन : द पॉलिटिक्स अगेन  (डिफेंस डेस्क): संतोष सेठ की रिपोर्ट 

दुनिया की नजरों से दूर, चीन अपने उत्तर-पश्चिमी रेगिस्तानी इलाके में एक ऐसा सैन्य और परमाणु ढांचा तैयार कर रहा है, जिसने वैश्विक सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है।

सैटेलाइट से सामने आई नई और बेहद चौंकाने वाली तस्वीरों से खुलासा हुआ है कि चीन ने अमेरिका को घेरने और किसी भी ‘फर्स्ट स्ट्राइक’ (First Strike) को विफल करने के लिए एक अभेद्य “परमाणु चक्रव्यूह” (Nuclear Labyrinth) बिछा दिया है।

अमेरिकी शोधकर्ताओं और रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बीजिंग के परमाणु बलों की सुरक्षा को मजबूत करने का यह प्रयास “पहले कभी नहीं देखा गया”।

यह कोई साधारण निर्माण नहीं है, बल्कि युद्ध की स्थिति में चीन की सबसे बड़ी ताकत बनने जा रहा है।

क्या है चीन का 3-लेयर वाला ‘न्यूक्लियर चक्रव्यूह’?

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, इस रहस्यमई बेस का आकार एक ‘ऑक्टागन’ (Octagon Base) जैसा है, जिसे पूरी तरह से एक बहुस्तरीय सुरक्षा ढांचे के रूप में डिजाइन किया गया है। इसे दुश्मन के हमलों से बचाने के लिए तीन मुख्य परतों (Layers) में बांटा गया है:

  • पहली परत (मुख्य कमान सेंटर): यह बेस का सबसे भीतरी और सुरक्षित हिस्सा है। युद्ध की स्थिति में सभी बड़े फैसले यहीं लिए जाएंगे और यहीं से पूरे मिसाइल नेटवर्क को नियंत्रित किया जाएगा।

  • दूसरी परत (संचालन और लॉजिस्टिक): इस मध्य परत में सैनिकों, सैन्य अधिकारियों और तकनीकी स्टाफ के रहने और काम करने की सुविधाएं मौजूद हैं।

  • इसका उद्देश्य यह है कि भीषण युद्ध के दौरान भी यह बेस लंबे समय तक स्वतंत्र रूप से काम कर सके।

  • तीसरी परत (हथियार और लॉन्चर): यह सबसे बाहरी लेकिन बेहद महत्वपूर्ण परत है। यहां भारी सैन्य वाहनों, ट्रक माउंटेड मिसाइल लॉन्चरों और युद्ध सामग्री को सुरक्षित रखा गया है। अगर दुश्मन किसी एक हिस्से को निशाना बनाता है, तब भी बाकी सिस्टम तुरंत सक्रिय हो जाएगा।

हामी न्यूक्लियर साइलो फील्ड: 80 से ज्यादा कंक्रीट लॉन्च पैड

चीन की हमेशा से यह रणनीति रही है कि वह अपनी सबसे गोपनीय सैन्य परियोजनाओं को सुनसान और दूरदराज के इलाकों में अंजाम देता है, जहां विदेशी निगरानी न के बराबर हो।

  • मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हामी न्यूक्लियर साइलो फील्ड (Hami Nuclear Silo Field) के आसपास बड़े पैमाने पर कंक्रीट के 80 से ज्यादा विशाल लॉन्च पैड बनाए गए हैं।

  • इनका आकार इतना बड़ा है कि यहां मोबाइल मिसाइल लॉन्चर और एयर डिफेंस सिस्टम आसानी से तैनात किए जा सकते हैं।

  • इस पूरे क्षेत्र को बख्तरबंद बंकरों, सुरक्षित हथियार डिपो, एयर स्ट्रिप और रेलवे लाइनों से जोड़ा गया है, ताकि मिसाइलों की तेज आवाजाही सुनिश्चित की जा सके।

अमेरिका का खौफ और चीन की ‘सेकंड स्ट्राइक’ क्षमता

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे भारी-भरकम निर्माण के पीछे चीन की असली चिंता अमेरिका की ‘फर्स्ट स्ट्राइक’ (First Strike) क्षमता है।

चीन को डर है कि युद्ध होने पर अमेरिका उसके परमाणु हथियारों को पहले ही नष्ट कर सकता है। इसी खतरे से बचने के लिए चीन अपनी ‘सेकंड स्ट्राइक’ (Second Strike) क्षमता को अभेद्य बना रहा है।

इसका मतलब है कि दुश्मन का पहला और विनाशकारी हमला झेलने के बाद भी चीन अपनी बची हुई मिसाइलों से पलटवार करने में सक्षम रहेगा।

‘वायन वन’ (Early Warning System) करेगा अलर्ट

इस चक्रव्यूह को और भी खतरनाक बनाता है चीन का अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम। ‘वायन वन’ (Vayan One) नामक सैटेलाइट नेटवर्क दुश्मन की मिसाइल लॉन्च होने के कुछ ही सेकंड बाद उसका पता लगा सकता है।

यह सिस्टम चंद मिनटों में इस अंडरग्राउंड कमांड सेंटर को अलर्ट भेज देगा, जिससे चीन को जवाबी कार्रवाई (Counter Attack) के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा।

पेंटागन की चेतावनी: भले ही चीन आधिकारिक तौर पर ‘नो फर्स्ट यूज़’ (No First Use) नीति का दावा करता हो, लेकिन पश्चिमी देशों को डर है कि ताइवान को लेकर बढ़ते तनाव के बीच यह परमाणु ढांचा एक रणनीतिक दबाव का हथियार बनेगा।

अमेरिकी रक्षा विभाग (Pentagon) पहले ही चेतावनी दे चुका है कि चीन दुनिया में सबसे तेजी से अपना परमाणु शस्त्रागार बढ़ा रहा है और आने वाले कुछ ही सालों में उसके पास 1000 से ज्यादा परमाणु वॉरहेड हो सकते हैं।

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