लखनऊ: निजीकरण के विरोध में 4 संविदाकर्मियों का आत्मदाह का प्रयास
लखनऊ में हाईवोल्टेज ड्रामा: निजी कंपनी में विलय के विरोध में 4 संविदाकर्मियों ने किया आत्मदाह का प्रयास, पुलिस ने ऐन मौके पर बचाया”
लखनऊ: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में सोमवार को उस वक्त भारी हड़कंप मच गया, जब अपनी मांगों की अनदेखी से नाराज होकर रोडवेज (सिटी बस सेवा) के चार संविदाकर्मियों ने बीच सड़क पर आत्मदाह (Self-Immolation) का प्रयास किया।
प्रदर्शनकारी कर्मचारी बोतलों में पेट्रोल लेकर पहुंचे थे और जैसे ही उन्होंने खुद पर पेट्रोल उड़ेलना शुरू किया, वहां मुस्तैद पुलिसकर्मियों ने तत्परता दिखाते हुए उन्हें पकड़ लिया और एक बड़ी अनहोनी को टाल दिया।
इस घटना ने परिवहन विभाग में चल रहे भारी असंतोष और प्रशासनिक लापरवाही की पोल खोलकर रख दी है।
क्या है पूरा विवाद? ‘निजीकरण’ का विरोध
सिटी बस सेवा के चालक-परिचालक लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर लखनऊ के दुबग्गा डिपो (Dubagga Depot) पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।
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निजी कंपनी में विलय: कर्मचारियों का सीधा आरोप है कि परिवहन विभाग द्वारा सभी संविदा चालकों और परिचालकों का जबरन एक निजी कंपनी ‘एसएस इंटरप्राइजेज’ (SS Enterprises) में विलय किया जा रहा है।
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सुनवाई न होने से रोष: कर्मचारियों का कहना है कि उनकी इस गंभीर समस्या को लेकर विभाग का कोई भी बड़ा अधिकारी उनकी बात सुनने को तैयार नहीं है।
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महीनों से चल रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शन का जब कोई नतीजा नहीं निकला, तो हताश होकर उन्होंने यह खौफनाक कदम उठाया।
पेट्रोल उड़ेलते ही पुलिस ने दबोचा
गौतमपल्ली थाना प्रभारी विपिन सिंह ने घटना की जानकारी देते हुए बताया कि आत्मदाह का प्रयास करने वाले चारों कर्मचारी सिटी बस सेवा के संविदा चालक हैं।
पुलिस ने मौके से पेट्रोल की बोतलें जब्त कर ली हैं और चारों कर्मचारियों को हिरासत में लेकर आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है।
हिरासत में लिए गए कर्मचारियों के नाम:
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मुकेश सैनी (निवासी- औरैया)
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ज्ञानेंद्र रावत (निवासी- उन्नाव)
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नितिन श्रीवास्तव (निवासी- कानपुर)
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अभिषेक सिंह (निवासी- गोंडा)
प्रशासनिक रवैये पर उठ रहे सवाल
इस घटना के बाद से अन्य संविदाकर्मियों में भी भारी आक्रोश फैल गया है। राजधानी के वीवीआईपी इलाके के करीब हुए इस आत्मदाह के प्रयास ने सीधे तौर पर पुलिस-प्रशासन की खुफिया विंग और परिवहन विभाग के आला अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बड़ा सवाल यह है कि आखिर कर्मचारियों को इस हद तक मजबूर क्यों होना पड़ा कि उन्हें अपनी जान दांव पर लगानी पड़ी?











