Why Donald Trump wants to buy Greenland?

‘शांतिदूत’ ट्रंप का नया ‘युद्ध’: ग्रीनलैंड के लिए 8 नाटो देशों पर 25% टैरिफ की धमकी, बोले- ‘कंट्रोल नहीं मिला तो खैर नहीं’

“खुद को दुनिया का ‘पीस प्रेसिडेंट’ (शांति दूत) बताने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2026 की शुरुआत में ही वैश्विक कूटनीति में भूचाल ला दिया है”

वाशिंगटन/ब्रूसेल्स | THE POLITICS AGAIN संतोष सेठ की रिपोर्ट 

वेनेजुएला में सेना उतारने और ईरान को धमकाने के बाद अब ट्रंप की नजर दुनिया के सबसे बड़े द्वीप ‘ग्रीनलैंड’ पर टिक गई है।

17 जनवरी 2026 को, जब यूरोप गहरी नींद में था, ट्रंप ने एक ऐसा फरमान जारी किया जिससे वाशिंगटन से लेकर ब्रूसेल्स तक हड़कंप मच गया।

मुद्दा सिर्फ जमीन का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि दुनिया के बदलते नियम और अमेरिका की महात्वाकांक्षा है।

ट्रंप का फरमान: ‘ग्रीनलैंड दो या टैक्स भरो’

डोनाल्ड ट्रंप ने डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, यूके, नीदरलैंड और फिनलैंड—इन आठ यूरोपीय देशों को सीधे निशाने पर लिया है। ट्रंप ने अपने आदेश में साफ कहा है:

“ये देश पता नहीं किस इरादे से ग्रीनलैंड पहुंचे हैं। यह अमेरिका के लिए खतरनाक स्थिति है। जब तक ग्रीनलैंड की पूर्ण खरीद या नियंत्रण के लिए डील नहीं हो जाती, 1 फरवरी से इन देशों पर 10% और 1 जून से 25% टैरिफ लगाया जाएगा।”

यह टैरिफ उन दोस्तों पर लगाया जा रहा है जो पिछले 75 सालों से हर युद्ध में अमेरिका के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे हैं।

जानकारों का मानना है कि यह फैसला ट्रंप के ‘ईगो’ (अहंकार) से जुड़ा है, क्योंकि जब अमेरिका ने ग्रीनलैंड को खरीदने की मंशा जताई थी, तो इन 8 देशों ने डेनमार्क के समर्थन में अपनी सेनाएं वहां भेज दी थीं।

पुतिन की राह पर ट्रंप? दोहरे मापदंड का खेल

वैश्विक राजनीति के जानकारों ने ट्रंप के इस कदम की तुलना रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से की है।

  • जब पुतिन कहते हैं कि “यूक्रेन पर हमारा नियंत्रण हमारी सुरक्षा के लिए जरूरी है क्योंकि नाटो हमारी दहलीज पर है,” तो अमेरिका इसे तानाशाही और लोकतंत्र की हत्या बताता है।

  • लेकिन जब ट्रंप कहते हैं कि “ग्रीनलैंड पर हमारा कब्जा हमारी सुरक्षा के लिए जरूरी है ताकि चीन और रूस वहां न आ जाएं,” तो इसे ‘स्ट्रैटेजी’ और ‘डील’ का नाम दिया जा रहा है।

आखिर ग्रीनलैंड क्यों चाहिए अमेरिका को?

ग्रीनलैंड सिर्फ बर्फ का रेगिस्तान नहीं है, बल्कि भविष्य की अर्थव्यवस्था और युद्ध का केंद्र है।

  1. बर्फ के नीचे अरबों का खजाना: आज की दुनिया तेल से ज्यादा चिप्स और बैटरियों पर चलती है। ग्रीनलैंड की पिघलती बर्फ के नीचे सोना, प्लैटिनम, यूरेनियम और दुर्लभ ‘रेयर अर्थ मिनरल्स’ का विशाल भंडार है। अभी इन मिनरल्स पर चीन का कब्जा है, और अमेरिका भविष्य की इस चाबी को अपने हाथ में लेना चाहता है। बिल गेट्स और पीटर थील जैसे अरबपति वहां खुदाई में पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं।

  2. सामरिक लोकेशन: शीत युद्ध के दौरान ग्रीनलैंड नाटो के लिए सोवियत पनडुब्बियों पर नजर रखने का केंद्र था। अब हाइपरसोनिक मिसाइलों के दौर में, ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए ‘अग्रिम सुरक्षा पंक्ति’ है।

  3. पोलर सिल्क रोड: ग्लोबल वार्मिंग से पिघलती बर्फ ने नए समुद्री रास्ते खोल दिए हैं। यह नया रास्ता एशिया से यूरोप की दूरी को 40% तक कम कर देगा। ग्रीनलैंड इस रास्ते का सबसे अहम चेकपोस्ट होगा।

अमेरिका का सीक्रेट शहर और ‘प्रोजेक्ट आइस वर्म’

ग्रीनलैंड के साथ अमेरिका का पुराना और खतरनाक इतिहास रहा है। 1960 के दशक में अमेरिका ने वहां बर्फ के नीचे ‘प्रोजेक्ट आइस वर्म’ के तहत एक गुप्त शहर बसाया था, जहां 600 परमाणु मिसाइलें तैनात करने की योजना थी।

हालांकि, कुदरत के आगे यह प्रोजेक्ट फेल हो गया। इतना ही नहीं, 1968 में वहां अमेरिका का एक B-52 बॉम्बर क्रैश हुआ था, जिसमें 4 हाइड्रोजन बम लदे थे।

आज ट्रंप कह रहे हैं कि ग्रीनलैंड सुरक्षित नहीं है, जबकि इतिहास गवाह है कि ग्रीनलैंड को सबसे ज्यादा खतरा खुद अमेरिकी प्रयोगों से हुआ है।


ब्यूरो रिपोर्ट, THE POLITICS AGAIN

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