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विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस विशेष: क्या आपकी थाली का भोजन सुरक्षित है?

जब जीवनदायी ‘अन्न’ बन जाए विष: विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस पर एक गंभीर विमर्श “

नई दिल्ली : द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

भारतीय उपनिषदों में एक अत्यंत गूढ़ और पवित्र उद्घोषणा है— “अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्” अर्थात अन्न ही ब्रह्म है।

जिस देश की संस्कृति में अन्न को ईश्वर का दर्जा प्राप्त हो और जहां भोजन ग्रहण करने से पहले उसे प्रणाम करने की परंपरा हो, वहां यह सोचना भी सिहरन पैदा करता है कि वही ‘अन्न’ आज मानव जीवन के लिए सबसे बड़ा मूक हत्यारा बनता जा रहा है।

आज 7 जून है— विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस (World Food Safety Day)। यह दिन केवल कलेंडरों में दर्ज एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि एक वैश्विक चेतावनी है कि अगर हमारी थाली तक पहुंचने वाला भोजन सुरक्षित नहीं है, तो हमारे सारे वैज्ञानिक, आर्थिक और ढांचागत विकास बेमानी हैं।

उपलब्धता बनाम सुरक्षा: भ्रम का आवरण

हम अक्सर ‘खाद्य सुरक्षा’ (Food Security) और ‘खाद्य संरक्षा’ (Food Safety) को एक ही तराजू पर तौलने की भूल करते हैं।

भूख मिटाने के लिए अनाज गोदामों का भरा होना ‘उपलब्धता’ है, लेकिन उस अनाज का कीटनाशकों, मिलावट और फंगस से मुक्त होना ‘सुरक्षा’ है।

हरित क्रांति के बाद भारत ने पेट भरने का इंतजाम तो कर लिया, लेकिन क्या वह भोजन हमारे शरीर को पोषण दे रहा है या धीरे-धीरे बीमारियों के दलदल में धकेल रहा है? यह आज का सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़े डराने वाले हैं। हर साल दुनिया भर में करीब 60 करोड़ लोग—यानी हर 10 में से एक व्यक्ति—दूषित भोजन खाने से बीमार पड़ता है और 4 लाख से ज्यादा लोग अकाल मृत्यु का शिकार हो जाते हैं।

यह किसी महामारी से कम नहीं है, फर्क सिर्फ इतना है कि यह अदृश्य है और इसका वाहक हमारी अपनी रोजमर्रा की थाली है।

‘खेत से थाली तक’ की टूटी हुई कड़ी

भोजन की सुरक्षा केवल रसोई की साफ-सफाई तक सीमित नहीं है। यह ‘फार्म टू फोर्क’ (खेत से थाली तक) की एक लंबी और जटिल यात्रा है।

  • खेतों में जहर: अधिक पैदावार की होड़ में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल हमारी मिट्टी और पानी में जहर घोल रहा है, जो अंततः हमारी रक्त वाहिकाओं तक पहुंचता है।

  • मुनाफे की अंधी दौड़ (मिलावट): दूध में यूरिया, मसालों में कृत्रिम रंग और सब्जियों को रातों-रात पकाने वाले केमिकल का इस्तेमाल केवल आर्थिक अपराध नहीं है; यह जनसंहार की श्रेणी में आने वाला कृत्य है।

  • जब मुनाफाखोरों की तिजोरियां भरने के लिए मासूम बच्चों के स्वास्थ्य को गिरवी रख दिया जाता है, तो यह व्यवस्था के गाल पर एक करारा तमाचा है।

कानूनों की धार और उपभोक्ता की भूमिका

भारत में भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) के रूप में एक मजबूत विधिक ढांचा मौजूद है, लेकिन 140 करोड़ की आबादी वाले देश में केवल कानूनों का होना पर्याप्त नहीं है।

कानूनों का क्रियान्वयन और जमीनी स्तर पर निगरानी (Surveillance) जब तक सख्त नहीं होगी, मिलावटखोरों का हौसला पस्त नहीं होगा।

दूसरी ओर, इस पूरी श्रृंखला में सबसे मजबूत लेकिन सबसे सुप्त कड़ी स्वयं उपभोक्ता है। जब तक उपभोक्ता जागरूक नहीं होगा; जब तक वह लेबल पढ़ना, एक्सपायरी डेट जाँचना और मिलावट के खिलाफ आवाज उठाना नहीं सीखेगा, तब तक कोई भी सरकारी तंत्र उसे पूरी तरह सुरक्षित नहीं कर सकता।

वक्त की मांग: एक सामूहिक संकल्प

आज वैश्वीकरण के दौर में जहां एक देश का अनाज दूसरे महाद्वीप की थाली में सजता है, और जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम की अनिश्चितताएं बढ़ रही हैं, तब खाद्य सुरक्षा एक वैश्विक जिम्मेदारी बन चुकी है। ब्लॉकचेन (Blockchain) और डिजिटल ट्रेसबिलिटी जैसी आधुनिक तकनीकें यह सुनिश्चित करने में कारगर हो सकती हैं कि हम जो खा रहे हैं, वह कहां से और कैसे आया है।

अंततः, विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस हमें यह आत्ममंथन करने के लिए प्रेरित करता है कि हम अपने और अपनी आने वाली पीढ़ियों के शरीर में क्या डाल रहे हैं।

सुरक्षित भोजन कोई विलासिता नहीं, बल्कि एक मौलिक मानवाधिकार है। एक स्वस्थ, सशक्त और समृद्ध राष्ट्र की नींव अस्पतालों की ईंटों से नहीं, बल्कि एक सुरक्षित और पोषणयुक्त थाली से रखी जाती है। वक्त आ गया है कि हम अपनी थाली की गरिमा और सुरक्षा दोनों को वापस लौटाएं।

Santosh SETH

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