संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी: 2030 तक AI की बिजली-पानी की खपत होगी दोगुनी
संयुक्त राष्ट्र की बड़ी चेतावनी: 2030 तक AI की बिजली खपत होगी दोगुनी, पानी और पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा”
न्यूयॉर्क/नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते उपयोग को लेकर संयुक्त राष्ट्र (UN) ने एक बेहद चिंताजनक रिपोर्ट जारी की है।
‘The Politics Again’ की टेक और पर्यावरण डेस्क के अनुसार, इस रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि वर्ष 2030 तक AI की बिजली खपत दोगुनी हो सकती है।
उस समय तक एआई वैश्विक बिजली खपत का लगभग 3 प्रतिशत हिस्सा सोख लेगा और इससे होने वाला ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पूरे ब्रिटेन (UK) के उत्सर्जन के बराबर हो सकता है।
यह रिपोर्ट एआई की तरक्की के पीछे छिपे भारी पर्यावरणीय नुकसान और संसाधनों के दोहन की एक डरावनी तस्वीर पेश करती है।
डेटा केंद्रों को ठंडा रखने के लिए चाहिए 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी
एआई को सुचारू रूप से चलाने वाले विशाल डेटा केंद्रों (Data Centers) को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी की जरूरत होती है।
रिपोर्ट का अनुमान है कि 2030 तक इन केंद्रों को लगभग 9.3 ट्रिलियन (लाख करोड़) लीटर पानी की आवश्यकता होगी।
यह मात्रा दुनिया की पूरी आबादी की वार्षिक पेयजल जरूरतों के बराबर या उससे अधिक हो सकती है।
इसके अलावा, डेटा केंद्रों के विस्तार के लिए मेक्सिको सिटी (Mexico City) के क्षेत्रफल से लगभग 10 गुना अधिक भूमि की जरूरत पड़ेगी।
क्या है एआई का “जेवॉन्स पैरेडॉक्स” (Jevons Paradox) का खतरा?
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने एआई के बढ़ते उपयोग से उत्पन्न होने वाले ‘जेवॉन्स पैरेडॉक्स’ की स्थिति पर गंभीर चिंता जताई है।
इसका अर्थ है कि जब किसी तकनीक की दक्षता (Efficiency) बढ़ती है, तो उसकी लागत कम हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप उसकी कुल मांग और खपत घटने के बजाय कई गुना बढ़ जाती है।
19वीं सदी में अर्थशास्त्री विलियम स्टैनले जेवॉन्स (William Stanley Jevons) ने कोयले के उपयोग में यही प्रभाव देखा था।
इसी तरह, जैसे-जैसे एआई मॉडल सस्ते और सुलभ होंगे, उनके नए उपयोग सामने आएंगे और दक्षता से होने वाली ऊर्जा बचत पूरी तरह समाप्त हो जाएगी।
पर्यावरण को नुकसान: 6.7 अरब पेड़ उगाने की पड़ेगी जरूरत रिपोर्ट के आंकड़े चौंकाने वाले हैं:
वर्ष 2025 में दुनिया भर के डेटा केंद्रों ने लगभग उतनी ही बिजली की खपत की जितनी पूरे सऊदी अरब ने की थी।
यदि 2030 तक इनकी बिजली खपत दोगुनी हो जाती है, तो उससे उत्पन्न कार्बन उत्सर्जन की भरपाई के लिए अगले 10 वर्षों तक 6.7 अरब पेड़ उगाने की आवश्यकता होगी।
डिजिटल असमानता और ई-कचरे (E-Waste) का संकट
एआई की यह दौड़ दुनिया में ‘डिजिटल असमानता’ को भी बढ़ा रही है। वर्तमान में एआई-विशिष्ट क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर केवल 32 देशों में मौजूद है, जिसकी 90 प्रतिशत क्षमता अकेले अमेरिका और चीन के पास है।
एआई सेवाओं का इस्तेमाल करने वाले देशों को खनिजों के अत्यधिक दोहन और इलेक्ट्रॉनिक कचरे (ई-वेस्ट) से जुड़े गंभीर पर्यावरणीय प्रभावों का सामना करना पड़ेगा।
जिम्मेदार AI के लिए संयुक्त राष्ट्र का रोडमैप
इन खतरों से निपटने के लिए रिपोर्ट में एक सख्त रोडमैप सुझाया गया है। इसमें एआई मॉडल और उनके उपयोग से जुड़े पर्यावरणीय प्रभावों की जानकारी नियमित रूप से सार्वजनिक करने की सिफारिश की गई है।
इसके अलावा पारदर्शिता, समानता, वैश्विक सहयोग और खनिजों के स्रोत से लेकर सुरक्षित रीसाइक्लिंग तक पूरी मूल्य श्रृंखला पर जवाबदेही तय करने की मांग की गई है।
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