विचार प्रवाह : भारत को ट्रंप “सॉफ्ट टारगेट” समझने की कर रहे है भूल

“अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत के साथ ट्रेड डील करने और अपनी बात मनवाने के लिए सारे हथकंडे अपना रहे हैं। वह रोज नए-नए शिगुफे के साथ प्रकट हो रहे हैं”

नई दिल्ली 08 / 08 / 2025 संतोष सेठ की रिपोर्ट 

कभी वो भारत को अपना सबसे अच्छा दोस्त बताते हैं, लेकिन अगले ही पल यह आरोप लगाने से नहीं चूकते कि भारत सबसे ज्यादा टैरिफ वसूलने वाला देश है। बीते कुछ दिनों में वे रूस से होने वाले तेल आयत पर र्मोचा खोले हुए हैं।

उनका कहना है कि भारत रूस से तेल आयात कर न सिर्फ मोटा मुनाफा कमा रहा है बल्कि अप्रत्यक्ष तौर पर वह यूक्रेन युद्ध को जारी रखने के लिए रूस की फंडिंग कर रहा है। ट्रंप जिस तरह की की हरकत कर रहे हैं, वो शादी के फूफे की याद दिला जरा है जो बात-बात पर रूठ जाते हैं।

अब आपके मन में यह सवाल होगा कि आखिर हर रोज ट्रंप का स्टैंड क्यों बदल रहे हैं? एक महीने पहले तक चीन पर लाल आंख दिखाने वाले ट्रंप अब ड्रैगन पर नरम रुख क्यों रखे हुए हैं? आइए आपके मन में उठ रहे सभी सवालों के जवाब एक-एक कर देते हैं। 

आखिर चीन पर डोनाल्ड ट्रंप क्यों दिखा रहे नरम रुख?

आपको बता दें कि अमेरिका और चीन-दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। अमेरिका पहले नंबर पर आता है और चीन दूसरे नंबर पर है। अब सवाल उठता है कि डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बनने के बाद चीन को सबसे पहले टारगेट पर लिया था लेकिन अब वो चुप क्यों है? इसकी कई वजह है।

आपको बता दें कि चीन का अमेरिका में करीब 300 अरब डॉलर का ट्रेड सरप्लस है, लेकिन अमेरिका की कई बड़ी कंपनियां जैसे Apple और Tesla, चीन में उत्पादन पर निर्भर हैं। वहीं, चीन अमेरिकी कृषि उत्पादों पर निर्भर है, जिन्हें वह ब्राजील जैसे देशों से भी खरीद सकता है। 

दूसरी ओर, चीन ने अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया में उत्पादन और निर्यात बढ़ाया है। वियतनाम जैसे देशों के जरिए वह व्यापार को दिशा दे रहा है। इसके साथ ही, चीन दुनिया की 90% से ज्यादा rare earth खनिज प्रसंस्करण क्षमता पर नियंत्रण रखता है।

हाल ही में बीजिंग ने कुछ महत्वपूर्ण खनिजों का निर्यात रोक दिया है, जिससे अमेरिका की इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा उत्पादन पर असर पड़ रहा है। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति के तेवर चीन को लेकर नरम हो गए हैं।

इसका असर भी हुआ है। ट्रंप सरकार ने स्मार्टफोन, लैपटॉप और टीवी जैसे उत्पादों को टैरिफ से छूट का ऐलान भी कर चुका है, क्योंकि इन पर टैक्स लगाने से अमेरिकी उपभोक्ता प्रभावित होते और महंगाई बढ़ती।

रूस से ​नाटो देश भी करते हैं निर्यात, फिर उन पर ट्रंप की सख्ती क्यों नहीं?

रूस से पेट्रोलियम प्रोडक्ट और दूसरे सामान के आयात पर जर्मनी, फ्रांस जैसे देशों से ट्रंप भले ही असहमत हैं, लेकिन वे सीधे टकराव से बचना चाहते हैं क्योंकि नाटो की एकता रूस के खिलाफ अमेरिका की विदेश नीति का अहम हिस्सा है। इसलिए वो चीन के अलावा नाटो देशों पर चुप्पी साधे हुए हैं।

आपको बता दें कि यूरोपीय संघ पाइपलाइनों के माध्यम से हंगरी, स्लोवाकिया और चेक गणराज्य को रूसी कच्चा तेल आयात करता है। जापान को 2026 तक रूस से तेल आयात की अनुमति मिली हुई है। 

भारत के साथ अमेरिका का ट्रेड डील अटका हुआ है। इसके पीछे कई कारण है। ट्रंप भारत के कृषि और डेयरी सेक्टर में अपनी पहुंच चाहते हैं। यह भारत सरकार को मंजूर नहीं है क्योंकि भारत की 60% आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है। इसलिए ट्रेड डील पर बात नहीं बन रही है।

इसके अलावा भारतीय अधिकारियों ने संकेत दिया है कि अमेरिका क्षेत्रीय शुल्कों पर बातचीत करने को तैयार नहीं है- जैसे कि इस्पात और ऑटोमोबाइल पर। इसके चलते ट्रंप भारत के साथ ट्रेड डील अपनी मर्जी के अनुसार नहीं कर पा रहे हैं। जानकारों का कहना है कि ट्रंप की रणनीति सिर्फ भारत के साथ सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि एक व्यापक आर्थिक संतुलन बनाने की है। 

उल्लेखनीय है कि भारत का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर अमेरिका है। मई 2025 में भारत का अमेरिका के साथ Trade Surplus तेजी से बढ़ा। पहली बार अमेरिका के साथ भारत का ट्रेड सरप्लस 5 अरब डॉलर के पार पहुंच गया।

इस दौरान भारत से अमेरिका को निर्यात 8.83 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि अमेरिका से आयात घटकर सिर्फ 3.63 अरब डॉलर रह गया। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में और अधिक झुक गया।

ट्रंप की कोशिश इसको कम कर अपनी कंपनियों के लिए भारत का बड़ा बाजार खोलने की है। भारत को ट्रंप “सॉफ्ट टारगेट” समझ रहे हैं। इसलिए वो बार-बार भारत पर सख्त बयान दे रहे हैं। जापान  समेत यूरोपीय देशों के साथ उन्होंने ऐसे ही मनमुताबिक ट्रेड डील की है। वही पैतरा अब वो भारत के साथ अजमा रहे हैं। 

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