असम में माघ बिहू

असम में ‘भोगली बिहू’ का उल्लास: आज ‘उरुका’ की रात सजेगी सामुदायिक दावत, कल मेजी की अग्नि के साथ होगा नववर्ष का स्वागत

“देश भर में जहाँ मकर संक्रांति की धूम है, वहीं पूर्वोत्तर का प्रहरी असम अपनी अनूठी संस्कृति और परंपरा के रंग में रंग चुका है”

गुवाहाटी/मोरीगांव 14 / 01 / 2026 संतोष सेठ की रिपोर्ट 

राज्य में फसल कटाई के उत्सव ‘माघ बिहू’ (जिसे भोगली बिहू भी कहा जाता है) का जश्न शुरू हो चुका है। पंचांग और सूर्य के गोचर की गणना के अनुसार, इस वर्ष मुख्य पर्व 15 जनवरी को मनाया जाएगा, लेकिन उत्सव की शुरुआत आज, यानी 14 जनवरी की रात ‘उरुका’ के साथ हो रही है।

उरुका: वह रात जब पूरा असम एक साथ भोजन करता है

‘द पॉलिटिक्स अगेन’ के असम संवाददाता के अनुसार, आज (14 जनवरी) की शाम ‘उरुका’ के नाम से जानी जाती है। यह मिलन और भोज की रात है।

  • भेलाघर की परंपरा: ग्रामीण क्षेत्रों में कटाई के बाद खाली हुए खेतों में युवाओं ने बांस, पुआल और सूखी पत्तियों से अस्थायी झोपड़ियां बनाई हैं, जिन्हें ‘भेलाघर’ कहा जाता है। आज की पूरी रात लोग इन्हीं भेलाघरों में बिताएंगे, जहाँ अलाव के चारों ओर पारंपरिक गीत गाए जाएंगे और बिहू नृत्य होगा।

  • विशिष्ट भोज: आज की रात असम के हर घर और सामुदायिक केंद्रों में मछली, मांस, नए चावल और स्थानीय सब्जियों के विशिष्ट व्यंजन तैयार किए जा रहे हैं। यह रात भेदभाव भूलकर एक साथ भोजन (Community Feast) करने की है।

15 जनवरी: मेजी प्रज्वलन और प्रार्थना का दिन

ज्योतिषीय गणना के मुताबिक, सूर्य का मकर राशि में प्रवेश आज हो रहा है, इसलिए उदया तिथि के अनुसार बिहू का मुख्य पूजन कल, 15 जनवरी को होगा।

  • मेजी की अग्नि: कल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान के बाद लोग भेलाघरों और विशेष रूप से तैयार की गई ‘मेजी’ (बांस और लकड़ी का ऊंचा ढांचा) में अग्नि प्रज्वलित करेंगे।

  • मान्यता: श्रद्धालु इस पवित्र अग्नि में चावल और तिल अर्पित कर अग्नि देव से प्रार्थना करेंगे। मान्यता है कि मेजी की आग में पुरानी कड़वाहट, आलस्य और शीत ऋतु का कष्ट जलकर भस्म हो जाता है और जीवन में नई ऊर्जा का संचार होता है।

‘भोगली’ यानी खाने-खिलाने का उत्सव

जैसा कि नाम से स्पष्ट है, ‘भोगली बिहू’ का अर्थ है ‘भोग’ या आनंद का बिहू। चूंकि यह समय फसल कटाई के तुरंत बाद का होता है, इसलिए किसानों के घर अन्न से भरे होते हैं। इस अवसर पर असमिया रसोइयों में विशेष पारंपरिक मिठाइयां तैयार की जा रही हैं:

  • पीठा (Pitha): चावल के आटे से बना विशेष केक।

  • लारू (Laru): नारियल और तिल के लड्डू।

  • अन्य: दही, चिरा (पोहा) और गुड़ का नाश्ता इस पर्व की पहचान है।

सामाजिक समरसता का प्रतीक

माघ बिहू केवल एक कृषि पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का एक सशक्त माध्यम है। गुवाहाटी से लेकर सुदूर गांवों तक, लोग जाति और धर्म की दीवारों को तोड़कर एक-दूसरे को बधाई दे रहे हैं। शहरों में रहने वाले लोग अपनी जड़ों से जुड़ने के लिए गांवों का रुख कर रहे हैं।

राजनीतिक गलियारों में भी इस पर्व की हलचल है। राज्य के मुख्यमंत्री और अन्य नेताओं ने जनता को भेलाघर जाकर शुभकामनाएं दी हैं और राज्य की समृद्धि की कामना की है।

"बुलबुल की लड़ाई"

माघ बिहू की अनोखी परंपरा: ‘मोह जूज’ और ‘बुलबुल की लड़ाई’ का रोमांच; आस्था, इतिहास और कानून के बीच अद्भुत संतुलन

असम में माघ बिहू (भोगली बिहू) का उत्साह केवल स्वादिष्ट व्यंजनों और मेजी की आग तक सीमित नहीं है। यह पर्व शौर्य, शक्ति और प्राचीन खेल परंपराओं का भी साक्षी बनता है।

राज्य के ग्रामीण इलाकों में अगले कुछ दिनों तक ‘मोह जूज’ (भैंसों की लड़ाई) और ‘बुलबुल पक्षियों की लड़ाई’ का रोमांच चरम पर होगा। ये खेल अहोम साम्राज्य के दौर से चली आ रही असमिया संस्कृति का अभिन्न अंग हैं।

आहतगुड़ी का ‘मोह जूज’: जब टकराती हैं महाशक्ति

माघ बिहू के दौरान सबसे बड़ा आकर्षण मोरीगांव जिले के आहतगुड़ी में आयोजित होने वाला ‘मोह जूज’ (Buffalo Fight) होता है।

  • परंपरा: यह खेल शक्ति प्रदर्शन का प्रतीक है। इसमें दो विशालकाय भैंसों को एक खुले मैदान में आमने-सामने लाया जाता है, जहाँ वे अपनी सींगों से एक-दूसरे को टक्कर देते हैं।

  • तैयारी: भैंसों के मालिक महीनों पहले से अपने जानवरों को इस दिन के लिए तैयार करते हैं। उन्हें पौष्टिक आहार दिया जाता है और विशेष तेल मालिश की जाती है।

  • माहौल: लाखों की संख्या में दर्शक ढोल और पेपा (पारंपरिक वाद्ययंत्र) की धुन पर भैंसों का उत्साह बढ़ाते हैं। यह नजारा किसी युद्ध के मैदान जैसा होता है।

हाजो का ‘बुलबुल फाइट’: विष्णु मंदिर की पवित्र परंपरा

गुवाहाटी के पास स्थित ऐतिहासिक तीर्थस्थल हाजो के ‘हयग्रीव माधव मंदिर’ में मकर संक्रांति पर बुलबुल पक्षियों की लड़ाई (Bulbuli Sorai Juj) आयोजित की जाती है।

  • धार्मिक महत्व: स्थानीय मान्यता है कि भगवान विष्णु ने एक बार बुलबुल पक्षी का रूप धारण किया था, इसलिए यह खेल भगवान को समर्पित माना जाता है।

  • प्रक्रिया: स्थानीय लोग जंगलों से बुलबुल पक्षियों को पकड़ते हैं। उन्हें एक-दो हफ्ते तक विशेष जड़ी-बूटियां, काली मिर्च और भुना हुआ चावल खिलाया जाता है ताकि वे चुस्त हो सकें। बिहू के दिन उन्हें मंदिर प्रांगण में लड़ाया जाता है।

  • रिहाई: खेल खत्म होने के बाद, विजेता और उपविजेता पक्षियों को सम्मान के साथ वापस जंगल में आजाद कर दिया जाता है।

इतिहास के पन्नों से: अहोम राजाओं का मनोरंजन

इतिहासकार बताते हैं कि इन खेलों को अहोम राजाओं (स्वर्गदेव) का संरक्षण प्राप्त था। 600 साल पुराने अहोम शासनकाल में ‘रंग घर’ (एशिया का सबसे पुराना एम्फीथिएटर) की दो मंजिला इमारत से राजा और रानियां इन खेलों का आनंद लेते थे। उस समय यह सैनिकों के मनोबल को बढ़ाने और युद्ध कौशल को परखने का एक माध्यम था।

विवाद और पुनरुद्धार: कानून की कसौटी पर परंपरा

पिछले एक दशक में इन खेलों ने कई कानूनी उतार-चढ़ाव देखे हैं:

  • प्रतिबंध: पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद कुछ वर्षों तक इन खेलों पर रोक लगा दी गई थी।

  • पुनरुद्धार (Revival): असम सरकार ने जनभावनाओं और सांस्कृतिक विरासत को देखते हुए, हाल के वर्षों में (तमिलनाडु के जल्लीकट्टू की तर्ज पर) कड़े नियमों के साथ इन्हें फिर से शुरू करने की अनुमति दी है।

  • SOP (मानक संचालन प्रक्रिया): 2026 में भी इन आयोजनों पर प्रशासन की पैनी नजर है।

    • पशुओं को नशीला पदार्थ देना सख्त मना है।

    • लड़ाई के दौरान पशुओं को चोट पहुँचाने वाले हथियारों का प्रयोग वर्जित है।

    • वेटनरी डॉक्टर्स की टीम मौके पर मौजूद रहती है।

    • लड़ाई एक निश्चित समय सीमा के अंदर ही होती है और जानवर के थकने पर उसे रोक दिया जाता है।

संस्कृति का संरक्षण

‘द पॉलिटिक्स अगेन’ से बातचीत में स्थानीय आयोजकों का कहना है कि “यह हमारे लिए सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि हमारी पहचान है। हम अपने जानवरों को बच्चों की तरह पालते हैं और खेल के बाद उन्हें सुरक्षित रखते हैं।”

माघ बिहू पर आयोजित होने वाले ये खेल आधुनिकता की दौड़ में भी असम को उसकी जड़ों और इतिहास से मजबूती से जोड़े रखते हैं।

निष्कर्ष

माघ बिहू असम की आत्मा है। यह पर्व सिखाता है कि कड़ी मेहनत (खेती) के बाद जीवन का उत्सव मनाना कितना आवश्यक है। प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और समाज के प्रति प्रेम ही इस त्योहार का मूल संदेश है।

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