एपस्टीन लिस्ट महज गॉसिप नहीं, सिस्टम की नाकामी की कहानी है
“जेफरी एपस्टीन… एक ऐसा नाम जो अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी काली परछाई आज भी दुनिया के सबसे ताकतवर लोगों का पीछा कर रही है”
नई दिल्ली ‘The Politics Again’ संतोष सेठ की रिपोर्ट
हाल ही में अमेरिकी कोर्ट के आदेश पर सार्वजनिक की गई ‘एपस्टीन फाइल्स’ (Epstein Files) ने एक बार फिर वैश्विक स्तर पर भूचाल ला दिया है।
इन दस्तावेजों में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपतियों से लेकर ब्रिटेन के राजघराने और हॉलीवुड के दिग्गजों के नाम शामिल हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या महज नामों का उजागर होना ही न्याय है? या फिर यह रसूखदारों के उस ‘सुरक्षा कवच’ की कहानी है, जिसे भेद पाना कानून के लिए भी मुश्किल रहा?
एपस्टीन फाइल्स का सबसे डरावना पहलू यह नहीं है कि इसमें किन-किन के नाम हैं, बल्कि यह है कि दशकों तक एक व्यक्ति नाबालिग लड़कियों का शोषण करता रहा और दुनिया के सबसे ताकतवर लोग उसकी पार्टियों में शिरकत करते रहे।
बिल क्लिंटन, डोनाल्ड ट्रंप, प्रिंस एंड्रयू और स्टीफन हॉकिंग जैसे नामों का जिक्र (चाहे संदर्भ अलग-अलग हो) यह बताता है कि एपस्टीन की पहुंच कहां तक थी।
यह दस्तावेज इस बात का प्रमाण है कि जब पैसा और पावर मिलता है, तो नैतिकता अक्सर दरवाजे के बाहर छोड़ दी जाती है।
सोशल मीडिया पर चल रही अफवाहों और हकीकत में अंतर समझना जरूरी है। कोर्ट द्वारा जारी दस्तावेज कोई “क्लाइंट लिस्ट” नहीं है, बल्कि गवाही और बयानों का पुलिंदा है।
इसमें शामिल हर व्यक्ति दोषी नहीं है, लेकिन संदेह के घेरे में जरूर है। प्रिंस एंड्रयू पर लगे आरोप और उनका सेटलमेंट करना, या बिल क्लिंटन का एपस्टीन के साथ यात्राएं करना—यह सब कानूनी तौर पर चाहे जो भी साबित हो, लेकिन नैतिक तौर पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।
इस पूरे तमाशे में वर्जीनिया जिफ्रे (Virginia Giuffre) जैसी पीड़ितों की हिम्मत की दाद देनी होगी, जिन्होंने सिस्टम से लड़कर सच को बाहर लाने का काम किया।
लेकिन दुखद यह है कि मुख्य आरोपी (एपस्टीन) ने आत्महत्या कर ली और उसकी साथी घिसलेन मैक्सवेल (Ghislaine Maxwell) के जेल जाने के बाद भी, उस ‘बड़े नेटवर्क’ पर आंच नहीं आई जिसने इस पूरे रैकेट को फलने-फूलने दिया।
क्या उन ‘गुमनाम’ रसूखदारों पर कभी शिकंजा कसा जाएगा जिन्होंने इस शोषण में भागीदारी की?
एपस्टीन फाइल्स का खुलना एक चेतावनी है। यह बताता है कि हमारा समाज और न्याय व्यवस्था ‘एलिट क्लास’ (Elite Class) के लिए कितनी लचर हो सकती है।
इन फाइलों को महज गॉसिप या राजनीतिक कीचड़ उछालने का जरिया नहीं बनना चाहिए। जरूरत इस बात की है कि जिन नामों पर ठोस सबूत या गम्भीर आरोप हैं, उनकी निष्पक्ष जांच हो।
अगर ऐसा नहीं होता है, तो यह दस्तावेज केवल रद्दी का टुकड़ा बनकर रह जाएंगे और न्याय एक अधूरा ख्वाब। – सम्पादकीय डेस्क, The Politics Again
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