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भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय: 1975 के आपातकाल की पूरी कहानी

भारतीय लोकतंत्र का ‘काला अध्याय’: 1975 के आपातकाल (Emergency) की पूरी इनसाइड स्टोरी, जब रातों-रात कैद हो गया था पूरा देश ‘

नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

25-26 जून 1975 की मध्यरात्रि, स्वतंत्र भारत के इतिहास की वह काली रात थी जब देश के नागरिकों से उनके सांस लेने तक की आजादी छीन ली गई थी।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिफारिश पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत देश में ‘आपातकाल’ (Emergency) की घोषणा कर दी थी।

21 मार्च 1977 तक (पूरे 21 महीने) चले इस दौर को भारतीय लोकतंत्र का सबसे विवादास्पद और खौफनाक समय माना जाता है।

‘The Politics Again’ की इस स्पेशल रिपोर्ट में जानिए उस दौर की पूरी कहानी, जो आज भी सिहरन पैदा कर देती है।

रातों-रात नहीं लगा आपातकाल, ये थे मुख्य कारण

आपातकाल की पटकथा रातों-रात नहीं लिखी गई थी, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक अस्थिरता और अदालती फैसलों की एक लंबी श्रृंखला थी:

  • इलाहाबाद हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 12 जून 1975 को न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की जीत को निरस्त कर दिया था। उन पर सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का दोष सिद्ध हुआ था।

  • चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध: अदालत ने इंदिरा गांधी पर 6 साल तक चुनाव लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया और उनके प्रतिद्वंद्वी राजनारायण सिंह को विजयी घोषित किया।

  • दोहरी चोट: उसी दिन गुजरात में कांग्रेस सरकार गिर गई और विपक्षी ‘जनता मोर्चे’ ने भारी जीत दर्ज की।

  • इन झटकों और जनवरी 1975 में पश्चिम बंगाल के सीएम सिद्धार्थ शंकर रे द्वारा तैयार की गई पूर्व-नियोजित रणनीति के तहत आपातकाल थोप दिया गया।

देश और आम जनता पर पड़ा निरंकुशता का असर

अनुच्छेद 352 के तहत असीमित शक्तियों का प्रयोग करते हुए सरकार पूरी तरह से निरंकुश हो गई थी:

  • मौलिक अधिकार खत्म: नागरिकों के बोलने, अभिव्यक्ति और यहां तक कि जीवन जीने के अधिकार छीन लिए गए।

  • विपक्ष सलाखों के पीछे: अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और जयप्रकाश नारायण (JP) जैसे दिग्गजों सहित 1 लाख से अधिक लोगों को ‘मीसा’ (MISA) और ‘डीआईआर’ (DIR) कानूनों के तहत रातों-रात जेलों में ठूंस दिया गया।

  • मीडिया पर लगाम: 25 जून की रात अखबारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई। प्रेस पर इतनी सख्त सेंसरशिप थी कि बिना सरकारी अधिकारी की अनुमति के एक शब्द नहीं छप सकता था।

संजय गांधी का वर्चस्व और ‘नसबंदी’ का खौफ

इस काले दौर में सत्ता की असली चाबी इंदिरा के बेटे संजय गांधी और उनकी तिकड़ी (बंसीलाल, वीसी शुक्ला, ओम मेहता) के हाथों में थी।

संजय गांधी के ‘5-सूत्रीय एजेंडे’ (परिवार नियोजन, दहेज खात्मा, वृक्षारोपण आदि) के तहत देश में खौफ का माहौल था।

परिवार नियोजन के नाम पर पुलिस बलों का प्रयोग कर लगभग 83 लाख लोगों की जबरन नसबंदी कर दी गई।

सुंदरीकरण के नाम पर दिल्ली के ‘तुर्कमान गेट’ इलाके में एक ही दिन में झुग्गियों पर निर्दयता से बुलडोजर चलवा दिया गया।

RK धवन के खुलासों ने चौंकाया

इंदिरा गांधी के तत्कालीन निजी सचिव आरके धवन ने बाद में कई ऐसे खुलासे किए, जो आम धारणाओं से बिल्कुल अलग थे:

  • इंदिरा थीं अनजान: धवन के अनुसार, इंदिरा गांधी जबरन नसबंदी और तुर्कमान गेट पर बुलडोजर चलने जैसी ज्यादतियों से पूरी तरह अनजान थीं।

  • इस्तीफे की पेशकश: इंदिरा इस्तीफा देने के लिए तैयार थीं, लेकिन उनके मंत्रियों ने उन्हें रोक लिया।

  • परिवार का समर्थन: सोनिया, राजीव और मेनका गांधी ने आपातकाल के दौरान संजय गांधी के हर कदम का पूरा समर्थन किया था।

कैसे हुई लोकतंत्र की वापसी?

19 महीनों तक चले इस दमन चक्र और लोगों के भारी गुस्से का एहसास होने के बाद, इंदिरा गांधी ने अचानक 18 जनवरी 1977 को लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा कर दी।

16 मार्च 1977 को हुए चुनावों में जनता ने अपना फैसला सुनाया और कांग्रेस को बुरी तरह नकार दिया। इंदिरा और संजय गांधी दोनों अपनी सीटें हार गए।

अंततः 21 मार्च 1977 को आपातकाल आधिकारिक रूप से हटा लिया गया, लेकिन यह 21 महीने का दौर भारतीय लोकतंत्र को एक ऐसा सबक दे गया, जिसे देश कभी नहीं भूल सकता।

Santosh SETH

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