विचार प्रवाह : आपातकाल के वो काले दिन, जब सत्ता के तांडव से कराह उठी थी जनता

“25 जून को देश आपातकाल की 50 वीं बरसी मनाएगा। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सत्ता के लालच में 25 जून 1975 को देश पर इमरजेंसी थोप दी थी। भारतीय इतिहास में उस दिन को हमेशा काला दिन के रूप में याद किया जाता रहेगा”

नई दिल्ली 25 / 06 / 2025 संतोष सेठ की रिपोर्ट 

अगर 1977 में इंदिरा गांधी दोबारा सत्ता में लौटतीं तो भारत के लोकतंत्र और संविधान के मूल ढांचे पर इसके क्या प्रभाव पड़ते?

कांग्रेस सरकार द्वारा 1975 से 77 तक लगाया गया आपातकाल भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे काला अध्याय है। उस दौर में इंदिरा सरकार ने संविधान की मूल भावना को दरकिनार कर लोकतंत्र के आत्मा, संवैधानिक संस्थाओं, प्रेस की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की निष्पक्षता और नागरिक अधिकारों पर आघात किया। 

आपातकाल का कालखंड भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में कलंक के टीके की तरह है। इस पर काफी चर्चा हुई है। किताबें भी लिखी गई हैं, लेकिन इस पहलू पर उतनी चर्चा नहीं हुई कि आपातकाल लगाने के पीछे इंदिरा गांधी की मंशा क्या थी? अगर 1977 में इंदिरा गांधी दोबारा सत्ता में लौटतीं तो भारत के लोकतंत्र और संविधान के मूल ढांचे पर इसके क्या प्रभाव पड़ते?

आपातकाल के दौरान किया गया 42वां संविधान संशोधन संविधान के मूल आत्मा को बदलने का एक प्रयास था। इसके मूल में एकदलीय प्रणाली को स्थापित करने की मंशा थी। यह एक तरह से संविधान को ही बदलने का प्रयास था। इस संशोधन के माध्यम से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कम किया गया, नागरिक अधिकारों को सीमित किया गया और इंदिरा गांधी ने अपनी सरकार को असाधारण शक्तियां दे दीं।

कांग्रेस के मुखपत्र नेशनल हेराल्ड ने अपने संपादकीय में आपातकाल की हिमायत में लिखा था कि समय आ गया है कि अब देश एकदलीय लोकतंत्र की दिशा में बढ़े। इंदिरा के करीबी सहयोगी बीके नेहरू, जो एक अनुभवी राजनयिक भी थे, ने आपातकाल की सराहना में एक पत्र में लिखा था कि संसदीय लोकतंत्र हमारी जरूरतों का उत्तर देने में सक्षम नहीं है। 

उन्होंने इंदिरा गांधी से आग्रह किया कि अब जब आपके पास दो-तिहाई बहुमत है, तो संविधान में मौलिक परिवर्तन कर डालिए। इसलिए, यह संदेह निराधार नहीं कि यदि इंदिरा गांधी 1977 में सत्ता में वापसी करतीं तो यह प्रक्रिया और तेज होती।

संविधान के मूल ढांचे, जैसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संघीय व्यवस्था, नागरिक अधिकार एवं चुनावों की निष्पक्षता को कमजोर करने के लिए और संशोधन लाए जाते। तब भारत की लोकतांत्रिक पहचान ही खतरे में पड़ जाती।

आपातकाल के समय इंदिरा गांधी ने असहमत विरोधी दलों पर कड़े प्रतिबंध लगाए, सैकड़ों नेताओं को जेल में डाला और अनेक गैर-राजनीतिक संगठनों की आवाज भी दबाई। इसके पीछे उनका इरादा बहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करके देश में एकदलीय प्रणाली को शक्तिशाली बनाने का था। यह अलोकतांत्रिक विचार था। इसके तहत इंदिरा गांधी कांग्रेस को एकमात्र राजनीतिक शक्ति बनाना चाहती थीं।

आपातकाल के वक्त भारत में परिवार आधारित तानाशाही का प्रयोग चल रहा था। 

यदि यह प्रयोग सफल हुआ होता तो देश की निर्णय प्रक्रिया लोकतांत्रिक प्रणाली के बजाय ‘एक दल-एक परिवार’ की व्यक्तिगत इच्छाओं से संचालित होती। आपातकाल में नौकरशाही को कांग्रेस पार्टी के एजेंडे के प्रति वफादार बनाने के सारे प्रयास हुए।

योग्यता और निष्पक्षता को दरकिनार कर केवल वफादारी के आधार पर पदोन्नति दी गई। एक समर्पित नौकरशाही की परिकल्पना भी आपातकाल के दौरान उभरी। यदि 1977 में दोबारा कांग्रेस की सरकार बनती, तो पूरी आशंका थी कि इस नीति को और आक्रामक रूप से लागू किया जाता। 

स्वतंत्र प्रशासनिक संस्थाएं, जैसे संघ लोक सेवा आयोग, कैग, चुनाव आयोग को निष्प्रभावी बनाया जाता और एक ‘कमिटेड ब्यूरोक्रेसी’ तैयार की जाती। कांग्रेस द्वारा समय-समय पर ऐसी कोशिश की जाती रही है, इसलिए इस आशंका को बल मिलता है। देश में लोकतंत्र की आधारशिला रखने वालों ने स्वतंत्र और स्वायत्त न्यायपालिका की व्यवस्था दी थी। उसे भी इंदिरा सरकार ने सरकार के प्रति प्रतिबद्ध बनाने की कोशिश की थी। 

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठता की अनदेखी कर कनिष्ठ जज को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया। जस्टिस एचआर खन्ना जैसे साहसी न्यायाधीशों को दरकिनार कर दिया गया, क्योंकि उन्होंने नागरिक अधिकारों की रक्षा पर जोर दिया था।

यदि इंदिरा सत्ता में कायम रहतीं तो न्यायपालिका पर दबाव और बढ़ता। संवैधानिक समीक्षा की शक्तियों को सीमित किया जाता, न्यायिक नियुक्तियों में सरकार की मनमानी चलती और अदालतें सरकारी एजेंडे को वैध ठहराने का माध्यम बन जातीं।

आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता पर अभूतपूर्व हमला हुआ। व्यापक सेंसरशिप लगाई गई। सरकार विरोधी सामग्री प्रकाशित करने पर प्रतिबंध लगाया गया। कई समाचार पत्रों के मालिकों, संपादकों को दंडित किया गया, क्योंकि उन्होंने आपातकाल की आलोचना की थी। कुछ अखबारों ने अपने संपादकीय खाली छोड़ दिए थे।

यदि 1977 में इंदिरा फिर सत्ता में आतीं, लोकतंत्र की बुनियादें-संवैधानिक व्यवस्था, बहुदलीय प्रणाली, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, प्रेस की आजादी और निष्पक्ष प्रशासन आदि गंभीर रूप से कमजोर हो जाता।

भारत एक परिवार केंद्रित, पार्टी-प्रधान और अधिनायकवादी राज्य में बदल सकता था, पर भारत में लोकतंत्र की जड़ें बहुत मजबूत हैं, इसे देश ने साबित किया। जनता ने लोकतंत्र के खिलाफ इंदिरा गांधी की मंशा को खारिज कर लोकतंत्र के पक्ष में मतदान किया। 

इंदिरा गांधी और आपातकाल के लिए जिम्मेदार कांग्रेस के कई दिग्गज नेता चुनाव हार गए। 1977 का लोकसभा चुनाव नई सरकार चुनने से ज्यादा लोकतंत्र और संविधान को कमजोर करने की मंशा रखने वालों को दंडित करने वाला चुनाव था। लोगों ने आपातकाल के लिए जिम्मेदार लोगों को अपने मतदान के अधिकार की ताकत से दंडित किया और इस तरह कि वह एक मिसाल बना।

जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत और इंदिरा गांधी की पराजय ने न केवल लोकतंत्र की रक्षा की, बल्कि यह भी साबित किया कि भारत की जनता अपनी आजादी और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार है।

1977 का चुनाव भारतीय लोकतांत्रिक चेतना की जीत के नाम रहा। अब जब आपातकाल के 50 साल पूरे हो रहे हैं, तब हमारा लोकतंत्र मजबूती से आगे बढ़ रहा है और अनुच्छेद-356 के दुरुपयोग जैसी प्रवृत्ति खत्म हुई है।

इंदिरा के एक फैसले ने जनता के सारे अधिकार छीन लिए थे। रातों-रात मीडिया पर सेंसरशिप लग गई थी। मीसा कानून के तहत विपक्ष के तमाम नेताओं को जेल में डाल दिया गया, जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर लाल कृष्ण आडवाणी, अरुण जेटली, रविशंकर प्रसाद, नीतीश कुमार और लालू यादव तक शामिल थे। 

इमरजेंसी के दौरान मीसा कानून के तहत तकरीबन एक लाख लोगों को गिरफ्तार करके सलाखों के पीछे रखा गया था। इस कानून का इस कदर दुरुपयोग के कारण ही इसे आजाद भारत का सबसे कुख्यात कानून भी कहा जाता है।

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राजद सुप्रीमो लालू यादव की गिरफ्तारी भी इसी कानून के तहत हुई थी। जेल में उनकी काफी पिटाई की गई थी। लालू खुद कहते हैं कि इस कानून को जिंदगी भर याद रखने के लिए ही उन्होंने अपनी बेटी का नाम मीसा रख दिया था। 

कब बना था मीसा कानून?

मीसा कानून साल 1971 में लागू किया गया था। इस कानून में ऐसे प्रावधान थे कि सरकार बिना वारंट के भी किसी को भी, कभी भी, कही से भी पकड़ कर जेल में डाल सकती थी। यह देश की आन्तरिक सुरक्षा के लिए बनाया गया था, लेकिन इंदिरा गांधी ने इस कानून का इस्तेमाल विपक्ष को समाप्त करने के लिए किया था।

उन्होंने इस कानून में संशोधन करके इसे और ज्यादा घातक बना दिया था। आपातकाल के दौरान इस कानून का इस्तेमाल विरोधी नेतायों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल में डालने के लिए किया गया। आपातकाल में न्यायपालिका के भी अधिकार छीन लिए गए थे और मीसा कानून के तहत पुलिसिया शासन की स्थापन हो गई थी। 

कब हुआ खत्म मीसा?

आपातकाल के बाद साल 1977 में देश में आम चुनाव हुए। इसमें इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी की जबरदस्त हार हुई। इंदिरा गांधी खुद रायबरेली से और उनके छोटे बेटे संजय गांधी अमेठी से चुनाव हार गए थे।

मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी, जो देश की पहली गैर कांग्रेसी सरकार थी। जनता पार्टी की सरकार आते ही सबसे पहले मीसा कानून को समाप्त करने का काम किया गया। इस प्रकार एक क्रूर कानून से देशवासियों को छुटकारा मिला। 

मीसा ने विपक्ष को एकजुट किया

मीसा बंदियों ने जेलों में यातनाएं झेलीं जरूर लेकिन इंदिरा सरकार को सत्ता से बेदखल करने की शुरुआत भी इन्हीं कैदियों ने की। जेपी से लेकर, चंद्रशेखर, वाजपेयी, जॉर्ज फर्नांडिस, लालू यादव, एलके आडवाणी, शरद यादव जैसे नेताओं ने जेल से बाहर आते ही इंदिरा सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया। विपक्षी नेताओं की लड़ाई निर्णायक मुकाम तक पहुंची। मोरारजी देसाई की अगुवाई में जनता पार्टी का गठन हुआ और 1977 में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी। 

आपातकाल के वो काले दिनः ‘बिजली काट दो, मशीन रोक दो, बंडल छीन लो…’, जब इमरजेंसी में घोंट दिया गया था मीडिया का गला

सरकार चाहती नहीं थी कि मीडिया के जरिए तेजी से यह सूचना देश के आम जन तक पहुंचे, ऐसे में मीडिया संस्थानों पर अंकुश लगाना जरूरी था। उस दौर में प्रमुख राष्ट्रीय अखबारों के कार्यालय दिल्ली के जिस बहादुरशाह जफर मार्ग पर थे, वहां की बिजली काट दी गई, ताकि अगले दिन अखबार प्रकाशित न हो सकें।

जो अखबार छप भी गए, उनके बंडल जब्त कर लिए गए। आदेश था बिजली काट दो, मशीन रोक दो, बंडल छीन लो। 26 जून की दोपहर तक प्रेस सेंसरशिप लागू कर अभिव्यक्ति की आजादी को रौंद दिया गया। अखबारों के दफ्तर में अधिकारी बैठा दिए। बिना सेंसर अधिकारी की अनुमति के अखबारों में राजनीतिक समाचार नहीं छापे जा सकते थे। 

जब सूचना एवं प्रसारण मंत्री इंद्र कुमार गुजराल सरकार के मनोनुकूल मीडिया को नियंत्रित नहीं कर पाए तो उन्हें हटाकर विद्याचरण शुक्ल को नया मंत्री बनाया गया। लगभग 250 पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया।

सेंसरशिप के कारण जेपी सहित अन्य कौन-कौन नेता कब गिरफ्तार हुए, उन्हें किन-किन जेलों में रखा गया, ये समाचार छपने नहीं दिए गए।  यह विडंबना थी कि जिन इंदिरा गांधी ने 1975 में प्रेस सेंसरशिप लागू किया, उन्हीं के पति फिरोज गांधी प्रेस की आजादी और विचारों की स्वतंत्रता के लिए लड़ते रहे। 

इमरजेंसी में लोगों को पकड़-पकड़कर नसबंदी की गई। ये फैसला इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी का था। जनसंख्या वृद्धि को लेकर संजय गांधी काफी गंभीर थे।  उनको लगता था कि कंडोम को लेकर जो अभियान चलाया गया था, उसका कोई असर नहीं हो रहा है।

ऐसे में उन्होंने मुख्यमंत्रियों को आदेश दिया कि वह अपने प्रदेश में नसबंदी अभियान को सख्ती से लागू करें। हरियाणा में तो 3 हफ्ते के भीतर ही 60 हजार से ज्यादा लोगों की नसबंदी करवा दी गई।

फिर दूसरे राज्यों पर दबाव पड़ा और फिर तो प्रदेश में अधिकारियों को इसके लिए टारगेट दे दिए गए। कहते हैं कि 50 लाख से ज्यादा लोगों की जबरन नसबंदी कराई गई थी। इसमें 2000 से ज्यादा लोगों की जान तक चली गई थी।  

जब महज डाइनिंग टेबल में हेड की कुर्सी को लेकर संजय गांधी ने नेवी चीफ की बेइज्जती करवाई थी. 

इस घटना को वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने अपनी किताब ‘द जजमेंट: इमरजेंसी की इनसाइड स्टोरी’ में विस्तार में लिखा है।  11 जनवरी 1976 का दिन था, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी तत्कालीन रक्षामंत्री बंसीलाल के साथ नौसेना के एक कायर्क्रम में शामिल होने के लिए बॉम्बे (मुंबई) गए हुए थे।  नौसेना प्रमुख एसएन कोहली ने संजय और बंसीलाल को ठहराने के लिए एक सुइट और एक डबल रूम वाले बंगले का इंतजाम किया। 

तत्कालीन रक्षामंत्री बंसीलाल ने इस पर नौसेना चीफ एसएन कोहली से नाराजगी जताई। कोई अन्य व्यवस्था नहीं हो पाने के चलते बंसीलाल ने सुइट संजय को दे दिया और खुद डबल रूम ले लिया।

असली बखेड़ा रात को डिनर की टेबल पर खड़ा हुआ। नौसेना एसएन कोहली अब भी संजय गांधी का रुतबा समझ नहीं सके और फिर गलती कर बैठे। डिनर की टेबल पर उन्होंने संजय को काफी नीचे नौसेना के अधिकारियों के साथ वाली कुर्सी ऑफर की। 

संजय को हेड की कुर्सी पर नहीं बिठाए जाने पर बंसीलाल फिर से भड़क गए और गाली-गलौज करने लगे। नौसेना के अधिकारियों के सामने ही वह नौसेना प्रमुख को गालियां देने लगे। जूनियर अधिकारियों के सामने कोहली अपना अपमान बर्दाश्त नहीं कर सके और तुरंत अपना इस्तीफा देने की पेशकश कर दी।

बंसी लाल ने ऐसा होने की उम्मीद नहीं की थी। कोहली के इस्तीफा सौंपने से बंसीलाल ने अपने अपने सुर बदल लिए और संजय को अपनी पत्नी की कुर्सी पर बिठाया।  

नीतीश कुमार के सिर पर था इतना इनाम, कनपटी पर बंदूक रखकर लगाई गई थी हथकड़ी

इमरजेंसी के दौरान देश के तमाम बड़े नेताओं के साथ-साथ नीतीश कुमार के सिर पर भी ईनाम रखा गया था। उन्हें जब गिरफ्तार किया गया था, तो गिरफ्तार करने वाले पुलिसवालों को ईनाम की राशि दी गई थी।

इमरजेंसी के दौरान 9 जून 1976 की रात को नीतीश कुमार को गिरफ्तार किया गया था। उन्हें भोजपुर जिले के संदेश थाना के दुबौली गांव से गिरफ्तार किया गया था। उनकी गिरफ्तारी पर 15 पुलिस पदाधिकारियों तथा सिपाहियों को 2750 रुपये का इनाम मिला था। भोजपुर के तत्कालीन डीएम के झा ने अपनी रिपोर्ट में भी नीतीश कुमार की गिरफ्तारी का जिक्र किया है। 

भोजपुर के तत्कालीन डीएम के झा तथा एसपी वाई एन श्रीवास्तव ने अपनी संयुक्त रिपोर्ट (62/75) में उच्चाधिकारियों को पत्र भेजते हुए कहा कि एक गुप्त सूचना मिली है कि पटना और भोजपुर के कुछ आंदोलनकारी दुबौली गांव में एक बैठक करने जा रहे हैं।

नीतीश कुमार की गिरफ्तारी के लिए 20 सिपाहियों को सादे लिबास में भेजा गया था। कहते हैं कि नीतीश कुमार की कनपटी पर बंदूक सटाकर उन्हें हथकड़ी लगाई थी। 2019 में नीतीश कुमार ने खुद इस बात को बताया था। नीतीश कुमार के साथ गिरफ्तार किए गए 19 आंदोलनकारियों में पीरो के गांधी कहे जाने वाले नेता राम एकवाल वारसी भी शामिल थे।