संसद भवन के बाहर सर्वदलीय बैठक

सर्वदलीय बैठक में हंगामा: बागियों पर विपक्ष का वॉकआउट

मानसून सत्र से पहले घमासान: स्पीकर के फैसले पर भड़का विपक्ष, सर्वदलीय बैठक से किया वॉकआउट”

नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

संसद के मॉनसून सत्र के आगाज़ से ठीक पहले बुलाई गई सर्वदलीय बैठक रविवार को भारी हंगामे और राजनीतिक खींचतान की भेंट चढ़ गई।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा तृणमूल कांग्रेस (TMC) और शिवसेना (UBT) के बागी सांसदों को बैठक में आमंत्रित किए जाने के विरोध में ‘इंडिया’ गठबंधन समेत समूचे विपक्ष ने बैठक का सामूहिक बहिष्कार करते हुए वॉकआउट कर दिया।

क्या है विवाद की जड़?

विपक्ष का यह कड़ा ऐतराज लोकसभा स्पीकर के दो प्रमुख फैसलों को लेकर था:

  1. शिवसेना (UBT) के सांसदों का विलय: स्पीकर ओम बिरला ने शिवसेना (UBT) के 6 बागी सांसदों के महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को आधिकारिक मंजूरी दे दी।

  2. TMC के बागी सांसदों को अलग सीट: स्पीकर ने TMC के 20 बागी सांसदों, जो ‘NCPI’ नामक एक गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी में शामिल हुए हैं, के लिए संसद में अलग बैठने की व्यवस्था को भी मंजूरी दी है।

विपक्ष ने उठाए गंभीर सवाल

विपक्षी दलों ने स्पीकर के इन फैसलों को दल-बदल कानून (Anti-Defection Law) का सीधा उल्लंघन बताया है।

  • TMC का ऐतराज: टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इन 20 बागी सांसदों की सदस्यता रद्द करने की याचिकाएं अभी लंबित हैं।

  • उन्होंने कहा, “91वें संविधान संशोधन के बाद अलग गुट बनाने की कोई कानूनी गुंजाइश नहीं है। ऐसे में संसदीय कार्य मंत्री ने इन बागियों को किस आधार पर बैठक का निमंत्रण भेजा?”

  • शिवसेना और AAP का समर्थन: शिवसेना (UBT) के अरविंद सावंत ने पूछा कि बागियों को मान्यता देने का कानून में कौन सा प्रावधान है?

  • वहीं, आम आदमी पार्टी के ND गुप्ता ने इसे “लोकतंत्र का सीधा अपहरण और हत्या” करार दिया।

वॉकआउट करने वाले दलों में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, DMK, JMM, AAP, नेशनल कॉन्फ्रेंस, वामपंथी पार्टियां और शिवसेना (UBT) शामिल थीं।

सरकार का पक्ष: “यह सिर्फ एक सांकेतिक वॉकआउट”

विपक्ष के इस कड़े रुख के बाद केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इसे महज एक “सांकेतिक वॉकआउट” करार दिया।

  • रिजिजू ने स्पष्ट किया कि इसे पूरे दिन की कार्यवाही का बहिष्कार नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि विपक्षी नेता बाद में बैठक में लौट आए थे।

  • उन्होंने कहा कि सरकार संसद में दलों की संख्यात्मक शक्ति के आधार पर चर्चा करती है, लेकिन किसी को उसके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।

  • रिजिजू ने विपक्ष से मॉनसून सत्र को सुचारू रूप से चलने देने की अपील की और आश्वासन दिया कि अगर कामकाज में रुकावट नहीं आती है, तो छोटी पार्टियों सहित सभी को विधेयकों पर बोलने का पूरा मौका दिया जाएगा। उन्होंने जल्दबाजी में बिल पास करने के आरोपों को भी खारिज किया।

यह राजनीतिक तकरार इस बात का स्पष्ट संकेत है कि 20 जुलाई से शुरू होने वाला मॉनसून सत्र काफी हंगामेदार और चुनौतीपूर्ण होने वाला है।