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पेट्रोल-डीजल एक्साइज ड्यूटी में कटौती: सरकार पर 30 हजार करोड़ का बोझ

पेट्रोल-डीजल एक्साइज ड्यूटी में कटौती से सरकारी खजाने पर 30,000 करोड़ का बोझ, ‘ऑयल बॉन्ड’ को लेकर कांग्रेस के दावों की खुली पोल”

नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में चल रहे व्यवधान के बावजूद, केंद्र सरकार ने देश के आम उपभोक्ताओं को महंगाई से बचाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है।

27 मार्च 2026 को पेट्रोल और डीजल पर स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (SAED) में की गई कटौती से चालू वित्त वर्ष में केंद्र सरकार के खजाने पर करीब 30,000 करोड़ रुपये का भारी बोझ पड़ा है।

हालांकि, सरकार ने कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमतों का सीधा असर उपभोक्ताओं पर नहीं पड़ने दिया और यह आर्थिक बोझ खुद वहन किया है।

इस कटौती के बाद पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी घटाकर मात्र 3 रुपये प्रति लीटर कर दी गई है, जबकि डीजल पर एक्साइज ड्यूटी को पूरी तरह शून्य (Zero) कर दिया गया है।

कांग्रेस का तर्क और कीमतों का गणित

पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस लगातार सरकार पर हमलावर है। कांग्रेस का तर्क है कि मई 2014 (जब यूपीए सरकार सत्ता से बाहर हुई थी) में पेट्रोल की कीमत लगभग 71 रुपये प्रति लीटर थी, जबकि आज यह करीब 98 रुपये प्रति लीटर है।

पार्टी इस अंतर को केंद्र सरकार द्वारा की जा रही अत्यधिक टैक्स वसूली का प्रमाण बता रही है।

यूपीए सरकार के ‘ऑयल बॉन्ड’ का क्या है सच?

सरकारी सूत्रों ने कांग्रेस के इन दावों को भ्रामक बताते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी है। सूत्रों के मुताबिक, मई 2014 की कीमत पेट्रोल की वास्तविक आपूर्ति लागत नहीं थी।

वह कीमत उस समय कृत्रिम रूप से कम रखी गई थी, जब यूपीए सरकार ने 2005 से 2010 के बीच सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों को उनके घाटे (मूल्य अंतर) की भरपाई के लिए करीब 1.34 लाख करोड़ रुपये के ‘ऑयल बॉन्ड’ (Oil Bonds) जारी किए थे।

दरअसल, 2014 की वह कीमत देश की अगली पीढ़ी के उपभोक्ताओं पर डाला गया एक ‘स्थगित टैक्स बोझ’ (Deferred Tax Burden) था।

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार यूपीए द्वारा जारी किए गए इन्हीं बॉन्ड्स का कर्ज चुका रही है। आंकड़ों के अनुसार, मौजूदा सरकार ने वित्त वर्ष 2021-22 में करीब 10,000 करोड़ रुपये, 2023-24 में 31,150 करोड़ रुपये, 2024-25 में 52,860 करोड़ रुपये और 2025-26 में 36,913 करोड़ रुपये चुकाए हैं।

इसके अलावा इन बॉन्ड्स पर हजारों करोड़ रुपये का ब्याज भी करदाताओं के पैसे से भरा गया है।

भविष्य पर बोझ नहीं, पारदर्शी है मौजूदा सरकार की नीति

सूत्रों का स्पष्ट कहना है कि जिस 2014 की कीमत का उदाहरण कांग्रेस आज दे रही है, उसका भारी-भरकम भुगतान मौजूदा सरकार पिछले कई वर्षों से कर रही है।

वहीं, मौजूदा सरकार ने कच्चे तेल की कीमतों के झटके को संभालने के लिए पारदर्शी तरीका अपनाया।

जब 2022 और फिर 2026 में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं, तो केंद्र सरकार ने सीधे पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी घटा दी।

यह कटौती सीधे तौर पर बजट के भीतर की गई, जिसका असर 24 घंटे के भीतर देशभर के पेट्रोल पंपों पर दिखाई दिया।

सरकार ने राजस्व में आई कमी को स्वीकार किया, लेकिन कोई नया ‘ऑयल बॉन्ड’ जारी करके भविष्य के करदाताओं पर कोई अतिरिक्त या छिपा हुआ आर्थिक बोझ नहीं डाला।

Santosh SETH

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