लाल किला जनजातीय समागम: धर्मांतरितो को ST से बाहर करने की उठी मांग
लाल किले से जनजातीय समाज की महाहुंकार : संस्कृति और धर्मरक्षा के लिए ‘महाकुंभ’, धर्मांतरित लोगों को ST सूची से बाहर करने (Delist) की उठी मांग”
नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
देश की राजधानी दिल्ली का ऐतिहासिक लाल किला सोमवार को एक अभूतपूर्व और युगांतकारी दृश्य का गवाह बना।
भारतवर्ष के कोने-कोने से आए लाखों जनजातीय समाज के लोगों ने अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए एक सुर में महाहुंकार भरी, जिसकी अनुगूंज आने वाले कई वर्षों तक कायम रहेगी।
अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के सहयोग से ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ के तत्वावधान में आयोजित इस विशाल समागम को जनजातीय समाज का ‘महाकुंभ’ कहा जा रहा है, जिसमें देश के इतिहास में पहली बार धर्मरक्षा और संस्कृतिरक्षा को लेकर इतनी प्रखर आवाज उठाई गई है।
बिरसा मुंडा के ‘उलगुलान’ के बाद का सबसे बड़ा सांस्कृतिक समागम: अमित शाह
इस महाधिवेशन में सबसे प्रभावशाली और विचारोत्तेजक संबोधन देश के गृहमंत्री अमित शाह का रहा।
उन्होंने निर्भीक स्पष्टता के साथ भारतीय जनजातीय समाज की धर्मरक्षा और संस्कृतिरक्षा की बात की, जिसने लाखों जनजातीय बंधुओं और बहनों में साहस का संचार कर दिया।
गृहमंत्री शाह ने अपने भावुक और ऐतिहासिक शब्दों में कहा,
“भगवान बिरसा मुंडा को तो मैंने साक्षात नहीं देखा, लेकिन आज यहाँ जो जनजातीय समाज का महासागर उमड़ पड़ा है, मैं उन सब में भगवान बिरसा मुंडा के ही दर्शन कर रहा हूँ।”
उन्होंने आगे कहा कि यह जनजातीय सांस्कृतिक समागम, भगवान बिरसा मुंडा के ‘उलगुलान’ (परिवर्तन हेतु ऐतिहासिक जन क्रांति) के बाद का पहला और सबसे बड़ा समागम है।
समागम की मुख्य मांग: ‘जो धर्मांतरित हुआ, उसे ST सूची से बाहर करो‘
इस ऐतिहासिक समागम के केंद्र में ‘डीलिस्टिंग’ (Delisting) की मांग सबसे प्रमुखता से उठी।
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मूल पहचान की रक्षा: समागम में सर्वसम्मति से यह मांग की गई कि जो भी व्यक्ति अपने मूल जनजातीय समाज, धर्म और परंपराओं को छोड़कर ईसाई या अन्य धर्मों में धर्मांतरित (Convert) हो जाता है, उसे अनुसूचित जनजाति (Schedule Tribe – ST) की सूची से तुरंत बाहर निकाला जाना चाहिए।
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अधिकारों का संरक्षण: वक्ताओं ने कहा कि धर्मांतरण करने वाला व्यक्ति अपनी मूल जनजातीय पहचान खो देता है, इसलिए जनजातियों को मिलने वाले आरक्षण और अन्य संवैधानिक लाभ केवल अपनी मूल संस्कृति को बचाए रखने वाले वास्तविक जनजातीय भाई-बहनों को ही मिलने चाहिए।
अरुणाचल को ‘क्रिश्चियन लैंड’ बनाने की धमकियों का पुरजोर विरोध
पद्मश्री से अलंकृत और अरुणाचल प्रदेश के प्रसिद्ध वैचारिक अग्रणी वरिष्ठ इंजीनियर तेचि गुबिन ने मंच से बेहद गंभीर मुद्दा उठाया।
उन्होंने बताया कि ‘अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम’ के नेताओं ने खुलेआम सोशल मीडिया पर पूरे अरुणाचल को ‘ईसाई लैंड’ (Christian Land) बनाने की धमकी दी है।
गुबिन ने भारत सरकार से जनजातीय धर्म की रक्षा की गुहार लगाते हुए कहा कि समाज छोड़कर ईसाई बनने वालों को तत्काल प्रभाव से डीलिस्ट किया जाए।
वहीं, प्रसिद्ध जनजातीय नेता और राजनीति के धुरंधर गणेश राम भगत ने पूरे जनसमूह में जोश भरते हुए कहा,
“हमारे रक्त में भगवान राम का रक्त है, हम भगवान राम के वंशज हैं। प्रभु राम के लिए हमने रावण के साम्राज्य को परास्त किया था। हम इस धर्मांतरण (Conversion) के राक्षस से भी लड़ेंगे और इसे पूरी तरह समाप्त करेंगे।”
कश्मीर से अंडमान और जैसलमेर से तवांग तक उमड़ा जनसैलाब
इस महाकुंभ में भारत के सुदूर क्षेत्रों से 700 से अधिक जनजातियों के लोग शामिल होने पहुंचे। इनमें जैसलमेर के मरुस्थल से लेकर लद्दाख की वादियों, अरुणाचल प्रदेश के तवांग, सिक्किम, असम, त्रिपुरा, अंडमान निकोबार, पश्चिम बंगाल, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, तेलंगाना, केरल, झारखंड और छत्तीसगढ़ के वनवासी अंचल शामिल थे।
दिल्ली के नागरिकों ने पेश की मिसाल
दिल्ली के सद्भावी नागरिकों और राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं ने इस समागम के लिए अपने घरों के दरवाजे खोल दिए।
हजारों जनजातीय भाई-बहनों को दिल्ली के स्थानीय परिवारों के घरों में रुकवाया गया, उनकी निस्वार्थ सेवा की गई, और उन्हें स्टेशनों से लाने और छोड़ने तक की व्यवस्था की गई।
दिल्ली के इस आतिथ्य ने साबित कर दिया कि देश की राजधानी का हृदय कितना विशाल है।
पूर्वोत्तर की बहनों ने गाया ‘वंदे भारतम’, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की दिखी झलक
समारोह के दौरान मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और असम की जनजातीय बहनों ने बेहद सुरीली और देशभक्ति से ओतप्रोत आवाज में ‘वंदे भारतम’ गीत की प्रस्तुति दी, जिसे सुनकर लाल किले पर मौजूद हर नागरिक मंत्रमुग्ध और चकित रह गया।
अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम (जो विश्व का सबसे बड़ा गैर-ईसाई जनजातीय संगठन है और देशभर में 17,000 से अधिक छात्रावास, आरोग्य केंद्र व स्कूल चलाता है) के इस सफल आयोजन ने जनजातीय समाज को एक नई शक्ति, भक्ति और तत्त्वचिंतन दिया है।
इस समागम की गूंज और इसके सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव के कारण आने वाले समय में भारत सरकार को धर्मांतरित जनजातीय लोगों को डीलिस्ट करने के कानून पर गंभीरता से विचार करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।











