प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संस्कृत सुभाषितम् साझा करते हुए इस बात पर जोर दिया कि मानव जीवन की वास्तविक सार्थकता अपनी क्षमता, धन, बुद्धि और वाणी से दूसरों की भलाई करने में है।
परोपकार ही जीवन की सार्थकता: पीएम मोदी ने संस्कृत ‘सुभाषितम्’ के जरिए दिया मानव कल्याण का महामंत्र”
नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : श्रीमती शिल्पा की रिपोर्ट
भारतीय संस्कृति में ‘सेवा परमो धर्म:’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना सदियों से रची-बसी है। इसी महान परम्परा को याद करते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने बुधवार (19 अगस्त 2026) को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (X) पर एक अत्यंत प्रेरक संस्कृत ‘सुभाषितम्’ साझा किया।
इस श्लोक के माध्यम से प्रधानमंत्री ने देशवासियों और सम्पूर्ण मानव जाति को यह संदेश दिया है कि मानव जीवन की वास्तविक सफलता केवल स्वयं के लिए जीने में नहीं, बल्कि दूसरों के कल्याण (परोपकार) के लिए निरंतर कार्य करने में है।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने आधिकारिक एक्स हैंडल पर प्राचीन भारतीय ज्ञान को दर्शाते हुए यह श्लोक पोस्ट किया:
“एतावज्जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु। प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेय एवाचरेत्सदा॥”
इस सुभाषितम् का शाब्दिक और आध्यात्मिक तात्पर्य यह है कि इस नश्वर दुनिया में मानव जीवन की मूल भावना अन्य प्राणियों के प्रति निरंतर परोपकारी और कल्याण-उन्मुख कार्य करने में निहित है। श्लोक में सेवा और परोपकार के चार मुख्य माध्यमों (स्तंभों) का स्पष्ट उल्लेख किया गया है:
प्राण (शारीरिक क्षमता): अपने शरीर और श्रम का उपयोग दूसरों की भलाई और सहायता के लिए करना।
अर्थ (धन/संसाधन): अपनी अर्जित संपत्ति और संसाधनों से जरूरतमंदों की मदद करना।
धी (बुद्धि/ज्ञान): अपने विवेक, ज्ञान और बौद्धिक क्षमता का प्रयोग समाज की समस्याओं को सुलझाने और मार्गदर्शन के लिए करना।
वाक् (वाणी): अपने शब्दों और विचारों से दूसरों को सांत्वना, प्रेरणा और सम्मान देना; कभी किसी का दिल न दुखाना।
प्रधानमंत्री मोदी अक्सर अपने भाषणों और सार्वजनिक संवादों में प्राचीन भारतीय ग्रंथों और संस्कृत श्लोकों का संदर्भ देते रहे हैं।
इस सुभाषितम् को साझा करना केवल एक सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं है, बल्कि यह सरकार के ‘सबका साथ, सबका विकास’ और ‘सेवा’ के मूल मंत्र का आध्यात्मिक और दार्शनिक आधार भी स्पष्ट करता है।
आधुनिक युग की भागदौड़ और स्वार्थपूर्ण जीवनशैली के बीच, यह संदेश एक रिमाइंडर है कि हम अपनी शारीरिक क्षमता, धन, बुद्धि या मीठी वाणी—जो भी हमारे पास उपलब्ध है—उसके जरिए समाज को कुछ वापस देने का प्रयास करें।
कुल मिलाकर, पीएम मोदी द्वारा साझा किया गया यह सुभाषितम् भारतीय जीवन दर्शन का वह सार है, जो एक सशक्त, संवेदनशील और परोपकारी समाज के निर्माण के लिए आज के समय में सबसे अधिक प्रासंगिक है।
बिहार MLC चुनाव: 8 सीटों पर महामुकाबले की मतगणना शुरू, दांव पर 150 उम्मीदवारों की…
गुवाहाटी में खौफनाक वारदात: 'होटल बिलास इन' में लीज विवाद को लेकर अंधाधुंध फायरिंग, 5…
चुनाव आयोग का सुप्रीम कोर्ट में जवाब: CEC के 'एकतरफा फैसले' के आरोपों को नकारा,…
जौनपुर में अवैध सूदखोरों की खैर नहीं: 24 घंटे में मिलीं 4 शिकायतें, SP डॉ.…
UP BJP का 'मिशन 2027': 712 सदस्यों वाली प्रदेश कार्यसमिति का ऐलान; 7 मुस्लिम चेहरों…
यूपी विधान परिषद चुनाव: 11 सीटों पर महामुकाबले के नतीजे आज, 7 जिलों में कड़ी…