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भारत का सुपरफूड मखाना: उत्पादन, निर्यात, फायदे और राष्ट्रीय मखाना बोर्ड

भारत का ‘सुपरफूड’ मखाना: बिहार के तालाबों से लेकर ग्लोबल मार्केट तक का शानदार सफर”

नई दिल्ली/पटना: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट

एक समय में केवल बिहार और मिथिलांचल के पारंपरिक आयोजनों तक सीमित रहने वाला मखाना (Fox Nut / Euryale ferox) आज भारत का सबसे तेजी से उभरता हुआ ‘सुपरफूड’ बन गया है।

स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती वैश्विक जागरूकता, इसके बेहतरीन पोषण प्रोफाइल और भारत सरकार की रणनीतिक नीतियों ने मखाने को एक प्रीमियम ग्लोबल स्नैक के रूप में स्थापित कर दिया है।

हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा ‘राष्ट्रीय मखाना बोर्ड’ की स्थापना और 476 करोड़ रुपये की केंद्रीय क्षेत्र योजना की मंजूरी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि मखाना अब भारतीय कृषि-अर्थव्यवस्था का एक अहम स्तंभ बनने जा रहा है।

उत्पादन: भारत का एकाधिकार और बिहार का दबदबा

मखाना उत्पादन में भारत पूरी दुनिया में निर्विवाद रूप से अग्रणी है। वैश्विक आपूर्ति में भारत की हिस्सेदारी 80 से 85 प्रतिशत है, और भारत के कुल उत्पादन का लगभग 75 प्रतिशत (तीन-चौथाई) अकेले बिहार से आता है।

कोसी बेसिन (सुपौल, सहरसा, मधेपुरा), मिथिला और सीमांचल क्षेत्र मखाना उत्पादन के मुख्य केंद्र हैं।

स्वर्ण वैदेही और सबौर मखाना-1 जैसी उन्नत बीजों और फील्ड-सिस्टम जैसी आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल से उत्पादकता में भारी उछाल आया है:

वित्तीय वर्ष

कुल मखाना उत्पादन (MT)

औसत उत्पादकता (MT/हेक्टेयर)

बिहार का उत्पादन (MT)

2024–25

63,910

2.03

–

2025–26 (अनुमानित)

80,590

2.34

60,000

 

बाजार की गतिशीलता: बढ़ती कीमतें और 12,000 करोड़ का लक्ष्य

मखाना का घरेलू बाजार 17-18 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ रहा है। 2029-30 तक इसके 11,000 से 12,000 करोड़ रुपये के उद्योग में तब्दील होने का अनुमान है।

  • कीमतों में भारी उछाल: प्रीमियम ब्रांडिंग और सीमित आपूर्ति वृद्धि के कारण 2020-22 में जो मखाना ₹500/किलो बिकता था, वह 2025 में औसतन ₹1,250/किलो तक पहुंच गया है।

  • घरेलू खपत: भारत में हर महीने 3,000-3,500 मीट्रिक टन पॉप्ड मखाने की खपत होती है, जो त्योहारी सीजन में 5,000 मीट्रिक टन तक पहुंच जाती है।

निर्यात का सफर: नए HSN कोड से मिली वैश्विक पहचान

साल 2025 में विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) द्वारा मखाने के लिए एक अलग HSN कोड जारी किए जाने से इसके निर्यात को नई दिशा मिली है।

वर्ष 2025–26 में भारत ने ₹192.96 करोड़ मूल्य का 7,264.89 मीट्रिक टन मखाना निर्यात किया।

निर्यात रणनीति में बदलाव की जरूरत

वर्तमान में भारत का 77% निर्यात अमेरिका, कनाडा और यूएई को होता है, जहाँ प्रति इकाई मूल्य ($13.3 – $19.5/किलो) कम मिलता है।

इसके विपरीत, जर्मनी ($26.0/किलो) और ऑस्ट्रेलिया ($21.0/किलो) जैसे छोटे बाजारों में मखाने को ज्यादा प्रीमियम कीमत मिलती है। मुनाफा बढ़ाने के लिए निर्यात बाजारों में विविधता लाना अब सबसे जरूरी है।

सरकारी प्रोत्साहन और NRCM की भूमिका

मखाना क्षेत्र को मजबूत करने के लिए सरकार ने कई ऐतिहासिक कदम उठाए हैं:

  1. राष्ट्रीय मखाना बोर्ड: 15 सितंबर 2025 को बिहार में इसका औपचारिक शुभारंभ किया गया, जो सप्लाई चेन को आधुनिक बनाने का काम करेगा।

  2. 476.03 करोड़ रुपये की योजना: वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक के लिए स्वीकृत इस योजना के तहत बीज की गुणवत्ता, ब्रांडिंग और निर्यात संवर्धन पर जोर दिया जा रहा है।

  3. मशीनीकरण (NRCM का योगदान): राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र (NRCM) ने कटाई से लेकर प्रसंस्करण तक की चुनौतियां कम करने के लिए बीज वॉशर, रोस्टिंग मशीन और पॉप्ड मखाना ग्रेडर जैसे उपकरण विकसित कर निर्माताओं को लाइसेंस दिए हैं।

सुपरफूड क्यों है मखाना?

यह अखरोट और बादाम जैसे महंगे मेवों को कड़ी टक्कर दे रहा है। मखाने में फैट मात्र 0.33 ग्राम (प्रति 100 ग्राम) होता है।

इसकी 95 प्रतिशत प्रोटीन पाचन क्षमता, कम ग्लाइसेमिक लोड (मधुमेह रोगियों के लिए उपयुक्त), और आवश्यक अमीनो एसिड इसे एक बेहतरीन ‘क्लीन-लेबल’ और ‘प्लांट-बेस्ड’ सुपरफूड बनाते हैं।

पारंपरिक खेती के तरीकों को पीछे छोड़ते हुए, मखाना अब किसानों की आय दोगुनी करने, ग्रामीण रोजगार पैदा करने और भारत के कृषि निर्यात को एक नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए पूरी तरह तैयार है।

Santosh SETH

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