“राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शनिवार को कान्हा की नगरी वृंदावन में हिंदू एकता का पुरजोर समर्थन किया”
विशेष ब्यूरो, मथुरा-वृंदावन | 11 जनवरी, 2026
‘The Politics Again’ की रिपोर्ट के अनुसार, ‘सनातन संस्कृति महोत्सव’ को संबोधित करते हुए भागवत ने स्पष्ट किया कि जाति, भाषा और संप्रदाय की दीवारें बाहरी दुनिया के लिए हो सकती हैं, लेकिन अंतर्निहित रूप से पूरा हिंदू समाज एक सूत्र में बंधा है।
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में सामाजिक समरसता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा:
“दुनिया हिंदू समुदाय को जाति, धर्म, संप्रदाय और भाषा के आधार पर विभाजित देख सकती है, लेकिन हम सभी एक हैं। हमारे बीच किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए। हम साथ खाते-पीते हैं, एक-दूसरे के सुख-दुख में खड़े रहते हैं, यही हमारी वास्तविक पहचान है।”
भागवत ने यह भी साझा किया कि उनके व्यक्तिगत जीवन में हर प्रकार के ‘वर्ग’ और ‘भाषा’ के मित्र हैं, जो यह दर्शाता है कि संघ का लक्ष्य समाज के अंतिम व्यक्ति तक जुड़ाव बनाना है।
संघ के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में देशभर में आयोजित हो रहे ‘हिंदू सम्मेलनों’ पर बोलते हुए भागवत ने एक गंभीर संदेश दिया। उन्होंने रायपुर और मथुरा के कार्यक्रमों का संदर्भ देते हुए कहा:
वीरता बनाम जिम्मेदारी: यह 100 वर्ष का उत्सव कोई ‘वीरता’ दिखाने का कार्य या ‘शक्ति प्रदर्शन’ नहीं है। बल्कि, यह आत्म-अवलोकन और समाज के प्रति अपनी ‘जिम्मेदारी’ को समझने का क्षण है।
स्थापना का त्याग: उन्होंने संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को याद करते हुए कहा कि उन्होंने अपने रक्त और अथक परिश्रम से इस संगठन को सींचा है, जिसे आज 100 वर्ष पूरे हो रहे हैं।
इससे पूर्व, 1 जनवरी को रायपुर के श्री राम मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ भागवत ने इस शताब्दी वर्ष के संकल्पों की शुरुआत की थी। वृंदावन के इस महोत्सव में उन्होंने संतों की उपस्थिति में कहा कि हिंदू समाज का एक होना केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के कल्याण के लिए आवश्यक है।
मोहन भागवत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश के विभिन्न हिस्सों में ‘जाति जनगणना’ और ‘विभाजनकारी राजनीति’ की चर्चा तेज है। संघ प्रमुख का ‘भेदभाव मुक्त हिंदू समाज’ का नारा सीधे तौर पर उन राजनीतिक प्रयासों का जवाब है जो समाज को खंडित करने की कोशिश करते हैं। 100वें वर्ष में संघ का ध्यान ‘आक्रामक शक्ति’ के बजाय ‘व्यापक सामाजिक स्वीकृति’ पर अधिक केंद्रित दिख रहा है।
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