अंतर्राष्ट्रीय गुमशुदा बाल दिवस: बच्चों की सुरक्षा, इतिहास और इसका महत्व
अंतर्राष्ट्रीय गुमशुदा बाल दिवस: बच्चों की सुरक्षा के प्रति समाज को जगाने का दिन, जानें इतिहास और महत्व”
नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
हर साल 25 मई को दुनियाभर में ‘अंतर्राष्ट्रीय गुमशुदा बाल दिवस’ (International Missing Children’s Day) मनाया जाता है।
यह दिन केवल उन मासूमों को याद करने का अवसर नहीं है जो किसी कारणवश अपने परिवार से बिछड़ गए हैं, बल्कि यह समाज, प्रशासन और परिवारों को बच्चों की सुरक्षा के प्रति अधिक जिम्मेदार और सतर्क बनने का एक कड़ा संदेश भी देता है।
आधुनिक दौर में इंटरनेट, तेजी से होते शहरीकरण और बढ़ती सामाजिक चुनौतियों के बीच बच्चों के गुम होने की घटनाएं लगातार एक गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही हैं।
इस दिवस का मुख्य उद्देश्य गुमशुदा बच्चों की तलाश तेज करना, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना और बच्चों से जुड़े अपराधों के प्रति समाज में व्यापक जागरूकता फैलाना है।
कैसे शुरू हुआ यह अंतर्राष्ट्रीय अभियान?
इस विशेष दिवस की शुरुआत अमेरिका से हुई थी। 25 मई 1979 को न्यूयॉर्क शहर से छह वर्षीय इटन पैट्ज नाम का बच्चा अचानक लापता हो गया था।
परिवार और पुलिस की लंबी जद्दोजहद के बावजूद उसका कोई पता नहीं चल सका। इस दर्दनाक घटना ने पूरे अमेरिका को झकझोर कर रख दिया और राष्ट्रीय स्तर पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ गई।
इसके बाद वर्ष 1983 में अमेरिकी सरकार ने 25 मई को ‘नेशनल मिसिंग चिल्ड्रन्स डे’ घोषित किया। धीरे-धीरे इस अभियान की गूंज अन्य देशों तक पहुंची और इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल गई।
भारत और दुनिया में बढ़ती चिंता
आज दुनियाभर में हर साल हजारों बच्चे लापता हो रहे हैं, जिनमें से कई मानव तस्करी, बाल मजदूरी, अपहरण और घरेलू हिंसा का शिकार बनते हैं।
भारत में भी स्थिति चिंताजनक है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, हर वर्ष बड़ी संख्या में बच्चों के लापता होने के मामले दर्ज किए जाते हैं।
हालांकि पुलिस और सामाजिक संगठनों की मदद से कई बच्चे सुरक्षित घर लौट आते हैं, लेकिन मानव तस्करी और बाल श्रम जैसे संगठित अपराध आज भी एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
भीड़भाड़ वाले इलाकों, रेलवे स्टेशनों और मेलों में बच्चों का बिछड़ना आम है, वहीं पारिवारिक विवाद, मानसिक तनाव और ऑनलाइन धोखाधड़ी के कारण भी बच्चे घर छोड़ रहे हैं।
सरकार और संगठनों की महत्वपूर्ण पहल
गुमशुदा बच्चों की तलाश के लिए शुरुआती कुछ घंटे बेहद अहम होते हैं। इसे देखते हुए भारत सरकार ने ‘ट्रैक चाइल्ड पोर्टल’ (Track Child Portal) और ‘खोया-पाया पोर्टल’ जैसी ऑनलाइन सुविधाएं शुरू की हैं।
इसके अलावा 1098 चाइल्ड हेल्पलाइन बच्चों के लिए एक बड़ा सहारा है। रेलवे स्टेशनों और सार्वजनिक स्थलों पर पुलिस और आरपीएफ की निगरानी बढ़ाई गई है।
डिजिटल तकनीक और सोशल मीडिया का उपयोग भी अब बच्चों की तलाश में तेजी लाने के लिए किया जा रहा है।
परिवार, समाज और स्कूलों की जिम्मेदारी
सुरक्षा केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि अभिभावकों को अपने बच्चों को ‘गुड टच-बैड टच’, अजनबियों से दूरी और माता-पिता का फोन नंबर याद रखने जैसी बुनियादी बातें जरूर सिखानी चाहिए।
आज के डिजिटल युग में साइबर सुरक्षा भी उतनी ही अहम है, क्योंकि ऑनलाइन गेम और फर्जी प्रोफाइल के जरिए भी बच्चों को निशाना बनाया जा रहा है। स्कूलों को भी जागरूकता कार्यशालाएं आयोजित करनी चाहिए ताकि बच्चों में आत्मविश्वास बढ़े।
यह दिवस हमें याद दिलाता है कि हर बच्चे को सुरक्षित बचपन जीने का अधिकार है। समाज, सरकार और परिवार के सामूहिक प्रयासों से ही हम अपने नौनिहालों को एक सुरक्षित और बेहतर भविष्य दे सकते हैं।











